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उल्कापिंड से बने 'नाजियों के बुद्ध'

 मंगलवार, 2 अक्तूबर, 2012 को 00:55 IST तक के समाचार

माना जाता है कि मूर्ति एक हज़ार साल पुरानी है

नाजियों के एक अभियान के दौरान 1930 के आसपास उन्हें बुद्ध की एक पुरानी मूर्ति मिली थी. अब पता चला है कि ये मूर्ति बहुत ही कीमती उल्कापिंड (मीटीऑराइट) के धातुओं से बनाई गई थी.

शोधकर्ताओं के मुताबिक स्वास्तिक के निशान वाली ये मूर्ति एक हजार साल पुरानी है और ये लोहे के एक दुर्लभ स्वरूप से तैयार हुई है जिसमें निकल यानी गिलट मिला हुआ है.

शोध करने वाली टीम का मानना है कि ये धातु चिंगा उल्कापिंड का हिस्सा थी जो करीब 15 हज़ार साल पहले साइबीरिया और मंगोलिया की सीमा पर गिरा था.

उल्कापिंड के मलबे का पता 1913 में ही लगा लेकिन जिस असली धातु से मूर्ति बनी है वो कई सदी पहले ही इकट्ठा कर लिया गया था.

माना जा रहा है कि ये मूर्ति 11वीं सदी में बुद्ध पूर्व बॉन संस्कृति की है जो एशिया में एक हज़ार पहले मौजूद थी. ये सारी बातें ‘मीटीऑरिटिक्स एंड प्लेनेटरी साइंस’ नाम की पत्रिका में छपी है.

हॉलीवुड जैसी कहानी

"जब मैंने मूर्ति को देखा तो मुझे पूरा यकीन था कि ये एक उल्कापिंड से बनी है. इसका सुराग मूर्ति पर अंगूठे जैसे निशानों से मिला जो बाहरी परत के पिलघने से बनते हैं."

डॉ. बुचनर, यूनिवर्सिटी ऑफ स्टुटगार्ट

24 सेंटीमीटर लंबी इस मूर्ति का वज़न 10 किलोग्राम है और इसे 'आइरन मैन' कहा जाता है. इस कीमती प्रतिमा के सामने आने की कहानी वैज्ञानिक शोध से ज़्यादा टइंडियाना जोन्सट फिल्म की किसी स्किप्ट से मेल खाती है.

इस प्रतिमा को 1938 में तिब्बत में एक जर्मन वैज्ञानिक ने ढूंढा था. वे एक अभियान पर थे जिसे नाजियों का समर्थन हासिल था, खासकर हिमलर का. हिमलर नाजी संगठन एसएस के प्रमुख थे.

हिमलर हिल्टर के प्रमुख सहयोगी थे और मानते थे कि आर्यन लोगों का मूल तिब्बत में था और वे इस इलाक़े से जुड़ी चीजें खोजना चाहते थे.

जब जर्मन वैज्ञानिक को बुद्ध की मूर्ति मिली थी तो इसे जर्मनी वापस लाया गया. लेकिन ये एक निजी संग्रह का हिस्सा बन गई और 2007 तक किसी को इसके बारे में पता नहीं था.

'रहस्यमयी मूर्ति'

मूर्ति के नए मालिक ने इसके बारे में और जानने के लिए यूनिवर्सिटी ऑफ स्टुटगार्ट के डॉक्टर बुचनर से संपर्क किया.

डॉक्टर बुचनर का कहना था, “जब मैंने मूर्ति को देखा तो मुझे पूरा यकीन था कि ये एक उल्कापिंड से बनी है. इसका सुराग मूर्ति पर अंगूठे जैसे निशानों से मिला जो बाहरी परत के पिलघने से बनते हैं.”

गहन शोध से पता चला कि इस तरह का उल्कापिंड धरती पर बहुत कम ही पाया जाता है. बहुत सारी संस्कृतियों में उल्कापिंड यानी मीटीऑराइट को दिव्य गतिविधि से जोड़ कर देखा जाता है.

पुराने ज़माने में आर्कटिक क्षेत्र के लोग उल्कापिंड से चाकू और गहने बनाते थे. लेकिन ये किस काल के हैं, ये पता लगाना मुश्किल होता है.

डॉ. बुचनर कहते हैं कि न तो मूर्ति बनाने वाले और न ही नाजियों को पता था कि ये बहुत ही कीमती धातु से बनी है. उनके मुताबिक इस मूर्ति में अलग ही बात है और ये काफी रहस्यमयी दिखती है.

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