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जलवायु परिवर्तन से बढ़ रही हैं फ़सलों की बीमारियां

 शुक्रवार, 6 सितंबर, 2013 को 18:26 IST तक के समाचार

कीड़े-मकौड़ों के कारण दुनिया की 10 से 16 फीसदी फसल बर्बाद हो जाती है.

एक ताजा अध्ययन के मुताबिक़ जलवायु परिवर्तन के कारण फ़सलों को होने वाली बीमारियों और उन्हें नुक़सान पहुंचाने वाले कीड़े-मकौड़े तेज़ी से दुनियाभर में फैल रहे हैं.

एक्सेक्टर और ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के शोध से पता चला है कि फ़सलों में लगने वाले कीड़े प्रति साल तीन किलोमीटर की रफ्तार से बढ़ रहे हैं.

शोध टीम का कहना है कि ये कीड़े उत्तरी और दक्षिणी ध्रुव की और बढ़ रहे हैं और उन जगहों पर जमा हो रहे हैं जो उनके लिए कभी ठंढा हुआ करता था.

शोध के ये नतीजे नेचर क्लाइमेट चेंज नामक पत्रिका में प्रकाशित हुए हैं.

10 से 16 फ़ीसदी फ़सल बर्बाद हो जाती है

शोध के मुताबिक़ वर्तमान में बीमारियों के कारण दुनिया की 10 से 16 फ़ीसदी फ़सल बर्बाद हो जाती है. शोधकर्ताओं ने चेतावनी दी है कि वैश्विक स्तर पर तापमान में वृद्धि के कारण ये समस्या और गंभीर हो सकती है.

यूनिवर्सिटी ऑफ़ एक्सेक्टर के मुख्य शोधकर्ता डॉ. डैन बीबर का कहना है, ''अगले कुछ दशकों में वैश्विक खाद्यान सुरक्षा के रूप में हम एक अहम चुनौती का सामना करने जा रहे हैं.''

इस समस्या को जानने के लिए शोधकर्ताओं ने पिछले 50 सालों में दुनियाभर में पता किए गए फ़सलों में लगने वाले 612 कीड़ों-मकौड़ों से जुड़े आंकड़ों का अध्ययन किया.

इनमें गेहूं में लगने वाले फफुंद, अमरीका में चीड़ के पेड़ों में लगने वाले कीड़ों के साथ अन्य जीवणुओं और विषाणुओं का अध्ययन शामिल था. फफुंद अफ्रीका, मध्य पूर्व और एशिया में गेहूं में लगने वाले एक प्रमुख कीड़ें हैं.

शोधकर्ताओं ने पाया कि कीड़े-मकौड़ों के फैलने की गति अलग-अलग है. कुछ उड़ने वाले कीड़े हर साल 20 किलोमीटर की रफ्तार से बढ़ रहे हैं, वैसे 1960 से ये कीड़े औसतन तीन किलोमीटर प्रति साल की रफ्तार से फैल रहे हैं.

डॉ. बीबर का कहना है, ''हम इन कीड़ों को भूमध्य रेखा से ध्रुव की और बढ़ते हुए देख रहे हैं.''

अनाज़ का वैश्विक कारोबार ज़िम्मेदार

शोधकर्ताओं का मानना है कि एक देश से दूसरे देश तक कीड़े-मकौड़ों के पहुंचने के लिए मुख्य रूप से अनाज का वैश्विक कारोबार जिम्मेदार है.

हालांकि, ये कीड़े किसी नए क्षेत्र में तभी टिक पाते हैं जब वहां की जलवायु उनके लिए अनुकूल हो.

डॉ. बीबर कहते हैं, ''सबसे आसान परिकल्पना यह है कि वैश्विक जलवायु परिवर्तन के कारण ऐसा हो रहा है.''

उनका कहना है कि इसका एक उदाहरण कोलोराडो आलू में लगने वाले कीड़े हैं. गर्मी के कारण ये उत्तर की ओर बढ़ते हुए यूरोप के रास्ते फिनलैंड और नार्वे में पहुंच गए, जहां उनके लिए अनुकूल जलवायु है.

शोधकर्ताओं का कहना है कि कीड़े-मकौड़ों की गतिविधियों पर बेहतर सूचना का गंभीरता के मूल्यांकन कर समस्या की गंभीरता का पता लगाया जा सकता है.

डॉ. बीबर का कहना है, ''हमें अपनी सीमाओं को भी सुरक्षित बनाने की जरूरत है, हमें ऐसे पौधे लगाने होंगे, जिससे कि कृषि क्षेत्र में ये कीड़े न जा पाएं.''

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