फ़ेसबुक 'लाइक' बताती है आप कौन हैं

  • 12 मार्च 2013
फ़ेसबुक
फ़ेसबुक पर लाइक बटन को लेकर मुक़दमा भी हो चुका है

फ़ेसबुक पर आपके ज़रिए ' लाइक' की गई सामग्री आपकी राजनीतिक विचारधारा, लैंगिकता, समझबूझ के बारे में संकेत देती है.

ब्रिटेन के केंब्रिज विश्वविद्यालय में शोधकर्ताओं के एक दल ने इस अध्ययन से लोगों के धर्म, उनकी नस्ल और लैंगिकता के बारे में अनुमान लगाए हैं.

ये शोध ' पीएनएएस' नाम के एक जर्नल में छपा है और शोधकर्ताओं के मुताबिक जिन लोगों पर अध्ययन हुआ, उनके बारे में बहुत ही सटीक जानकारी देता है.

लेकिन निजता के अधिकार का आंदोलन चला रहे लोगों का कहना है कि ये अध्ययन 'ख़तरे की घंटी' है.

कौन मुस्लिम है, कौन ईसाई

इस शोध के लिए वैज्ञानिकों ने 58 हज़ार लोगों के फ़ेसबुक अकाउंट का अध्ययन किया. उन लोगों के फे़सबुक 'लाइक' के अलावा उनके व्यक्तित्व की जांच करने वाले टेस्ट की रिपोर्ट भी ली गई थी.

फ़ेसबुक पर लाइक से उनके निजी जीवन के बारे में मिली जानकारी की तुलना की गई और दोनों के बीच संबंध को समझा गया.

शोधकर्ता 82 फ़ीसदी मामले में सही अंदाज़ा लगाया गया कि कौन मुस्लिम है और कौन ईसाई.

अपने अध्ययन के आधार पर उन्होंने लोगों के लिंग के बारे में 85 फ़ीसदी सही, अफ़्रीक़ी-अमरीकी को कॉकेसियन-अमरीकी से अलग करने में 95 फ़ीसदी सही और रिपब्लिकन को डेमोक्रेट्स से अलग करने के मामले में 85 फ़ीसदी सही आकलन किया था.

ये शोध उन कंपनियों के लिए खु़शख़बरी है जो सोशल मीडिया के ज़रिए ग्राहकों की तलाश में रहती हैं. लेकिन शोधकर्ताओं ने चेतावनी भी दी कि जिस तरह से लोगों का डिजिटल प्रोफ़ाइल तैयार हो रहा है वह कर रहें है उससे उनकी निजता पर असर पड़ सकता है.

'निजता पर असर'

लेकिन इसका बचाव करते हुए इस शोध को लिखने वाले डेविड स्टीलवेल कहते हैं, ''फ़ेसबुक पर लाइक बटन सार्वजनिक है लेकिन ऐसा नहीं है कि फ़ेसबुक आपको लाइक की गई सामग्री को सार्वजनिक करने के लिए मजबूर करता है. आपके पास विकल्प मौजूद है, आप चाहें तो आप अपनी प्राइवेसी सेटिंग्स को बदल सकते हैं.''

स्टीलवेल के अनुसार ताज़ा शोध सिर्फ़ फ़ेसबुक या सोशल मीडिया को ही प्रभावित नहीं करता, इसका असर हर तरह के डिजिटल रिकॉर्ड पर पड़ेगा.

लोगों की निजता की सुरक्षा के लिए आंदोलन चला रहे एक संगठन 'बिग ब्रदर वॉच' के निदेशक निक पिकल्स का कहना था, ''यह शोध उन लोगों के लिए ख़तरे की घंटी है जो समझते हैं कि उनसे जुड़ी निजी सूचना केवल प्राइवेसी सेटिंग्स के ज़रिए सुरक्षित रखी जा सकती है. हमें इस बारे में दोबारा सोचना चाहिए कि हम स्वेच्छा से अपने बारे में कितनी जानकारी सार्वजनिक करते हैं.''

निक पिक्लस के अनुसार इस शोध के नतीजों के बाद एक बार फिर ये बात चर्चा में आ गई है कि लोगों के बारे में दी गई जानकारी का इस्तेमाल किस तरह हो रहा है इस बात को लेकर लोगों का डर जायज़ है.

संबंधित समाचार