कभी दवा थी मदिरा, लेकिन अब बन गई है मर्ज़

  • 20 जनवरी 2014
अल्कोहल शराब प्रदर्शनी ब्रिटेन

सैकड़ों साल से ब्रिटिश औषधि विज्ञान के इतिहास में दवा की गोलियों, शर्बतों या रोग निदान करने वाली जड़ी-बूटियों में अल्कोहल का स्थान काफ़ी ख़ास रहा है.

कभी प्लेग के निपटने के लिए 'जिन' की एक बूंद लेने की सलाह दी जाती थी, तो कभी शरीर की सफ़ाई के लिए 'वाइन' से गरारे करने और 'चिरायता' के घूंट के ज़रिए पेट में मौजूद कीड़े मारने की सलाह दी जाती थी.

हालांकि अब यह सब बदल चुका है.

जैसे-जैसे अल्कोहल के समाज और लोगों पर नुक़सान के बारे में हमारी समझ बढ़ी, इसकी जगह नुस्खों की पुर्ज़ियों ने ले ली- यहां तक कि इससे दूर रहने और इसके सावधानीपूर्वक इस्तेमाल करने की सलाह दी जाने लगी.

लंदन में रॉयल कॉलेज ऑफ़ फ़िज़ीशियंस की एक प्रदर्शनी में इसके इस्तेमाल और अतीत में मेडिकल साइंस से जुड़े लोगों द्वारा घातक दुरुपयोग की बानगी पेश की गई है, जो इस पर और ज़्यादा नियंत्रण की मांग करती है.

'बहुत ज़्यादा पीना'

प्रदर्शनी में रखी चमड़े की जिल्द वाली कई किताबों में एक 13वीं सदी के ब्रितानी दार्शनिक और लेखक रॉजर बेकन की किताब का अंग्रेजी अनुवाद भी है. बेकर कीमियागिरी और मेडिसिन पर लिखा करते थे.

अल्कोहल शराब प्रदर्शनी
19वीं सदी तक इंसान पर अल्कोहल के बुरे असर के बारे में पता चल चुका था.

1683 ईस्वी में छपे इस अनुवाद के मुताबिक़ बेकन का सुझाव था कि 'वाइन': "पेट को ठीक रखती है, शरीर में गर्मी बनाए रखती है, पाचन में मददगार है, शरीर को प्रदूषित होने से बचाती है और खून में मिलने तक भोजन को पचाती है."

मगर वह अत्यधिक मात्रा में एथेनॉल के इस्तेमाल के ख़तरे से भी वाकिफ़ थे: "अगर आप इसे ज़्यादा गटकते हैं, तो यह बहुत नुक़सानदेह साबित होगा: यह इंसान की समझदारी पर असर डालेगा, दिमाग़ को प्रभावित करेगा..अंगों में थिरकन और आंखों में धुंधलापन लाएगा."

16वीं और 18वीं सदी की हस्तलिखित घरेलू पाकशास्त्र की किताबों में आमतौर पर पकाए जाने वाले भोजन की विधियों के साथ-साथ ही 'वाइन' से बनी चीज़ों का भी ज़िक्र आता है.

17वीं सदी के एक समझदार गृहस्थ की सलाह थी, "प्लेग से निपटने के लिए बेहतरीन पेय". इसमें ब्राह्मी, तेजपात और दो पाइंट 'वाइन' शामिल थी. 'वाइन' की यह मात्रा इस समय ब्रिटेन में रोज़ाना जितनी 'वाइन' लिए जा सकने की सलाह दी जाती है उस मात्रा से बहुत ज़्यादा है.

'आख़िरी बूंद'

अल्कोहल शराब प्रदर्शनी ब्रिटेन

प्रदर्शनी की क्यूरेटर कैरॉलिन फ़िशर कहती हैं: "वाइन को इतिहास में एक ताक़तवर टॉनिक की जगह दी गई थी, पर दारू को दूसरी नज़र से देखा जाता था. अपने ढंग के रोग उपचार का ज़रिया माने जाने के अलावा इन्होंने दूसरे ऐसे पेय पदार्थों के संरक्षक की भूमिका निभाई, जिन्हें वैसे बोतलबंद करके बेचना मुमकिन नहीं था."

मिसाल के लिए नागदौन जैसी जड़ीबूटी से निकाले जाने वाले चिरायता को पेट के कीड़े और आंतों के कीड़े मारने के लिए कई साल तक इस्तेमाल किया जाता रहा.

मगर अल्कोहल रिसर्च यूके के डॉ जेम्स निकॉल्स के मुताबिक़, 18वीं सदी तक 'जिन' जैसी शराब को लोगों में बढ़ते नशे, ग़रीबी और अपराध के लिए ज़िम्मेदार माना जाने लगा था.

'असंयमित आदतें'

साल 1725 में रॉयल कॉलेज ऑफ़ फ़िज़ीशियंस ने अपनी पहली याचिका में ‘दारू के बढ़ते इस्तेमाल के घातक’ असर पर चिंता जताई थी.

वाइन और बीयर के मुक़ाबले डिस्टिलेशन के तरीक़ों पर जैसे-जैसे क़ानून की पकड़ शिथिल हुई, पूरे इंग्लैंड में 'जिन' को लेकर दीवानगी बढ़ने लगी. इसका मतलब यह भी था कि शराब ज़्यादा बड़ी जनसंख्या को उपलब्ध होने लगी.

लंदन स्कूल ऑफ़ हायजीन एंड ट्रॉपिकल मेडिसिन की डॉ वर्जीनिया बैरिज के मुताबिक़ 19वीं सदी तक अल्कोहल एक बड़ी समस्या की तरह देखा जाने लगा था.

जैसे-जैसे ब्रिटेन का औद्योगीकरण और नगरीकरण बढ़ा, उसे ज़्यादा दक्ष और समय के पाबंद कामगारों की ज़रूरत होने लगी और परहेज़ एक गुण मान लिया गया.

अल्कोहल शराब प्रदर्शनी ब्रिटेन

ख़ुद पर संयम की मांग करने वाले आंदोलन शुरू होने लगे- कुछ ने शुरू में कुछ ख़ास पेय पदार्थों पर ही पाबंदी की सलाह दी, मगर समय के साथ उन्होंने इन पर पूरी तरह रोक लगाने की मांग शुरू कर दी.

19वीं सदी के मध्य तक फ़िजीशियन ख़ुद ही इन परहेज़ आंदोलनों में शामिल होने लगे.

साल 1871 में ब्रिटिश मेडिकल जर्नल में छपे ब्रिटिश मेडिकल टैंपरेंस सोसायटी के एक बयान में कहा गया:

"कहते हैं कि अल्कोहल के इस्तेमाल के बेमानी सुझावों ने.. कई मामलों में असंतुलित आदतों को बढ़ावा दिया है. जहां तक कुछ ख़ास बीमारियों के मामले में अल्कोहल का इस्तेमाल सीमित करने की बात है, हमारा मानना है कि किसी भी मेडिकल प्रैक्टिशनर को गंभीरता से विचार किए बगैर इसके इस्तेमाल की इजाज़त नहीं देनी चाहिए."

विज्ञान की तरक्की के साथ जैसे-जैसे नए पदार्थों का पता लगा, वैसे-वैसे अल्कोहल को लेकर सोसायटी और मेडिकल समुदाय के विचार बदलने लगे, जिसकी एक वजह प्रथम विश्वयुद्ध की शुरुआत में कार्यकुशलता पर ज़ोर देना भी था.

'मौत की वजह'

अल्कोहल शराब प्रदर्शनी
चिरायता को कभी पेट के कीड़े मारने की दवा की तरह इस्तेमाल किया जाता था.

प्रदर्शनी में सबसे आधुनिक चीज़ एटकिंसन इन्फ़ेंट्स प्रिज़र्वेटिव की एक बोतल है, जिसे वर्ष 1919-1941 के बीच जिन बच्चों के दांत निकल रहे हों उनके उपचार के लिए इस्तेमाल किया जाता था.

इसकी पैकेजिंग इस तरह की गई थी कि यह माता-पिता को आश्वस्त करती थी कि वे इसे ‘पूरे यक़ीन के साथ’ दे सकते थे क्योंकि इसमें कोई नशीली चीज़ नहीं थी. हालांकि इसमें अल्कोहल की मात्रा 50 फ़ीसदी होती थी.

रॉयल फ़ार्मास्यूटिकल सोसायटी म्यूज़ियम के संरक्षक जॉन बैट्स कहते हैं: "यह शायद ताज्जुब लगे मगर तब तक अल्कोहल के प्रभाव का पता चल चुका था. वर्ष1941 में ग्रेट ब्रिटेन में बने एक क़ानून के बाद फ़ार्मास्यूटिकल उत्पादकों के लिए अपनी दवाओं में शामिल सामग्री की सूची दर्ज करना अनिवार्य कर दिया गया."

पिछले कुछ साल से रॉयल कॉलेज ऑफ़ फ़िज़ीशियंस अल्कोहल के कारण सेहत ख़राब होने के बारे में जागरूकता फैलाने का काम कर रहा है.

कॉलेज इस सिलसिले में कई क़दम उठा रहा है, जिसमें ब्रिटेन में अल्कोहल की प्रति यूनिट खपत पर 50 पेंस और मार्केटिंग और एडवर्टाइज़िंग पर कड़े प्रतिबंध लगाना शामिल है, ख़ासकर जब बच्चे इसके असर में आ रहे हैं.

कॉलेज का कहना है: "अल्कोहल कम से कम 40 गंभीर मेडिकल स्थितियों के लिए ज़िम्मेदार है, जिनमें लिवर की बीमारी और कैंसर शामिल हैं और ब्रिटेन में मौत की यह बड़ी वजह भी है, जिसे रोका जा सकता है."

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