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शुक्रवार, 07 नवंबर, 2003 को 14:37 GMT तक के समाचार
 
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एड्स और एचआईवी की भाषा
एचआईवी वायरस
एचआईवी वायरस
 

रेट्रोवायरस क्या है? कुछ और ही ऐसे सवालों के जवाब. एचआईवी से जुड़े प्रमुख शब्दों के अर्थ जानने लिए और पढ़ें...

एड्स (अक्वायर्ड इम्यूनोडेफ़िसिएंसी सिंड्रोम)

एचआईवी संक्रमण का सबसे ख़तरनाक परिणाम एड्स है. यह तब होता है जब शरीर में रोगों से लड़ने की क्षमता एकदम ख़त्म हो जाती है.

एड्स ग्रस्त रोगियों को आमतौर पर फेफड़ों, दिमाग़, आँखों और कुछ अन्य अंगों में संक्रमण फैलता है.

इन रोगियों के वज़न में अचानक गिरावट आ जाती है. साथ ही डायरिया और कई तरह के कैंसर भी हो जाते हैं.

ऐंटीबॉडीज़

ऐंटीबॉडीज़ शरीर की प्रतिरोधक क्षमता के ज़रिए उत्सर्जित उस प्रोटीन को कहते हैं जिससे रोगों के संक्रमण से लड़ने में शरीर को मदद मिलती है.

ऐंटीजेन

ऐसी कोई भी बाहरी चीज़ जो शरीर में प्रतिक्रियास्वरूप ऐंटीबॉडीज़ के निर्माण के लिए स्थितियाँ पैदा करे. ये बाहरी चीज़ें वायरस, कीटाणु या प्रोटीन भी हो सकतीं हैं.

ऐंटीरेट्रोवायरल दवाइयाँ

ये वो दवाईयाँ होती हैं जिनके प्रयोग से एचआईवी वायरसों को शरीर के अंदर बढ़ने से रोका जाता है.

सीडीफ़ोरप्लस कोशिका

ये एक ऐसी प्रतिरोधक कोशिका है जो रोगों से लड़ने वाली प्रतिरक्षा प्रणाली की मदद करती है. एचआईवी के संक्रमण से ये कोशिकाएं नष्ट हो जातीं हैं और शरीर की प्रतिक्षा प्रणाली संक्रमण से लड़ने के मामले में कमज़ोर पड़ जाता है. ये रक्त में प्रति घन मिलीमीटर के हिसाब से रहती हैं. किसी स्वस्थ व्यक्ति के रक्त के प्रति घन मिलीमीटर में क़रीब 600 से 1200 कोशिकाएँ रहती हैं. मगर एड्स से प्रभावित रोगियों में इन कोशिकाओं की संख्या 200 से भी कम हो जाती हैं.

कॉंबिनेशन थेरपी

कॉबिनेशन का मतलब होता है मेल या मिलाजुला हुआ. दरअसल दो या अधिक ऐंटीरेट्रोवायरल दवाईयों या उपचारों को अधिक से अधिक प्रभावी परिणाम पाने के उद्देश्य से एक साथ इस्तेमाल में लाने की प्रक्रिया कॉबिनेशन थेरपी कहलाती है.

फ़्यूज़न इन्हीबिटर्स

ये दवाइयों का एक वर्ग है जिसका इस्तेमाल शरीर की कोशिकाओं में एचआईवी के प्रवेश और फैलाव को रोकने के लिए किया जाता है. अब तक सिर्फ़ एक फ्यूज़न इन्हीबिटर उपलब्ध है जिसका नाम फ्यूज़िओन है.

डीएनए

डिऑक्सीराइबोन्यूक्लीक एसिड यानी डीएनए को जीवन की इकाई भी कहते हैं. इनका काम कोशिकाओं के निर्माण में आवश्यक अनुवांशिक सूचनाएं देना है. साथ ही डीएनए का काम ये देखना भी है कि ये कोशिकाएँ अच्छी तरह से काम कर रहीं हैं या नहीं.

एंजाइम्स

एंजाइम्स वो प्रोटीन होते हैं जो एक ख़ास तरह की रासायनिक प्रतिक्रिया में मदद करते हैं.

हाइली ऐक्टीव ऐंटीरेट्रोवायरल थेरपी (हार्ट)

हार्ट तीन या चार अलग-अलग तरह के उपचार के तरीकों का मिलाजुला रूप है. इसे एचआईवी को बढ़ने से रोकने के लिए बहुत ही कारगर माना जाता है. साथ ही ये रोगियों के खून में वायरस को बहुत कम भी कर देता है.

ह्यूमन इम्यूनोडेफ़िसिएंसी वायरस टाइप1 (एचआईवी-1)

ये एक ऐसा वायरस है जो एड्स के सबसे अधिक मामलों के पीछे है. ये वायरस अपने जीन्स को कोशिका में डालकर उसे अपने काम से रोकता है और उसे एक एचआईवी फ़ैक्टरी में तब्दील कर देता है.

ह्यूमन इम्यूनोडेफ़िसिएंसी वायरस टाइप2 (एचआईवी-2)

ये एचआईवी-1 से मिलता जुलता वायरस है जो काफ़ी सक्रियता से एड्स फैलाता है. इसे सबसे पहले पश्चिमी अफ़्रीका में पाया गया.

इम्यून सिस्टम

शरीर में उपस्थित प्रतिरोध क्षमता या रोगों से लड़ने की शरीर की क्षमता को इम्यून सिस्टम कहते हैं.

इंटिग्रेस इंहिबिटर्स

ये दवाइयाँ अभी बन रहीं हैं. इनका इस्तेमाल एचआईवी के इंटिग्रेस एंजाइम को रोकने के लिए किया जाएगा. जब एचआईवी वायरस शरीर की कोशिका में अपने जीन छोड़ती है तब उस प्रक्रिया को रोकने के लिए भी इंटिग्रेस इंहीबिटर्स की महत्वपूर्ण भूमिका हो सकती है.

कापोसी सरकोमा

ये एड्स से मिलने जुलने वाला कैंसर की एक किस्म है. ये शरीर पर या मुँह के भीतर गुलाबी और बैंगनी धब्बों के रूप में नज़र आता है. इन धब्बों में ज़रा सा भी दर्द नहीं होता है. ये आँखों में भी हो सकते हैं.

लॉंग टर्म नॉन प्रोग्रेसर

लॉंग टर्म नॉन प्रोगेसर यानी लंबे समय तक कोई फ़र्क नहीं पड़ने वाला दरअसल एड्स के उस रोगी को कहते हैं जो एचआईवी के साथ सात से बारह वर्षों से रह रहा हो और वो भी किसी ऐंटीरेट्रोवायरल चिकित्सा के बिना. ऐसे रोगियों में सीडीफ़ोरप्लस कोशिकाओं की संख्या घटती-बढ़ती नहीं है.

मैक्रोफ़ेज़

ये वो बड़ी कोशिकाएं होतीं हैं जो बिना नष्ट हुए लगातार संक्रमण फैलाने वाले तत्वों से लड़तीं हैं. साथ ही ये दूसरी कोशिकाओं को भी इसी तरह से काम करने के लिए उकसाती हैं.

ऑपरचुनिस्टिक इंफ़ेक्शन

ये संक्रमण उन लोगों को होता है जिनकी रोग से लड़ने की क्षमता में कमी हो जाती है. ये एक ऐसे जीवाणु से होने वाला संक्रमण है जो मज़बूत प्रतिरोध वाले लोगों के शरीर में असर नहीं डाल सकता.

प्रोटीन

प्रोटीन का निर्माण एक या एक से अधिक अमीनो एसिड से होता है. प्रोटीन का इस्तेमाल शरीर की कोशिकाओं, ऊतक और अंगों की संरचना के साथ ही कार्य प्रणाली के निर्धारण में होता है.

प्रोटीज़ इन्हिबिटर्स

ये एंटीरेट्रोवायरल दवाईयों का एक वर्ग है. इसका इस्तेमाल एचआईवी प्रोटीज़ एंज़ाइम को काम करने से रोकने के लिए होता है. ये केमिकल सिज़र्स यानी रासायनिक कैंची की तरह काम करता है जिससे नई बनी प्रोटीन की श्रृंखला तोड़ी जा सके.

रेज़िसटेंस /प्रतिरोध

विशेषज्ञों को इस बात की चिंता है कि एचआईवी पर अब धीरे-धीरे पहले से उपलब्ध दवाइयों का असर नहीं हो रहा है.

रेट्रोवायरस

आरएनए के निर्माण के लिए आनुवांशिक सूचनाएँ देने वाले वायरस के प्रकार को रेट्रोवायरस कहते हैं. एचआईवी एक तरह का रेट्रोवायरस ही है. इसके कुछ प्रकारों से कैंसर भी हो सकता है.

रिवर्स ट्रांसक्रिप्टेज़ इंहिबिटर्स

ये ऐसी दवाइयाँ हैं जो उन एंज़ाइमों को रोकतीं हैं जिनकी मदद से एचआईवी अपनी संख्या को बढ़ाते हैं. ऐंटीरेट्रोवायरल दवाइयों का ये सबसे पुराना वर्ग है और मुख्य रूप से तीन प्रकार का होता है-

  • न्यूक्लियोसाइड रिवर्स ट्रांस्क्रिप्टेज़ इंहिबिटर्स
  • न्यूक्लियोटाइड रिवर्स ट्रांस्क्रिप्टेज़ इंहिबिटर्स और
  • नॉन-न्यूक्लियोसाइड रिवर्स ट्रांस्क्रिप्टेज़ इंहिबिटर्स

आरएनए

ये ऐसे तत्व होते हैं जिनकी संरचना डीएनए से मिलती जुलती होती है और ये आनुवांशिक सूचनाओं को डीएनए से लेकर शरीर की दूसरी कोशिकाओं तक पहुँचाने का काम करते हैं. ये कोशिका के भीतर होने वाले कुछ रासायनिक समीकरणों को भी नियंत्रित करते हैं.

टी सेल

ये वे श्वेत रक्तकण होते हैं जिनका मुख्य काम शरीर की प्रतिरोध क्षमता में समन्वय बैठाना होता है. ये संक्रमित कोशिका को शरीर की रोग से लड़ने वाली क्षमता का आभास कराता है. सीडीफ़ोरप्लस कोशिकाएँ भी एक तरह की टी सेल ही हैं.

ट्रांसमिशन

ये एक प्रक्रिया है जिसके तहत वायरस एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति तक पहुँचते हैं. एचआईवी शरीर के मौजूद तरह-तरह के द्रव्यों ख़ासकर रक्त,वीर्य इत्यादि से एक व्यक्ति से दूसरे तक पहुँच सकता है. एचआईवी फैलने का सबसे आम कारण असुरक्षित यौन संबंध और दवाइयों को शरीर में डालने के लिए इस्तेमाल में लाई जाने वाली सुइयाँ हैं. साथ ही किसी एड्स से संक्रमित औरत के शरीर से दूध के ज़रिए उसके बच्चे में एचआईवी पहुँचने का मामला भी बहुतायत में पाया जाता है.

वायरल लोड

रक्त में पाए जाने वाले एचआईवी के अनुपात को वायरल लोड कहते हैं. इसे प्रति मिलीलिटर रक्त प्लाज़्मा में पाए जाने वाले वायरसों की संख्या के हिसाब से देखा जाता है.

 
 
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