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मंगलवार, 15 जुलाई, 2003 को 19:01 GMT तक के समाचार भारत में टीबी-एड्स ख़तरनाक
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भारत में भी एड्स की रोकथाम के लिए शोध चल रहे हैं
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विश्व स्वास्थ्य संगठन ने कहा है कि भारत में टीबी यानि तपेदिक और एड्स जैसी बीमारियों का संकट बढ़ता जा रहा है.
संगठन ने अपनी ताज़ा रिपोर्ट में कहा है कि भारत में टीबी के मामले दुनिया भर में सबसे ज़्यादा हैं जो एक बड़ी चिंता का विषय है.
रिपोर्ट में विकसित देशों का आह्वान किया गया है कि विकासशील देशों में टीबी के मरीज़ों को मुफ़्त दवाएँ मुहैया कराने के लिए ठोस क़दम उठाए जाएँ.
संगठन ने ध्यान दिलाया है कि एचआईवी के मरीज़ों को टीबी होने का ख़तरा तेज़ी से बढ़ रहा है और इस समय जितनी मौतें एड्स और टीबी के मरीज़ों की होती हैं उतनी किसी और बीमारी से नहीं.
इन दोनों बीमारियों के बीच इस घातक तालमेल को समाप्त करने के लिए ठोस प्रयास करने होंगे. | | डॉक्टर मारियो रविंगलियोन | हर साल दुनिया में क़रीब अस्सी लाख लोग टीबी के मरीज़ हो जाते हैं और हर साल क़रीब बीस लाख मरीज़ अपनी जान भी खो बैठते हैं.
रिपोर्ट के मुताबिक़ इसकी एक बड़ी वजह ये भी है कि बहुत कम ऐसे देश हैं जिनमें टीबी के मरीज़ों का सही इलाज हो रहा हो.
रिपोर्ट में भारत का ज़िक्र करते हुए कहा गया है कि वहाँ एचआईवी-एड्स के मामले तेज़ी से बढ़ रहे हैं और जब एड्स के मरीज़ को टीबी भी हो जाती है तो हालत बहुत ख़तरनाक हो जाती है.
संगठन का कहना है कि भारत में क़रीब बीस लाख लोग हर साल टीबी के चपेट में आ जाते हैं जिसकी वजह एचआईवी के बढ़ते मामले और ग़रीबी की वजह से सही इलाज नहीं मिलना भी है.
रिपोर्ट के मुताबिक़ भारत में क़रीब एक लाख अस्सी हज़ार लोग एचआईवी और टीबी दोनों ही बीमारियों के शिकार हो चुके हैं.
अंतरराष्ट्रीय आपदा
दस साल पहले विश्व स्वास्थ्य संगठन ने टीबी को एक अंतरराष्ट्रीय आपदा घोषित किया था और एक दशक बाद एचआईवी के संक्रमण ने स्थिति को ज़्यादा ख़राब कर दिया है क्योंकि एचआईवी टीबी के मरीज़ों को जल्दी अपनी चपेट में लेता है.
संगठन के अधिकारियों का कहना है कि ऐसा नहीं है कि टीबी की असरदार और सस्ती दवा उपलब्ध नहीं है, बल्कि समस्या ये है इस बीमारी का पूरा इलाज करने के लिए कम से कम छह महीने का समय चाहिए.
विश्व स्वास्थ्य संगठन के टीबी रोको अभियान के निदेशक डॉक्टर मारियो रविंगलियोन कहते हैं कि इन दोनों बीमारियों के बीच इस घातक तालमेल को समाप्त करने के लिए ठोस प्रयास करने होंगे.
रिपोर्ट में कहा गया है कि रूस में भी टीबी तेज़ी से बढ़ रही है और अफ्रीका में लोग टीबी की दवाई पूरे समय के लिए खाने से कतराते हैं जिससे उनका इलाज पूरी तरह से नहीं हो पाता है.
संगठन ने कहा है कि अगर पश्चिमी देश विकासशील देशों में टीबी और एचआईवी-एड्स के मुक़ाबले के लिए पर्याप्त धन नहीं मुहैया कराएँगे तो हो सकता है कि एक दिन यह समस्या पश्चिमी देशों में भी एक बड़ी समस्या बन जाए. |
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