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साइंस फ़िक्शन में कितना विज्ञान, कितनी फंतासी ?

 शुक्रवार, 18 अक्तूबर, 2013 को 08:19 IST तक के समाचार
विज्ञान कथा, स्पेस, अंतरिक्ष विज्ञान, फ़िल्में

हाल ही में रिलीज़ हुई हॉलीवुड फ़िल्म 'ग्रेविटी' ने इस बहस को जन्म दे दिया है कि कोई साइंस फिक्शन यानी विज्ञान कथा कितनी सही हो सकती है. पीटर रे एलीसन पूछ रहे हैं कि क्या फ़िल्म निर्माताओं को मूल वैज्ञानिक सिद्धांतों को नहीं छोड़ना चाहिए या दर्शकों को उनसे सिर्फ़ जादू की उम्मीद रखनी चाहिए.

विज्ञान और विज्ञान कथा के बीच हमेशा धुंधला रिश्ता रहा है.

'ग्रेविटी' की कहानी दो अंतरिक्ष यात्रियों के बारे में है जो अपने अंतरिक्ष यान के नष्ट होने के बाद अंतरिक्ष में भटक गए हैं. अमरीका में इस फ़िल्म की रिलीज़ के बाद से कई आलोचकों ने फ़िल्म की पुख़्ता वैज्ञानिक तथ्यों के लिए प्रशंसा की है.

मगर जाने-माने तारा भौतिकविद् और न्यूयॉर्क के 'अमेरिकन म्यूज़ियम ऑफ़ नेचुरल हिस्ट्री' में हेडन प्लेनेटेरियम के निदेशक डॉ. नील दिग्रास टायसन को 'ग्रेविटी' में दिखाए गए अंतरिक्ष की सत्यता को लेकर कई शिकायतें हैं.

ट्विटर पर कई पोस्टों के ज़रिए टायसन ने इन ग़लतियों का ज़िक्र किया है. हालांकि बाद में उन्होंने यह भी जोड़ दिया कि उन्होंने ‘फ़िल्म का पूरा आनंद लिया.’

'सैंड्रा के बाल बिखरे क्यों नहीं?'

उनका कहना है कि समुद्र की सतह से साढ़े तीन सौ मील ऊपर कक्षा में स्थापित हबल स्पेस टेलिस्कोप, ढाई सौ मील पर चक्कर काट रहे इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन और एक चीनी स्पेस स्टेशन कभी एक साथ नहीं दिखाई दे सकते.

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इसके अलावा ज़्यादातर उपग्रह पश्चिम से पूर्व की तरफ़ पृथ्वी का चक्कर लगाते हैं जबकि फ़िल्म में उपग्रह का कचरा पूर्व से पश्चिम में जाता दिखाया गया है.

टायसन ने यह भी कहा कि अगर सैंड्रा बुलक ज़ीरो ग्रेविटी में हैं तो उनके बाल मुक्त रूप से क्यों नहीं फैले हुए दिखाए गए.

असल में यह भौतिकी की ग़लती नहीं है बल्कि यह सिनेमाई तकनीकी की सीमाएं उजागर करता है कि वह ज़ीरो ग्रेविटी में अभिनेताओं को प्रदर्शित नहीं कर पाई. और वह भी फ़िल्म के दौरान उन्हें अंतरिक्ष में भेजे बगैर.

विज्ञान कथा में हमेशा से वैज्ञानिक सत्यता का आग्रह रहा है, ख़ासकर ‘पूरी तरह से विज्ञान कथा’ साहित्यिक श्रेणी में.

मगर विज्ञान कथाएँ, ख़ासकर फ़िल्मों में अक्सर अलंकारिक दृष्टिकोण अपना लेती है, जहां ज़्यादातर यथार्थवाद फ़िल्मी दृश्यों की ख़ूबसूरती की भेंट चढ़ जाता है.

फ़िल्म 'आर्मागेडॉन' को उसकी ढेरों वैज्ञानिक ग़लतियों के लिए जाना जाता है. इसमें अंतरिक्ष यानों से अलग होते एक-दूसरे से टकराने को तैयार रॉकेट बूस्टर और ईंधन की टंकियां और धरती की तरह गुरुत्वाकर्षण के तहत खिंचते एस्टेरॉयड दिखाए गए हैं.

नासा का इनकार

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कहा जाता है कि नासा ने 'आर्मागेडॉन' को अपने ट्रेनिंग प्रोग्राम के तहत टेस्ट के बतौर इस्तेमाल किया है और उम्मीदवारों से फ़िल्म में मौजूद तमाम वैज्ञानिक असंभव बातों को पहचानने तक को कहा है.

डैनी बॉयल की फ़िल्म 'सनशाइन' में भौतिक विज्ञानी प्रो. ब्रायन कॉक्स के बतौर वैज्ञानिक सलाहकार जुड़े होने के बावजूद कलात्मक गड़बड़ियां दिखीं. सूर्य के आसपास संचार का एक ‘डेड ज़ोन’ है जिसे इस दुनिया के नियमों से समझाना मुश्किल है.

उलटे दावों के बावजूद फ़िल्म 'रेड प्लेनेट' ऐसे वैज्ञानिक विरोधाभासों से भरी है. इनमें आधुनिक उपकरणों से लेकर 30 साल पुरानी रूसी तकनीकी में तालमेल बैठाने से लेकर 30 साल पहले मंगल पर भेजी गई काई खाने वाले ‘नेमेटोड्स’ तक शामिल हैं.

नेमेटोड्स असल में कृमि होने चाहिए थे लेकिन वे भौंरों की शक्ल में दिखाए गए. इसके अलावा इस बारे में भी फ़िल्म कुछ नहीं बताती कि वे मंगल से बाहर से आई काई को कैसे खाने लगे और पहले क्या खाते थे.

पूरी फ़िल्म में विज्ञान इतना ‘सृजनात्मक’ दिखाया गया है कि नासा ने इस फ़िल्म का वैज्ञानिक सलाहकार बनने से ही इनकार कर दिया.

मगर वैज्ञानिक छूट लेने के मामले में ढेरों अंतरिक्ष आधारित नाटक शायद सबसे आगे हैं.

'अंतरिक्ष में नहीं होती आवाज़'

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टेलीस्पाज़ियो वेगा ड्यूशलैंड नाम की कंपनी में स्पेसक्राफ़्ट इंजीनियर एड ट्रॉलोप कहते हैं, ‘‘ख़राब विज्ञान’ का सबसे मशहूर उदाहरण जिसे दुनियाभर में विज्ञानकथाओं में प्रयोग किया जाता रहा है, वह है ध्वनि. चूंकि अंतरिक्ष में निर्वात यानी वेक्यूम है तो वहां कोई आवाज़ नहीं होती, इसका मतलब है कि इतने बड़े धमाके और इंजनों की आवाज़ वहां नहीं होनी चाहिए.’

सिनेमा में जब किसी स्पेसक्राफ़्ट में धमाका होता है तो इसका कारण होता है कि यह दर्शक को उसके सामने दिख रहा है. मगर वैज्ञानिकों को और कई बातें कबूलने में गुरेज़ है.

ट्रॉलोप कहते हैं, "अंतरिक्ष में अपने इंजनों को चालू रखने के कई कारण होते हैं लेकिन उनकी ‘गति बनाए रखना’ इसका कारण नहीं है. अगर आप अपने इंजन बंद कर देते हैं तो भी आप रुकते नहीं हैं."

कुछ लोग दूसरों से बेहतर कर दिखाते हैं. वह बताते हैं, "मैं इस ग़लती के आधार पर किसी फ़िल्म/किताब/शृंखला का नाम नहीं लूंगा क्योंकि यह बेहद सामान्य बात है लेकिन मैं इस बारे में पुराने टीवी शो 'बेबीलोन 5' की प्रशंसा करूंगा कि उन्होंने अंतरिक्ष यात्रा में जड़ता को किस ख़ूबसूरती के साथ पेश किया है."

'2001: अ स्पेस ओडिसी' में स्पेसक्राफ़्ट के शांत दृश्य उसेक बाद के अंतरिक्ष यात्रा के कई उदाहरणों के मुक़ाबले असलियत के काफ़ी क़रीब हैं.

कुछ 'सच्ची' विज्ञान कथाएं

विज्ञान कथा लेखक चार्ल्स स्ट्रॉस कहते हैं, "वैज्ञानिक सत्यता का क्लासिक उदाहरण लैरी निवेन के उपन्यास रिंगवर्ल्ड का पहला संस्करण है जिसे 1971 में ह्यूगो और नेबुला अवॉर्ड मिले थे. लेखक ने अनजाने ही ऐसे कई दृश्यों का ज़िक्र किया था जिनमें बताया गया था कि पृथ्वी अपनी धुरी पर ग़लत दिशा में चक्कर काटती है."

निवेन ने अपने दूसरे संस्करण में इस ग़लती को सुधार लिया था.

डंकन जोंस की फ़िल्म 'मून' की प्रशंसा इस बात के लिए की गई थी कि उसमें चांद पर हीलियम-3 गैस की खुदाई को काफ़ी सच्चाई के साथ दर्शाया गया था.

हीलियम-3 पृथ्वी पर पाई जाने वाली दुर्लभ गैस है लेकिन चांद पर वह आराम से मिल जाती है और किसी इंसान की देखरेख में स्वचालित तरीक़े से उसे निकालना संभव है. मगर इस खनन के अर्थशास्त्र का फ़िल्म में कोई ज़िक्र नहीं था.

'कॉन्टेक्ट' में एलिएन सिग्नल असल में इसका उदाहरण है जो सेती (सर्च फ़ॉर एक्स्ट्रा टैरेस्ट्रियल इंटेलीजेंस) अंतरिक्ष में खोज रही है.

इस पर किसी को कोई ताज्जुब नहीं होना चाहिए क्योंकि 'कॉन्टेक्ट' को खगोलशास्त्री कार्ल सैगान ने ख़ुद लिखा था. संदेश भेजने में गणित का इस्तेमाल का मतलब समझ आता है और यही नहीं सिग्नल भेजने और हासिल करने में लगने वाली देरी को भी सही ढंग से दर्शाया गया है.

विज्ञान कथा से सिर्फ यही उम्मीद नहीं की जाती कि वह विज्ञान को सही ढंग से पेश करेगा बल्कि उससे भविष्य में होने वाले विकास की व्याख्या करने की भी उम्मीद की जाती है.

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