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गुप्त लत, एक ख़ामोश ख़तरा

 शुक्रवार, 31 जनवरी, 2014 को 00:50 IST तक के समाचार
गुप्त नशे के आदी

''मुझे ऐसा लगता था कि मैं ख़ुद को और अपने परिवार को चोट पहुंचा रहा हूं, मुझे ऐसा भी महसूस होता था कि इसे और बर्दाश्त करने के बजाए बेहतर होगा कि मैं ख़ुद अपनी जान दे दूं.''

यह शब्द हैं एक फ्रांसीसी विद्वान के जो फ़िलहाल उत्तरी आयरलैंड में रहते हैं और वहीं काम करते हैं, वे एक गुप्त नशे के आदी हो चुके थे, ऐसा नशा जिसके बारे में ख़ुद उन्हें पता नहीं था.

इसकी वजह से उन्हें अपनी ज़िंदगी बोझ लगने लगी थी. यह नशा, दवाओं का नशा था. वह दवा जो किसी डॉक्टर ने लिखकर उन्हें दी थी.

एलेक्स बंटिंग, नॉर्दन आयरलैंड में फोरम फॉर एक्शन ऑन सब्सटेंस एब्यूज़ (एफएएसए) के कॉर्पोरेट सेवा प्रमुख हैं. एलेक्स इस अनुभव को असाधारण नहीं मानते हैं.

वे कहते हैं, ''लोग आदी हो जाते हैं और इस बारे में ख़ामोशी ओढ़े रहते हैं. शराब और दूसरे तरह के नशे से मुक्ति के लिए टीवी पर बड़े हाई-प्रोफ़ाइल अभियान नज़र आते हैं. लेकिन हमारे पास ऐसे कई लोग आते हैं जो इस बारे में कुछ बताना ही नहीं चाहते कि उन्हें किस चीज की लत लगी है.''

लगाव भी बन जाता है लत

एफएएसए, नॉदर्न आयरलैंड में अपनी तरह का पहला संगठन है जो आत्महत्या का ख्याल रखने वाले, ख़ुद को चोट पहुंचाने का इरादा रखने वाले मानसिक रूप से परेशान लोगों की मदद का प्रयास करता है.

मानसिक तौर पर परेशान एक व्यक्ति

एफएएसए से जुड़े स्टीव मिलर कहते हैं कि कई वजहों से लोग नहीं बता पाते कि उन्हें क्या लत लगी है.

वह कहते हैं, ''मेरा अनुभव है कि लोग यह समझते हैं कि लत ज़ाहिर होने पर उनकी नौकरी ख़तरे में पड़ सकती है. कुछ को यह भी लगता है कि इससे उनके संबंध प्रभावित होंगे या इससे उनका परिवार बिखर सकता है.''

मिलर बताते हैं, ''जब लोग अपने किसी प्रिय के प्रति लत बन चुके लगाव को छिपाते हैं, तब कई बार वह ख़ुद को दिलासा देने का प्रयास करते हैं कि उन्हें कोई समस्या नहीं है.''

लत का सफ़र

"जब लोग अपने किसी प्रिय के प्रति लत बन चुके लगाव को छिपाते हैं, तब कई बार वह ख़ुद को दिलासा देने का प्रयास करते हैं कि उन्हें कोई समस्या नहीं है."

एक मरीज़ की आपबीती

इस तरह की कोई भी गुप्त लत कई वजहों से लग सकती है.

मसलन मिलर के एक अज्ञात सूत्र बताते हैं कि वह क्यों नहीं चाहते कि लोग उनकी लत के बारे में जानें.

वह कहते हैं, ''कई ऐसे लोग होंगे जिन्हें महसूस होता होगा कि उनके बच्चों को इस बारे में पता न चले.''

सवाल यह है कि लोग अपने जीवन में इस स्थिति तक कैसे पहुंच जाते हैं.

"मुझे ऐसा लगता था कि मैं ख़ुद को और अपने परिवार को चोट पहुंचा रहा हूं, मुझे ऐसा भी महसूस होता था कि इसे और बर्दाश्त करने के बजाए बेहतर होगा कि मैं ख़ुद अपनी जान दे दूं."

एक मरीज़ की आपबीती

वह बताते हैं, ''साल 2010 में मेरी मां को पता चला कि उन्हें कैंसर है. मेरे पिता की भी तबीयत ख़राब थी. मैं कुछ समय के लिए फ्रांस लौटा ताकि अपने माता-पिता की देखभाल कर सकूं. मैं बहुत दबाव महसूस कर रहा था और एक डॉक्टर को दिखाने पहुंचा जिन्होंने दवा के तौर पर मुझे बेंज़ोडाइआज़पींस लिख दी.''

बेंज़ोडाइआज़पींस में डायज़ेपेम और टेमज़ेपेम होता है जो आमतौर पर उस मरीज़ को लिखी जाती है जिसमें बेचैनी और गुमसुम-गुमसुम रहने जैसे लक्षण होते हैं.

वह बताते हैं, ''डॉक्टर ने मुझे यह नहीं बताया कि बेंज़ोडाइआज़पींस पर निर्भरता बढ़ सकती है. कई महीनों के बाद मैंने इसे लेना बंद कर दिया, लेकिन कुछ ही हफ्तों के बाद मैंने ख़ुद को बहुत बीमार महसूस किया. दवा नहीं लेने की वजह से शारीरिक और मानसिक समस्याएं पैदा हो गईं.''

"मैं एंटी-एसिड दवाएं भी लेने लगा और जब दवा लेना बंद किया तो लगा कि मेरे सिर में जैसे परमाणु विस्फोट हो रहे हैं. मेरा वज़न भी घट गया और मैं शारीरिक-मानसिक तौर पर धराशायी हो गया. मुझे लगने लगा कि मैं बेकार हूं और दोबारा कभी काम नहीं कर पाउंगा और तभी मेरे दिमाग में आत्महत्या करने का ख़्याल आया."

एक मरीज़ की आपबीती

गुजरते समय के साथ उनके पिता चल बसे और इसके बाद बेंज़ोडाइआज़पींस पर उनकी निर्भरता भी बढ़ती गई.

अपने इसी तकलीफ़ वाले दौर के बारे में वह बताते हैं. "मैं एंटी-एसिड दवाएं भी लेने लगा और जब दवा लेना बंद किया तो लगा कि मेरे सिर में जैसे परमाणु विस्फोट हो रहे हैं. मेरा वज़न भी घट गया और मैं शारीरिक-मानसिक तौर पर धराशायी हो गया. मुझे लगने लगा कि मैं बेकार हूं और दोबारा कभी काम नहीं कर पाउंगा और तभी मेरे दिमाग में आत्महत्या करने का ख़्याल आया."

लेकिन वह एफएएसए की मदद से धीरे-धीरे इस कुचक्र को तोड़ने में क़ामयाब हो गए. यह एक उदाहरण भर है और ऐसे कई मामले आसपास देखे जा सकते हैं.

एफएएसए के एलेक्स बंटिंग कहते हैं कि ऐसे मामलों में लोगों को काफ़ी समय तक दिक्कत का अहसास तक नहीं होता और जब अहसास होता है तब तक अक़्सर बहुत देर हो चुकी होती है.

दवाओं की भूमिका

ब्रिटिश मेडिकल एसोसिएशन (बीएमए) के डॉक्टर एलन स्काउट कहते हैं कि अवसाद और चिंता दूर करने में दवाएं मददगार साबित हो सकती हैं लेकिन समाधान के अन्य रास्ते भी तलाशे जाने चाहिए.

वह कहते हैं, ''कई दवाओं के बारे में पता है कि उनकी लत लग जाती है, बेंज़ोडाइआज़पींस इसका एक अच्छा उदाहरण है. डाक्टरों को यह दवा लिखने से बचना चाहिए.''

डॉक्टर एलन कहते हैं कि यदि कोई मरीज़ इस तरह की दवा लेना शुरू कर भी दे, तब उन्हें यह भरोसा दिलाने की ज़रूरत होती है कि उन्हें इसकी लत नहीं लगेगी.

लेकिन साथ ही वह इस चुनौती का भी ज़िक्र करते हैं कि कई बार दवा डॉक्टर की पर्ची के बिना भी मिल जाती है जो ग़ैर-कानूनी है.

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