डीज़ल छोड़ ग्रीन एनर्जी से चलेंगे मोबाइल टावर?

  • 26 जनवरी 2014
mobile indian

भारत में करीब 90 करोड़ मोबाइल यूज़र हैं और सेलुलर नेटवर्क की एक पूरी कड़ी लगातार सक्रिय रहती है ताकि लोग जब चाहें तब कॉल कर पाएं.

लेकिन संचार क्षेत्र के जानकारों के अनुसार भारत में तकरीबन 56 करोड़ सक्रिय मोबाइल यूज़र हैं.

मोबाइल नेटवर्क के सबसे अहम हिस्से, मोबाइल टावर को 24 घंटे - 365 दिन चालू रखने में काफ़ी ऊर्जा चाहिए होती है.

शहरी इलाकों में लगे टावरों को आम तौर पर सार्वजनिक ग्रिड से ही बिजली मिल जाती है.

लेकिन भारत में ज़्यादातर जगहों पर बिजली की सुचारू व्यवस्था नहीं होने की वजह से 60 प्रतिशत से मोबाइल टावर डीज़ल जेनरेटरों के भरोसे चलते हैं.

हर टावर को लगभग उतनी ही बिजली चाहिए होती है जितनी आम तौर पर किसी शहरी घर में खर्च होती है.

देशभर में चार लाख से अधिक मोबाइल टावर हैं और इनकी संख्या लगातार बढ़ रही है. शायद यही कारण है कि इन टावरों को अब साफ-सुथरी ऊर्जा से चलाए जाने की मांग की जा रही है.

भारत में हर साल अकेले टेलिकॉम उद्योग दो अरब लीटर डीज़ल खर्च कर देता है.

सोलर ऊर्जा क्यों पीछे?

देश के टेलिकॉम विभाग ने भी मोबाइल सेवा देने वाली कंपनियों को निर्देश जारी कर कहा है कि वे डीज़ल की खपत कम करे और ऊर्जा के नए स्रोत खोजें.

ग्रामीण इलाकों में 50 फ़ीसदी और शहरी इलाकों में 20 फ़ीसदी की कार्बन उत्सर्जन में कटौती के भी निर्देश दिए गए हैं.

कंपनियों के पास जो रास्ता बचा है वो है हाईब्रिड ऊर्जा यानी ग्रिड और दोबारा प्रयोग किए जाने वाली ऊर्जा के मिश्रण कर टावरों को संचालित करें.

लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि ये आसान नहीं होगा.

मैनेजमेंट कंसल्टेंसी कंपनी एटी कर्नी से जुड़े मोहित राणा कहते हैं, “सोलर ऊर्जा सबसे अच्छी है, लेकिन इसका उत्पादन, खासतौर पर शुरुआती खर्च बहुत ज़्यादा है.”

हालांकि डीज़ल खपत कम करने के उपायों पर उद्योग लगातार काम कर रहा है.

डीज़ल बढ़ा रहा कार्बन उत्सर्जन

एटी कर्नी के एक अनुमान के अनुसार टेलिकॉम उद्योग के कुल कार्बन उत्सर्जन का आधा डीज़ल उपयोग की ही वजह से होता है.

भारती इंफ्राटेल उन कंपनियों में से एक हैं जो इस लक्ष्य को पाने के लिए कोशिश कर रही है. इस कंपनी से 33 हज़ार से ज़्यादा मोबाइल टावर है जिनमें से नौ हज़ार से ज़्यादा ग्रिड की स्थाई बिजली से दूर हैं. ऐसे में डीज़ल ऊर्जा का प्रयोग किया जाता है जो महंगा भी है.

भारती इंफ्राटेल के देवेंद्र सिंह रावत बताते हैं, “ईंधन हमारे ख़र्च का एक अहम हिस्सा है. प्रत्येक टावर पर हर दिन पांच से 40 हज़ार तक का ईधन खर्च होता है.”

एक हजार टावरों से अधिक पर कंपनी ऊर्जा के दूसरे स्रोतों का प्रयोग शुरू कर चुकी है. लेकिन ये काम टेलिकॉम कंपनिया अकेले नहीं कर सकती हैं.

ऊर्जा क्षेत्र में नए मौके

बिजली उत्पादन के नए तौर तरीकों ने उद्योगपतियों और नया सोचने वालों के लिए एक मौका उपलब्ध किया है. ऐसे लोग जो तकनीक को दो तरह से देखते हैं- इससे पैसा बनाया जा सकता है और जंगलों-वातावरण को बचाया जा सकता है.

ओएमसी पावर एक ऐसी ही कंपनी है जो कि ग्रामीण इलाक़ों में टेलीकॉम कंपनियों के लिए छोटे छोटे पावर प्लांट बना रही है.

इन छोटे पावर प्लांटों में सूरज, हवा और बायोगैस जैसे स्त्रोतों का उपयोग कर के दूर-दराज़ के इलाकों में साफ ऊर्जा उपलब्ध कराई जा सकेगी.

ओएमसी पावर के अनिल राज कहते हैं कि आने वाले वर्षों में भारत में ऊर्जा खपत में एक बड़ा बदलाव आने वाला है.

वो कहते हैं, "इस समय अवधारणा ये है कि बड़े-बड़े ऊर्जा संयंत्र होंगे लेकिन उनकी ट्रांसमिशन की प्रणाली अप्रभावी होगी. असल में इस समय हो ये रहा है कि जहां पावर संयंत्र हैं वहां से वो जगहें बहुत दूर हैं जहां बिजली को जाना है. इसके लिए ट्रांसमिशन लाइनें बिछानी होती हैं.ये बात अब बदल रही है. हम कोशिश कर रहे हैं कि छोटे छोटे जगहों पर ही संयंत्र बनाए जाएं जिससे वहां की ज़रुरतें पूरी हों."

हालांकि अभी भी इसमें सबसे बड़ी चुनौती स्वच्छ ऊर्जा की है और वो भी स्वच्छ ऊर्जा के लिए पैसे मिलने की.

कंपनियों को उम्मीद है कि फोन लाइनें उपलब्ध कराने वाले टावर उनके उपभोक्ताओं में होंगे और जो अतिरिक्त ऊर्जा बजेगी वो आस पास के रिहाइशी इलाक़ों में बांटी जा सकेगी.

राज का कहना है कि वो जितनी ऊर्जा का उत्पादन करेंगे वो टेलीकॉम कंपनियों और स्थानीय समुदाय के बीच साझा की जाएगी. स्थानीय समुदाय को छोटे छोटे बैटरी पैक दिए जा सकेंगे जिससे वो अपने घरों में बत्तिया जला पाएंगे और इलेक्ट्रानिक चीज़ों को चार्ज भी कर सकेंगे.

दोबारा प्रयोग किए जाने योग्य ऊर्जाएं

ओएमसी पावर को उम्मीद है कि अलग अलग तरह की तकनीकों का इस्तेमाल कर के कीमतों को कम रखा जा सकेगा और इस प्रक्रिया में कुछ भी बेकार नहीं जाएगा.

भारतीय टेलीकॉम बाज़ार में कीमतें तय करना सबसे कठिन काम रहा है. पिछले कुछ समय में टेलीकॉम कंपनियों का फायदा कम हुआ है और उन्हें कड़ी प्रतियोगिता का सामना करना पड़ रहा है.

इस बाज़ार को बढ़ाने के लिए आने वाले दिनों में भारत में तीन लाख से अधिक मोबाइल टावर स्थापित किए जाने हैं.

अगर इन टावरों को बिजली उपलब्ध कराने के लिए कोई स्वच्छ ऊर्जा का कोई खाका नहीं तैयार होता है तो कई लोगों को डर है कि पहले से ही खस्ताहाल टेलीकॉम बाज़ार की स्थिति बद से बदतर होती चली जाएगी.

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