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सोमवार, 18 नवंबर, 2002 को 03:45 GMT तक के समाचार
एशियाइयों का दिल 'कमज़ोर'
भारतीय उपमहाद्वीप में जन्म से ही ह्रदय रोग का ख़तरा
भारतीय उपमहाद्वीप में जन्म से ही ह्रदय रोग का ख़तरा

डॉक्टरों का कहना है कि बाक़ी दुनिया के मुक़ाबले भारतीय उपमहाद्वीप के लोगों के दिल की बीमारी से मरने की आशंका पचास फ़ीसदी ज़्यादा है.

उनके अनुसार इसके लिए आनुवंशिक प्रवृत्ति ज़िम्मेदार है.

लेकिन डॉक्टरों को यह भी लगता है कि स्वास्थ्य से जुड़े दूसरे मुद्दे जैसे मोटापा, व्यायाम की कमी वगैरह की वजह से भी दक्षिण एशिया के लोगों में यह बीमारी बढ़ रही है.


दक्षिण एशिया में पैदाइश के साथ ही दिल की बीमारी का ख़तरा पैदा हो जाता है

डॉक्टर संदीप गुप्ता
उनके अनुसार यह पिछले चालीस वर्षों से पता है कि दक्षिण एशियाइयों में बीमारी का ख़तरा ज़्यादा है फिर भी इस समस्या से निबटने के लिए कुछ भी नहीं किया गया.

पूर्वी लंदन के व्हिप्स क्रॉस अस्पताल में ह्रदय विशेषज्ञ डॉक्टर संदीप गुप्ता का कहना है कि ऐसे लोग जो दक्षिण एशिया से निकलकर दूसरे देशों में बस गए हैं उनमें और उनके बच्चों में भी बीमारी का ख़तरा बना रहता है.

डॉक्टर गुप्ता के अनुसार, "भारत, पाकिस्तान, बांगलादेश और कुछ हद तक श्रीलंका के लोगों में दुनिया के किसी भी देश के मुक़ाबले दिल की बीमारी से होने वाली मौत की दर कहीं ज्यादा है."

"ब्रिटेन में रहने वाले दक्षिण एशियाई समुदाय के पुरुषों और महिलाओं दोनों में ही गोरे समुदाय की तुलना में दिल की बीमारी से मरने का पचास फ़ीसदी अधिक ख़तरा है."

"अगर भारतीय उपमहाद्वीप के लोग दूसरे मुल्कों जैसे फ़िजी या सिंगापुर या फिर उत्तरी अमरीका जाकर बसते हैं तो भी स्थानीय लोगों की तुलना में उन्हें दिल की बीमारी का ख़तरा अधिक रहता है."

नई बात नहीं

डॉक्टर गुप्ता का कहना है कि यह पहली बार नहीं है जब इस ख़तरे के बारे में पता चला है बल्कि पचास के दशक से ही इस बारे में जानकारी है लेकिन इस बारे में कुछ भी नहीं किया गया.

उनके अनुसार वैज्ञानिकों को लगता है कि इस ख़तरे के लिए आनुवंशिक गड़बड़ियाँ ज़िम्मेदार हैं.

डॉक्टर गुप्ता के अनुसार, "दक्षिण एशिया के लोगों में पैदाइश के साथ ही इस बीमारी का ख़तरा होता है."

"इससे लगता है कि यह आनुवंशिक प्रवृत्ति है."

उनके अनुसार अपना मुल्क छोड़ने से बना तनाव भी कुछ हद तक इसके लिए ज़िम्मेदार है.

ख़र्च

पूर्वी भारत के एक ह्रदय विशेषज्ञ डॉक्टर शुभ्रो दत्ता का मानना है कि स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार से कुछ मरीज़ों को मदद मिल रही है.

लेकिन दिल की बीमारी का इलाज करवाना हर मरीज़ के लिए संभव नहीं है.

उनका कहना है, "हमारे पास पूरे उत्तर-पूर्व भारत से मरीज़ आते हैं जिनमें से कई की हालत गंभीर होती है. लेकिन उनके पास इलाज के लिए पैसा नहीं होते."

हालाँकि अब निजी स्वास्थ्य बीमे की योजनाएँ शुरू होने से कुछ लोगों को मदद मिली है.

लेकिन ग़रीब लोगों के लिए अपना इलाज करवा पाना अब भी संभव नहीं है.
 
 
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