तकनीक 'आसान करेगी विकलांगों की ज़िंदगी'

  • 30 नवंबर 2013
गूगल ग्लास

तकनीक शारीरिक और मानसिक विकलांगों की कई तरह से सहायता करती है और पिछले दस सालों से यह डेस्कटॉप कंप्यूटर से मोबाइल उपकरणों की ओर शिफ़्ट भी हो रही है.

आज स्मार्टफ़ोन मिनी कंप्यूटर की तरह हैं जिनमें विकलांग लोगों के लिए कई तरह के फ़ीचर भी होते हैं- यह बोल सकते हैं, सुनने के उपकरणों के साथ जुड़ सकते हैं और इस्तेमाल करने के दूसरे शानदार फ़ीचर भी होते हैं.

चैरिटी एबिलिटी नेट के रॉबिन क्रिस्टोफ़र्सन नेत्रहीन हैं और विकलांगता तकनीक समर्थक हैं.

उन्हें यकीन है कि आने वाले गूगल ग्लास जैसे स्मार्ट चश्मे- हैंड्स फ़्री, कान में लगे हुए, आंख और मुंह के नज़दीक और मोबाइल फ़ोन की ताकत वाले- विकलांग लोगों के लिए असली काम की चीज़ हैं.

क्रिस्टोफ़र्सन कहते हैं, "मेरे फ़ोन पर 'टॉकिंग गॉगल्स' नाम का एक ऐप है, जो सही वक्त में चीज़ों को पहचान सकता है."

वह उस वक्त का इंतज़ार कर रहे हैं जब स्मार्ट चश्मे के रूप में यह काम उनके लिए लगातार हो सकेगा.

बीबीसी के इस महीने के आउच टॉक शो में शामिल क्रिस्टोफ़र्सन ने उन चीज़ों को गिनाया जिनमें यह उपकरण कई तरह के विकलांग लोगों की मदद कर सकते हैं.

सटीक तकनीक

चश्मे में फ़ेशियल रिकग्निशन (चेहरा पहचानने वाला) सॉफ़्टवेयर सामने खड़े आदमी की भावनाओं को पढ़कर 'ख़ुश', 'दुखी' या 'नाराज़' जैसी चीज़ें बता सकता है. यह उन लोगों के लिए लाभप्रद हो सकता है जो दूसरों के चेहरों के भाव नहीं समझ पाते हैं- जैसे कि एस्परगेर्स सिंड्रोम में होता है.

बहरे लोगों को उसी वक्त उपसंवाद मिल सकते हैं ताकि वह देख सकें कि लोग उनसे क्या कह रहे हैं- ठीक वैसा ही जैसा टीवी में होता है.

मोबाइल फ़ोन और चश्मे बहुउत्पादित तकनीक हैं और इनके उन उपकरणों के मुकाबले ज़्यादा इस्तेमाल किए जाने की उम्मीद है जो ख़ासतौर पर विकलांगों के लिए बनाया जाता है.

हर अक्सर सुनते हैं कि लकवाग्रस्त लोग अपने दिमाग से कंप्यूटर को नियंत्रित करते हैं. यह सिर्फ़ ईमेल करने और वर्ड प्रोसेसिंग तक ही सीमित नहीं रहेगा यह आगे बढ़कर कृत्रिम अंगों को नियंत्रित करने तक जा सकता है.

क्रिस्टोफ़र्सन इसे तकनीक को "परिपक्व" होना कहते हैं, लेकिन आप यूं ही जाकर इसे मास्क की तरह पहन नहीं सकते.

वह कहते हैं, "इस वक्त सबसे सफल इंटरफ़ेस अंदर घुसने वाला है. आप एक सर्जरी करवाकर इसे अपने दिमाग में लगवा लेते हो."

"यह बहुत सटीक तकनीक है. आप वीडियो (इंटरनेट पर) देख सकते हो और जिन लोगों ने रोबोटिक हाथ लगवा रखा है, वह उससे कॉफ़ी भी पी सकते हैं."

वह कहते हैं कि इस तकनीक को ज़मीन पर आने में अभी कुछ महीने या कुछ साल की देरी है. एबिलिटी नेट, ब्रेनएबल नाम की एक यूरोपीय परियोजना के साथ मिलकर इस क्षेत्र में काम कर रहा है.

गूगल चालक-रहित कार

उनका ध्यान एक अन्य तकनीक पर भी है जो ज़्यादातर विकलांग लोगों की सूची में काफ़ी ऊपर है- चालकविहीन कार. क्रिस्टोफ़र्सन को लगता है कि यह "बस कुछ साल दूर हैं" और सामान्य कार के मुकाबले इनकी क़ीमत 5 लाख रुपये से 10 लाख रुपए तक अधिक हो सकती है.

लेकिन विकलांग समुदाय की एक चिंता यह है कि अगर यह तकनीक विकसित हो भी जाती है तो कानून बनाने वाले या आम लोग विकलांगो को यह कारें चलाने "नहीं" देंगे.

लेकिन क्रिस्टोफ़र्सन को लगता है कि कंप्यूटर-चालित कारों को स्वीकार करने में वक्त तो लगेगा लेकिन इनके प्रति विश्वास जम ही जाएगा.

क्रिस्टोफ़र्सन कहते हैं, "वेंचर कैपिटिलिस्ट- गूगल वेंचर्स- ने 16.29 अरब रुपये से ज़्यादा 25,000 खुद चलने वाली टैक्सी ख़रीदने में निवेश किए हैं."

इन टैक्सियों को अंतरराष्ट्रीय टैक्सी कंपनी युबेर इस्तेमाल कर रही है, "विशेषकर इसलिए ताकि उन्हें टैक्सी ड्राइवरों को पैसे न देने पड़ें."

तो हो सकता है कि भविष्य में हमें ऐसी गाड़ी में जाना पड़े जो कंप्यूटर से चलती हो या ऐसी कार जिसे एक विकलांग व्यक्ति चला रहा हो जो कंप्यूटर पर नियंत्रण करने में असमर्थ हो.

क्या इनमें कोई फ़र्क है? और आप इनमें से किसे चुनेंगे?

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