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मांसपेशियों से जुड़ी बीमारी में कारगर हो सकती है वायग्रा

 शुक्रवार, 9 मई, 2014 को 09:18 IST तक के समाचार
मस्कुलर डिस्ट्रोफी

अमरीकी वैज्ञानिकों ने दावा किया है कि यौन शक्ति को बढ़ाने वाली दवाएं वायग्रा और सीएलिस लड़कों में होने वाली मांसपेशी की बीमारी डूशेन मस्कुलर डिस्ट्रॉफी (डीएमडी) के इलाज में कारगर साबित हो सकती है.

शोध से पता चला है कि वायग्रा और सीएलिस की ख़ुराक़ से डीएमडी से पीडित लड़कों में ख़ून के संचार में सुधार हो सकता है. वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि इन दवाओं से बीमारी के प्रभाव को कम किया जा सकता है.

डीएमडी पीडित बच्चों में मांसपेशियां धीरे-धीरे कमज़ोर हो जाती हैं और बच्चा चलने फिरने में असमर्थ हो जाता है.

क्लिक करें वायग्रा 'लूटने वाला' पकड़ा गया

विशेषज्ञों का कहना है कि यह शोध लाभकारी हो सकता है लेकिन ज़रूरी नहीं है कि इससे डीएमडी पीड़ित बच्चों के चलने फिरने की क्षमता में सुधार आए.

हर 3,500 नवजात लड़कों में से एक को यह बीमारी होती है और ज़्यादातर की 30 साल की उम्र से पहले ही मौत हो जाती है.

जब शरीर में सांस लेने और रक्त संचरण में काम आने वाली मांसपेशियां इस बीमारी की चपेट में आती हैं तो वह स्थिति जानलेवा हो सकती है.

इस बीमारी का फिलहाल कोई कारगर इलाज मौजूद नहीं है और ज़्यादातर पीडित बच्चों को 10 साल की उम्र तक पहुंचते-पहुंचते व्हीलचेयर का सहारा लेना पड़ता है.

शोध

डीएमडी के इलाज के लिए फिलहाल कोर्टीकोस्टेरॉयड्स का इस्तेमाल किया जाता है लेकिन इसके कई दुष्प्रभाव हैं जिनमें फोड़े फुंसी निकलना, मांसपेशियों का कमज़ोर होना, अल्सर, मधुमेह, हड्डियां कमज़ोर होना और उच्च रक्तचाप शामिल है.

लेकिन 25 प्रतिशत मामलों में कोर्टीकोस्टेरॉयड्स कारगर नहीं हैं.

इस शोध में लॉस एंजलिस के सिडार–सेनाई इंस्टीट्यूट के वैज्ञानिकों ने डीएमडी से पीड़ित आठ से तेरह साल के 10 लड़कों पर शोध किया.

क्लिक करें जब वायग्रा भी हो जाए बेअसर

लड़कों को वायग्रा और सीएलिस की एक ख़ुराक़ दी गई. सीएलिस को नपुंसकता के इलाज के लिए भी इस्तेमाल किया जाता है.

कुछ घंटों बाद जब उन लड़कों की मांसपेशियों में ख़ून के प्रभाव को मापा गया और फिर इसकी दस स्वस्थ बच्चों के पैमाने के साथ तुलना की गई.

वायग्रा और सीएलिस की एक ख़ुराक़ के बाद पीड़ित लड़कों की मांसपेशियों में ख़ून के संचार के स्तर में क़ाफी सुधार देखा गया.

परिणाम

सिडार–सेनाई इंस्टीट्यूट के मुख्य शोधकर्ता डॉक्टर रोनाल्ड विक्टर ने बीबीसी को बताया कि पहले चूहों पर इस तरह का प्रयोग किया गया था.

उन्होंने कहा कि इन दवाओं का प्रभाव "त्वरित और नाटकीय था."

उन्होंने कहा, "अगर आप पीडित लड़कों के शरीर में तो ख़ून के संचार को बढ़ा सकते हैं तो आप बीमारी को बढ़ने से रोक सकते हैं, लेकिन इस बीमारी को पूरी तरह ठीक नहीं कर सकते."

यूनिवर्सिटी ऑफ़ शेफ़ील्ड में प्रोफ़ेसर स्टीव विंडर का मानना है कि बहुत थोड़ा असर ही सही लेकिन यह शोध एक नई पहल है.

हालांकि उन्होंने कहा कि इस शोध से यह पता नहीं चलता है कि क्या वायग्रा और सीएलिस की ख़ुराक़ लेने से डीएमडी पीड़ित लड़कों के चलने की क्षमता में सुधार आता है या नहीं.

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