यूरोपीय देशों पर कैंसर बना अरबों का बोझ

  • 15 अक्तूबर 2013
फेफड़ा कैंसर

यूरोपीय संघ के देशों में कैंसर के आर्थिक पहलू पर पहली बार हुए एक सर्वेक्षण से पता चला है कि इस बीमारी से करीब 10,458 अरब रुपये का बोझ पड़ता है.

एक समाजसेवी संगठन कैंसर रिसर्च यूके ने इसे ''भारी बोझ'' कहा है.

लांसेट आंकोलॉजी में प्रकाशित इन आंकड़ों में दवाओं, इलाज और इस दौरान कमाई के नुकसान को भी शामिल किया गया है.

फेफड़े का कैंसर सबसे महंगी बीमारी है.

ऑक्सफोर्ड यूनीवर्सिटी और किंग्स कॉलेज लंदन के शोधकर्ताओं ने 2009 में यूरोपीय संघ के सभी 27 देशों के आंकड़ों का अध्ययन किया था.

दवाओं पर 5,100 अरब रुपये

अध्ययन में पाया गया कि चिकित्सकों के समय और दवाओं पर ही होने वाला खर्च 4,233 अरब रुपये बैठता है.

बीमारी के कारण छुट्टी करने या कम उम्र में ही बीमार हो जाने के कारण उत्पादकता पर कुल 4,316 अरब रुपये का असर पड़ता है.

जबकि इलाज कराने वाले परिजनों पर कुल 1,932 अरब रुपये का भार पड़ता है.

जर्मनी और लक्जमबर्ग जैसे धनाढ्य देश, बुल्गारिया और लिथुआनिया जैसे पूर्वी यूरोप के देशों की अपेक्षा कैंसर पर प्रति व्यक्ति खर्च ज्यादा करते हैं.

कम उम्र का मुद्दा

कैंसर की अन्य बीमारियों की अपेक्षा फेफड़े का कैंसर कम उम्र में ही हो जाता है.

इसलिए कम उम्र में उत्पादकता खत्म होना एक बड़ा मुद्दा है.

यूरोप में कैंसर की कुल बीमारियों में फेफड़ों के कैंसर से पीड़ितों की संख्या दसांश है.

हालांकि, इसका आर्थिक बोझ डिमेंशिया (मतिभ्रम) और हृदय रोगों पर होने वाले खर्च से कम है.

डिमेंशिया और हृदय रोग

शोधकर्ताओं के इसी समूह द्वारा पूरे यूरोपीय संघ में किए गए अध्ययन के अनुसार, रक्तचाप और हृदयाघात का कुल आर्थिक बोझ 14,027 अरब रुपये प्रति वर्ष है.

जबकि पश्चिमी यूरोप के 15 देशों पर डिमेंशिया का कुल आर्थिक बोझ 15,687 अरब रुपये है.

डिमेंशिया पर खर्च ज्यादा होता है क्योंकि इसका इलाज लंबा चलता है. जबकि हृदय संबंधी रोगों के इतने प्रकार हैं कि यह कैंसर से भी ज्यादा लोगों को प्रभावित करता है.

ऑक्सफोर्ड यूनीवर्सिटी के हेल्थ इकोनामिक्स रिसर्च सेंटर से जुड़े डॉ. रैमोन लूएंगो-फर्नाडीज़ बताते हैं, ''विभिन्न बीमारियों के कारण पड़ने वाले बोझ के आकलन से ऐसी बीमारियों पर शोध के लिए फंडिंग में मदद मिलती है, जिनसे आर्थिक क्षति सबसे ज्यादा होती है.''

नीति निर्माताओं से उम्मीद

किंग्स कॉलेज लंदन के प्रोफेसर रिचर्ड सुलिवान ने कहा, ''यह महत्वपूर्ण है कि पूरे यूरोप के नीति निर्माता इस सूचना का इस्तेमाल विभिन्न बीमारियों को वरीयता क्रम में रखने के लिए कर सकते हैं.''

कैंसर रिसर्च यूके के मुखिया (नीति), सारा ओसबोर्न के अनुसार, ''पूरे यूरोप की अर्थव्यवस्था पर कैंसर का बहुत बड़ा आर्थिक बोझ है क्योंकि लोग कम उम्र में ही बीमारी से मारे जाते हैं और इस कारण उत्पादकता प्रभावित होती है.''

उन्होंने कहा कि, ''हमें यह भी समझने की ज़रूरत है कि अन्य यूरोपीय देशों के बराबर खर्च किए जाने के बावजूद इंग्लैंड में कैंसर की मृत्युदर क्यों ऊंची बनी हुई हैं.''

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