डिजिटल इंडिया: क्यों पिछड़ी और कैसे हाइटेक होगी हिंदी?

  • 13 सितंबर 2013
hindi, computer user

गद्य, पद्य और साहित्य से लदी हुई हिंदी की आम छवि डिजिटल जगत में तेज़ी से बदलती दिख रही है. हिंदी अपने नए अवतार में युवाओं के एक वर्ग को ‘कूल’ लगती है.

ढेरों तकनीकी सुधार और लिखावट के तरीके में मामूली बदलाव का इंटरनेट पर हिंदी का प्रयोग करने वालों की संख्या पर भी अब असर दिखाता है.

कंप्यूटर पर भाषाओं की तकनीक के जानकार मानते हैं कि इंटरनेट पर अब अंग्रेज़ी से ज़्यादा हिंदी और अन्य क्षेत्रीय भाषाएं फल-फूल रही हैं.

इंटरनेट की सबसे बड़ी कंपनी गूगल के भारत के प्रमुख राजन आनंदन ने बीते दिनों एक साक्षात्कार में कहा, “इंटरनेट पर अगले 30 करोड़ नए यूज़र्स अंग्रेज़ी नहीं बल्कि भारतीय भाषाएं बोलने वाले आएंगे.”

वैसे शुरूआती दौर में ब्लॉगिंग से इंटरनेट पर हिंदी को काफ़ी प्रचार मिला लेकिन ब्लॉगिंग का वो जुनून लंबे समय तक टिक नहीं सका.

सोशल मीडिया ने ब्लॉगिंग को पछाड़ा?

हिंदी के ब्लॉग्स को जुटाने वाले और इंटरनेट पर हिंदी के क्षेत्र में कार्य करने वाली वेबसाइट ब्लॉगवाणी डॉट कॉम के संस्थापक मैथिली शरण गुप्ता ब्लॉगिंग के रुझान में गिरावट के पीछे सोशल मीडिया को ज़िम्मेदार ठहराते हैं.

मैथिली शरण गुप्ता कहते हैं, “हिंदी ब्लॉगिंग के चलन में खासतौर पर साल 2004 के बाद से उछाल आया, लेकिन ये उछाल ज़्यादा समय तक टिक नहीं पाया क्योंकि मुझे लगता है कि इन ब्लॉग्स में लोगों के काम की बात कम नज़र आती थी और कथा-कहानियां, निबंध ज़्यादा होते थे. लिहाज़ा लोग इससे अलग होते गए. आज के दौर में फ़ेसबुक ने ब्लॉगिंग को पूरी तरह से ख़त्म कर दिया है. हालांकि हिंदी को इसने फायदा पहुंचाया है.”

उन्होंने कहा, “इंटरनेट पर हिंदी को सबसे अधिक फ़ायदा पहुंचाया अख़बारों की वेबसाइटों ने, जिसने लोगों को खूब जोड़ा. आंकड़ों को ही देख लीजिए, आज मुझे कई अखबारों की वेबसाइटों में काम कर रहे दोस्त बताते हैं कि उनका रोज़ का दो लाख से पांच लाख तक का ट्रैफ़िक होता है. जबकि, किसी भी अच्छे हिंदी ब्लॉग में रोज़ के पांच हज़ार लोग भी आ जाएँ तो उसे सुपरहिट माना जाता था.”

मैथिली शरण गुप्ता कहते हैं कि इंटरनेट पर हिंदी वेबसाइटों पर जितनी तेज़ी से लोग आ रहे हैं, उतनी ही तेज़ी से इन वेबसाइटों की कमाई भी बढ़ रही है, लिहाज़ा भविष्य हिंदी का ही है. उन्होंने कहा, “भविष्य हिंदी और अन्य भाषाई वेबसाइटों का ही है. अगले चार साल में हम इस क्षेत्र में अप्रत्याशित बढ़त देखेंगे.”

हिंदी की तकनीक

हिंदी के चलन में आई तेज़ी के लिए तकनीकी सुधार भी काफ़ी हद तक ज़िम्मेदार है. सीडैक जैसी सरकारी और कई गैर-सरकारी संस्थाओं ने हिंदी फॉन्ट्स बनाने और उनमें सुधार के लिए महत्वपूर्ण योगदान किया है.

भारत सरकार का उपक्रम सीडैक (प्रगत संगणन विकास केंद्र) पिछले करीब 25 साल से कंप्यूटरों पर भारतीय भाषाओं की उपलब्धता बढ़ाने और उसे बेहतर करने पर काम कर रहा है.

संस्था के निदेशक, प्रोफेसर रजत मूना मानते हैं कि हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं की तकनीक में जो सुधार किए जा रहे हैं उससे इंटरनेट पर उनकी उपयोगिता बढ़ेगी.

उन्होंने कहा, “सीडैक शुरुआत से ही हिंदी को डिजिटल जगत में प्रयोग के लिए तकनीकी तौर पर और आसान बनाने पर काम कर रहा है. कंप्यूटरों पर हिंदी के स्थाई उपयोग के लिए हमने कई सॉफ्टवेयर भी बनाए, जिसमें आईलीप सर्वाधिक लोकप्रिय रहा.”

प्रोफेसर मूना कहते हैं, “हिंदी की टाइपिंग अब भी कई लोगों के लिए एक समस्या है, लोग ज़्यादातर अंग्रेज़ी में टाइप करते हैं. इस समस्या को दूर करने के लिए हम स्पीच और हैंडराइटिंग रिकग्नीशन तकनीक पर काम कर रहे हैं. ये सॉफ्टवेयर प्रयोग में हैं लेकिन इनमें सुधार किया जा रहा है. भविष्य में हम ऐसी कई अन्य तकनीक देखेंगे जिसमें ऑडियो या हस्तलिखित संदेश का अनुवाद करना आसान हो जाएगा.”

वो कहते हैं, “हिंदी को मोबाइल और टैबलेट जैसी डिवाइसेस पर लाने के लिए प्रयोग किए जा रहे हैं. हमारी कोशिश है कि इन जगहों पर हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं को तकनीकी दिक्कतों का सामना ना करना पड़े.”

शब्दकोश की कमी

सिर्फ़ सरकारी क्षेत्र की संस्थाएं ही नहीं बल्कि कई जुनूनी शख़्सियतों ने भी हिंदी को डिजिटल बनाने के लिए अपनी रातें खराब कीं.

मध्य प्रदेश के जगदीप सिंह दांगी को करीब पंद्रह साल पहले इंजीनीयरिंग की पढ़ाई करते वक्त एहसास हुआ कि कंप्यूटर पर हिंदी की ग़ैरमौजूदगी किसी हिंदीभाषी के लिए कितनी मुश्किलें पैदा कर सकता है.

पेशे से इंजीनियर जगदीप दांगी ने उसी वक्त एक हिंदी शब्दकोश बनाया जिसमें उन्होंने 40 हज़ार शब्द डाले. उन्होंने इसके बाद साल 2006 तक कई हिंदी फॉन्ट कनवर्टर, सॉफ्टवेयर बनाए जो आज भी चलन में है. लेकिन वो खुद भाषा को कंप्यूटर के लिए बाधा नहीं मानते.

keyboard, कीबोर्ड

उन्होंने कहा, “कंप्यूटर सिर्फ बाइनरी समझता है यानी 0 और 1. किसी भी भाषा को कंप्यूटर अपने तरीके से समझता है, लिहाज़ा जो भी अंग्रेज़ी या दूसरी किसी भाषा में हो सकता है, वो हिंदी में भी हो सकता है. उसे बस हिंदी में प्रोग्राम किए जाने की ज़रूरत होती है.”

जगदीप दांगी कहते हैं, “इस वक्त हिंदी को ज़रूरत है तो बस एक वृहद शब्दकोष की. शब्दों का मतलब जितना सटीक होता जाएगा, अनुवाद या टाइपिंग उतना ही अच्छा होगा.”

तकनीकी सुधार तो होते रहेंगे, लेकिन महत्वपूर्ण होगा ये देखना कि युवाओं को लिखने-पढ़ने में हिंदी का प्रयोग कितना सहज लगता है.

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