कॉकरोचों को आप यूं ही नहीं हरा पाएंगे

  • 25 मई 2013
कॉकरोच
वैज्ञानिकों ने इनकी स्वाद ग्रंथियों का विश्लेषण किया.

अमरीकी शोधकर्ताओं के दल को यूरोप में कॉकरोचों की ऐसी किस्म मिली है जो कॉकरोच के लिए तैयार किए गए कीटनाशक को चखते ही पहचान लेते हैं.

जैव विकास के परिणामस्वरूप इन कॉकरोचों की स्वाद ग्रंथि परिवर्तित हो गई है. कीटनाशक गोलियों पर चढ़ाई गई चीनी की परत इन्हें मीठी के बजाय कड़वी लगती है.

नार्थ कैरोलिना स्टेट यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं के एक दल ने कॉकरोचों को जैम और पीनट बटर में से एक को चुनने का विकल्प दिया. इसके बाद वैज्ञानिकों ने इनकी स्वाद ग्रंथियों का विश्लेषण किया.

लंबा अध्ययन

शोधकर्ताओं के इसी दल ने बीस साल पहले किए गए अपने अध्ययन में पाया था कि कॉकरोचों के लिए तैयार किए गए कुछ कीटनाशक उन पर असर नहीं कर रहे हैं क्योंकि कॉकरोच कीटनाशक मिलाकर रखी गई गोलियों को खाते ही नहीं थे.

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डॉक्टर कॉबी शाल ने साइंस जर्नल में इस शोध के बारे में समझाते हुए कहा है कि "इस नए अध्ययन से कॉकरोचों के इस व्यवहार के पीछे की स्नायविक प्रक्रिया सामने आ चुकी है."

इस प्रयोग के पहले चरण में वैज्ञानिकों ने भूखे कॉकरोचों को पीनट बटर और ग्लूकोज़ वाला जैम खाने को दिया.

कॉकरोचों के लिए तैयार किए गए कुछ कीटनाशक उन पर असर नहीं कर रहे हैं
कॉकरोचों के लिए तैयार किए गए कुछ कीटनाशक उन पर असर नहीं कर रहे हैं

जैम में ग्लूकोज़ की मात्रा बहुत ज्यादा होती है जबकि पीनट बटर में काफी कम ग्लूकोज़ होता है.

डॉक्टर कॉबी कहते हैं, ''आप देख सकते हैं कि ये कॉकरोच जेली खाते ही झटका खा कर पीछे हट जाते हैं लेकिन पीनट बटर पर वे टूट पड़ते हैं.

चालाक कॉकरोच

वैज्ञानिकों ने कॉकरोचों को स्थिर कर दिया और उनकी स्वाद कोशिकाओं का अध्ययन करने के लिए उन्हें पतले-पतले तारों से जोड़ दिया. ये स्वाद कोशिकाएं कॉकरोचों के मुँह पर स्थित नन्हें बालों में जमे स्वाद का अनुभव करती हैं.

डॉक्टर शाल के अनुसार, ''ग्लूकोज़ चखने पर कॉकरोचों की स्वाद कोशिकाओं में वैसी ही प्रतिक्रिया हुई जैसी प्रतिक्रिया आमतौर पर उनमें कड़वी चीजें चखने पर होती है. 'इसका अर्थ है कि इन कॉकरोचों को ग्लूकोज़ भी कड़वा लग रहा है."

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डॉक्टर शाल बताते हैं कि ''ग्लूकोज़ को चखने पर कॉकरोचों की उन कोशिकाओं में भी प्रतिक्रिया होती है जो मीठा खाने पर सक्रिय होती हैं. लेकिन कड़वे स्वाद की ग्रंथियां इन्हें बीच में ही रोक देते हैं जिसकी वजह से आखिर में इसका स्वाद कड़वा प्रतीत होता है.

इन कॉकरोचों के व्यवहार को स्प्ष्ट करते हुए डॉक्टर शाल कहते हैं कि ''ये कॉकरोच ग्लूकोज़ खाने पर वैसा ही व्यवहार करते हैं जैसा कि छोटे बच्चे पालक का साग खाने पर करते हैं.''

''ग्लूकोज़ चखने पर ये कॉकरोच अपना सिर झटकते हैं तथा उसे और चखने से मना कर देते हैं.''

जैव विकासवाद की ऐतिहासिक होड़

ग्लूकोज़ चखने पर ये कॉकरोच अपना सिर झटकते हैं तथा उसे और चखने से मना कर देते हैं
ग्लूकोज़ चखने पर ये कॉकरोच अपना सिर झटकते हैं तथा उसे और चखने से मना कर देते हैं

लंदन स्थित इंस्टीट्यूट आफ जूलॉजी की डॉक्टर एली लीडबीटर ने इस प्रयोग पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा, ''यह एक रोचक काम है.''

डॉक्टर एली कहती हैं ''असल में प्राकृतिक चयन जब स्वाद क्षमता को परिवर्तित करता है तो यह जंतुओं को किसी खास स्वाद के प्रति कम या ज्यादा संवेदनशील बना देता है. जैसे कि शहद एकत्रित करने वाली मक्खियाँ दूसरी मक्खियों की तुलना में चीनी के प्रति कम संवेदनशील होती हैं. इसका मतलब है कि शहद बनाने वाली मक्खियां केवल गाढ़ा शहद ही एकत्रित कर सकती हैं. जैविक विकास ने उनके लिए चीनी को कम मीठा कर दिया है लेकिन अभी भी वो चीनी को पसंद करती हैं.''

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डॉक्टर एली कहती हैं कि "इन कॉकरोचों को चीनी कड़वी लग रही है. प्राकृतिक चयन का यह एक आसान तरीका है जिससे ऐसे कॉकरोचों का जन्म होता है जो चीनी में लपेट कर रखी गई जहरीली गोलियों को नहीं खाते."

डॉक्टर शाल कहते हैं, ''मनुष्य और कॉकरोचों के बीच चल रही ऐतिहासिक होड़ में यह एक नया अध्याय है. हम कॉकरोचों को मिटाने के लिए कीटनाशक बनाते जा रहे हैं और कॉकरोच इन कीटनाशकों से बचने के उपाय करते जा रहे हैं''

डॉक्टर शाल कहते हैं, ''कॉकरोचों का मैं बहुत सम्मान करता हूं. वो हम पर निर्भर हैं लेकिन वो हमारा फायदा उठाना भी जानते हैं.''

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