..जहां मिलता है टिड्डे, बिच्छू और कीड़ों से बना खाना

  • 22 नवंबर 2013
पेरिस के होटल में परोसे जाते कीड़े

फ्रांस के कई नामी होटलों में आजकल बिच्छू और टिड्डों से बने पकवान परोसे जा रहे हैं. दिलचस्प बात ये है कि दुनिया भर में प्रोटीन की बढ़ती माँग को लेकर चिंतित लोग कीड़ों को एक समाधान के रूप में देख रहे हैं.

हम और आप भले ही इसे 'कीड़ें खाना' कहें, लेकिन फ्रांस में लोग इसके लिए एक बढ़िया शब्द 'इंटेमोफैगी' का इस्तेमाल करेंगे.

वैसे विश्व के विभिन्न हिस्सों में किसान हज़ारों साल से कीड़ों का अचार और मुरब्बे बनाते रहे हैं. लेकिन अब यह बड़े होटलों और रेस्तरां में पाक-कला का हिस्सा बन रहे हैं.

फ्रांस के नाइस शहर में रहने वाले शेफ़ डेविड फॉउरे अपने एफ़्रोडाइट रेस्तरां में लोगों को एक 'वैकल्पिक भोजन' परोसते हैं जिसमें कीड़ें और झींगुर से बने व्यंजन भी शामिल हैं.

रोचक पहेली

अब तो पेरिस के करीब रेस्तरां मांटमारतरे अपने ग्राहकों को कीड़ों के मेन्यू में से अपना पसंदीदा विकल्प चुनने का मौका देते हैं.

यहाँ आप प्रकृतिक शराब के साथ कीड़े, चुकंदर और कुकुरमुत्ते का तेल, पानी में संरक्षित बिच्छू के साथ काली मिर्च और काली लहसुन या टिड्डों के साथ बटेर के अंडों का लुफ़्त उठा सकते हैं.

26 वर्षीय शेफ़ एली डेविरॉन कहते हैं, "मैं अपनी अनोखी पृष्ठभूमि के कारण इस तरफ़ आकर्षित हुआ. मैं एक प्रशीक्षित रसोइया हूँ, लेकिन मैंने अपनी पढ़ाई राजनीति विज्ञान और समाजशास्त्र में की है."

एली डेविरॉन कहते हैं कि यह एक रोचक पहेली है कि मैं लोगों को कीड़े खाने के लिए कैसे समझाऊं?

उनका कहना है, "एक तरफ़ तो दुनिया को भोजन उपलब्ध करवाने के लिए नए श्रोतों की खोज का बड़ा सवाल है. तो दूसरी तरफ़ इसे बेहतर ढंग से परोसने और स्वादिष्ट बनाने की चुनौती भी है."

कीड़े और बिच्छू

डेविरॉन फ्रांसीसी मानविज्ञानी क्लाउडे लेवी-स्ट्रॉस को का जिक्र करते हैं, जिन्होंने "सैक्रोफ़ैगी" और "ज़ूफैगी" के बीच अंतर किया.

कई समाजों में सैक्रोफैजी का चलन है, जहां मांस को छिपाकर खाया जाता है. जैसे ब्रितानी तरीके से मांस को पेस्ट्री की परतों के बीच रखकर परोसा जाता है.

इसके ठीक विपरीत ज़ूफैगिस्ट ( मांसाहारी) मांस को सीधे तौर पर पहचान के साथ खाना पसंद करते हैं.

डेविरॉन काफ़ी हद तक ज़ूफैगिस्ट हैं. वो कहते हैं, "हम कीड़े खाने के लिए दो तरीके अपना सकते हैं. कृषि उद्योग कीड़ों को आटे या सूजी के रूप में परिवर्तित करके पेश करें. लेकिन मैं इस धारणा को बनाए रखना चाहता हूँ कि कीड़ें वास्तविक और संपूर्ण जीव है."

उनके यहाँ इस्तेमाल होने वाली पाँच प्रजातियां थाइलैण्ड से मंगाई जाती है. अन्य दो प्रजातियां रेशम के कीड़ें और पानी के बिच्छू हैं.

इसके कारण उनके पकाने की संभावनाएं सीमित हो जाती है, इसलिए अभी उनका मुख्य काम आकार, रंग और स्वाद के आधार पर चीज़ों को व्यवस्थित करना है.

भविष्य की चुनौती

उनका कहना है कि नाश्ते की क़ीमत आठ से दस यूरो तक आती है, वो सस्ते नहीं हैं. "हमारे अधिकांश ग्राहक नवीनता के कारण आकर्षित होते हैं. शराब परोसने के बाद ग्राहकों में इस तरह के नाश्ते की मांग बढ़ जाती है."

डेविरॉन अपने ग्राहकों का अनुभव सुनाते हुए कहते हैं, "कुछ लोग कहते हैं कि उन्हें यह पूरा विचार घृणित लगता है, इसलिए वो कोशिश भी नहीं करते. कुछ लोग कोशिश करते हैं और नापसंद जाहिर करते हैं, लोगों को एक बात से निराशा होती है कि हमारे पास सीमित विकल्प हैं."

खाने में टिड्डा
खाद्य और कृषि संगठन की रिपोर्ट में कीड़ों को भविष्य का संभावित आहार माना है.

यह महज़ इत्तेफाक़ नहीं है कि कीड़े खाने का वैज्ञानिक पहलू यूरोप में रुचि का विषय बन रहा है. फ्रांस और नीदरलैंड्स में इस बात को लेकर शोध हो रहे हैं कि छोटे स्तर की कीड़ों की खेती करने के तरीके खोजे जा रहे हैं.

संयुक्त राष्ट्र के खाद्यान और कृषि संगठन (एफ़एओ) की रिपोर्ट के मुताबिक़ विश्व की आबादी नौ अरब होने की तरफ बढ़ रही है.

एफ़एओ का कहना है कि 2050 तक जानवरों से मिलने वाले प्रोटीन की माँग दोगुनी हो जाएगी और इस कमी को पूरा करने के लिए लिए संस्था ने कीड़ों की 1,900 प्रजातियों की सूची बनाई है.

एफ़एओ के अनुसार, "माइक्रो-लाइव स्टॉक हमें मांस या मछली के बराबर विटामिन या खनिज प्रदान कर सकते हैं. इनकी क़ीमत भी उनके मुकाबले काफ़ी कम होगी."

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