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सोमवार, 24 नवंबर, 2008 को 11:09 GMT तक के समाचार

बच्चा गाड़ी कैसी हो?

एक अध्ययन में संकेत मिले हैं कि बच्चों को ऐसी गाड़ियों में बैठाने से उनके विकास में अवरोध आ सकता है जिनमें से वे अपने माता-पिता को नहीं देख पाते,

शोधार्थियों ने पाया कि अपने माता-पिता की ओर चेहरे वाली गाड़ियों में बैठने वाले छोटे बच्चे ज़्यादा बोलने, हंसने वाले हो सकते हैं.

ब्रिटेन में किए गए एक छोटे से अध्ययन में छोटे बच्चों के 2700 से भी ज़्यादा अभिभावकों पर ग़ौर किया गया.

उल्टी दिशा वाली गाड़ियों में अभिभावक बच्चों से बात नहीं कर पाते और ऐसे में बच्चे ज़्यादा तनाव में नज़र आते हैं.

आमने-सामने की हंसी

यह शोध डंडी विश्वविद्यालय की डॉ सुज़ाना ज़ीडेक के नेतृत्व में चेरिटी द नेशनल लिट्रेसी ट्रस्ट के सहयोग से किया गया.

देश के 54 भिन्न इलाकों से कुल 2722 बच्चों और उनके अभिभावकों का विश्लेषण किया गया.

डॉ ज़ीडेक ने डंडी के मध्य में एक मील के रास्ते में गाड़ी में बैठे 20 बच्चों पर ग़ौर किया.

इन बच्चों ने आधी यात्रा अभिभावकों से उल्टी दिशा में तय की जबकि बाकी की यात्रा में माँ के सामने रहकर वे हंसते खिलखिलाते नज़र आए.

माँ से उल्टी दिशा वाली यात्रा में मात्र एक ही बच्चा हंसा जबकि आमने सामने की यात्रा में आधे बच्चे हंसते रहे.

डॉ ज़ीडेक ने कहा, "माँ के सामने बैठे बच्चों के दिल की धड़कन भी हल्की सी धीमी रही और वे दोगुने निंदासे से लगे जो उनके कम होते तनाव स्तर का संकेत देता है."

नकारात्मक असर

इस अध्ययन के दौरान पाया गया कि कुल बच्चों में से क़रीब 62 फ़ीसद बच्चे गाड़ियों में अभिभावकों से उल्टी दिशा में बैठकर घूमे.

एक से दो साल के बच्चों में तो यह दर और ज़्यादा यानी 82 फ़ीसदी थी.

आमने सामने वाली गाड़ियों में दोगुने से भी ज़्यादा अभिभावक अपने बच्चों से बात कर पा रहे थे. जबकि अध्ययन किए जा रहे कुल लोगों में से मात्र 22 फ़ीसदी ही अपने बच्चों से बात कर रहे थे.

डॉ ज़ीडेक ने कहा, "अगर बच्चे ऐसे समय में अपना काफ़ी समय गाड़ियों में व्यतीत करते हैं जब उनके मस्तिष्क का विकास जिंदग़ी में सबसे अधिक होता है, तो यह उनकी अपने अभिभावकों से आसानी से बातचीत करने की क्षमता को तो कम करता ही है और इसका उनके विकास पर नकारात्मक असर पड़ता है."

उन्होंने कहा, "हमने प्रयोगों और अध्ययनों में पाया है कि गाड़ियों में केवल बच्चों के चेहरों की दिशा बदल देने से ही अभिभावकों से उनके बात करने की दर दोगुनी हो जाती है."

उनके अनुसार, "हमारे आँकड़े संकेत देते हैं कि आज के ज़्यादातर बच्चों की ज़िंदगी गाड़ी में रहकर भावनात्मक रूप से कमज़ोर और तनावग्रस्त हो सकती है. तनावग्रस्त बच्चे बड़े होकर बेचैन वयस्क बनते हैं."

डॉ ज़ीडेक इस पर एक बड़ा अध्ययन करना चाहती हैं ताकि अभिभावक अपने बच्चों के विकास के बारे में ज़्यादा जान सकें.