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फार्मूला वन कार का दिल से रिश्ता !

 शनिवार, 11 अगस्त, 2012 को 14:22 IST तक के समाचार
डेमिएन सिंह

पांच साल के डेमिएन को दिल का दौरा पड़ चुका है

क्या फार्मूला वन कार और एक पांच साल के बच्चे की दिल की बीमारी के बीच कुछ सामान हो सकता है?

ये सवाल अटपटा ज़रुर है लेकिन एक ऐसी बात है जो दोनों को समान बनाती है.

दरअसल जिस तंत्र की मदद से ट्रैक पर कार के प्रदर्शन का आकलन किया जाता है उसी तंत्र की मदद से ब्रिटेन में डॉक्टर एक बच्चे पर निगरानी रख रहे हैं.

इस बच्चे का नाम डेमिएन सिंह है और इसे दिल का दौरा पड़ चुका है.

बरमिंघम में एक बच्चों के अस्पताल में डेमिएन का इलाज चल रहा है और डॉक्टर फार्मूला-वन में इस्तेमाल होने वाले तंत्र से इस बच्चे की तबीयत में हो रहे सुधार पर निगरानी रख रहे हैं.

ये पहली बार है कि जिस प्रणाली को टेलीमेट्री कहा जाता उसका इस्तेमाल किसी मनुष्य पर हो रहा हो.

जिस तरह से ट्रैक पर चल रही कार पर निगरानी रखी जाती है उसी प्रकार अस्पताल में मरीजों पर लागातार ध्यान रखना जरुरी होता है.

समान प्रक्रिया

"जब हमने बातचीत शुरु की तो हमने बातचीत के दौरान जाना कि फार्मूला-वन के लिए कई प्रक्रियाओं की श्रृंखला होती है जो अस्पताल में भर्ती होने वाले मरीजों से मिलती जुलती है"

पीटर वेन

कार का प्रदर्शन बेहतर बनाने के लिए सेंसर के जरिए इंजीनियरिंग टीम को संदेश जाता है और वो उसे ठीक करने के लिए काम करती है.

वहीं अस्पतालों में डॉक्टर मरीज से मिलने वाले संकेत जैसे दिल की धड़कन, रक्त चाप को लेकर तैयार की गई रिपोर्टों पर निर्भर करते हैं.

बरमिंघम के एक अस्पताल के गहन चिकित्सा इकाई में बाल रोग विशेषज्ञ हीथर डंकन का मानना है कि डिजिटल प्रणाली का होना बेहतर होता है.

पीटर वेन मेनन ने बीबीसी को बताया, ''मैं एक कार्यक्रम में बोल रहा था जब मेरी मुलाकात डंकन से हुई, जो बाल रोगों के लिए समय से पहले चेतावनी देने वाले यंत्र को तलाश रहे थे.''

उनका कहना था, ''जब हमने बातचीत शुरु की तो हमने बातचीत के दौरान जाना कि फार्मूला-वन के लिए कई प्रक्रियाओं की श्रृंखला होती है जो अस्पताल में भर्ती होने वाले मरीजों से मिलती जुलती है.''

जो तकनीक इस्तेमाल में लाई जाती है उसका अस्पताल में प्रयोग किया जाए तो मरीज की बीमारी के बारे में जानकारी बेहतर तरीके से हासिल की जा सकती है.

ज्यादा जानकारी

गहन चिकित्सा केंद्र में भर्ती डेमियन के शरीर पर लगाए गए तार कई मॉनिटरों से जुड़े हुए हैं.

मैक्लेरन प्रणाली खून में ऑक्सीजन का स्तर, दिल की धड़कन और सांस की गति को लेकर जानकारी इकट्ठा करता है.

मॉनिटर

इस प्रणाली से मरीज के बारे में जानकारियाँ संग्रहित की जा सकेंगीं

अगर हर मरीज को इसी प्रणाली के तहत जोड़ दिया जाए तो खर्चा बढ़ जाएगा. इसलिए अब मकसद ये है कि मरीज को बिना तारों के निगरानी रखी जा सके.

ये एक ऐसे सांचे की तरह होगा जिसमें इलेक्ट्रॉनिक सेंसर की परतें होगीं जो वायरलेस प्रणाली से संपर्क स्थापित कर सके.

लगातार निगरानी से डॉक्टर को दो तरह से फायदा होगा. एक तो इससे मरीज की सही स्थिति के बारे में पता चल पाएगा और दूसरा इस जानकारी को एकत्रित भी हो सकेगा ताकि उससे आगे भी कुछ सीखा जा सके.

डिजिटल प्रणाली

फिलहाल जो भी आंकड़े इकट्ठे किए जाते हैं उन्हें 96 घंटों के बाद हटा दिया जाता है.

डॉक्टरों को उम्मीद है कि इस प्रणाली को भविष्य में इंटरनेट के ज़रिए भी इस्तेमाल किया जा सकेगा.

अगर ऐसा हो पाता है तो डॉक्टर अब मरीज के बारे में जानकारी लैपटॉप या टेबलट पर भी देख सकेंगे.

वन मेनर को ये भी उम्मीद है कि अगर किसी मरीज को लंबी बीमारी है तो उसी के घर से ही उस पर नजर रखी जा सकेगी.

बरमिंघम के बच्चों के अस्पताल में चल रहा ये 'पायलट प्रोग्राम' अभी शुरुआती स्तर पर है. इंजीनियर, डॉक्टर और कंप्यूटर विश्लेषक साथ मिलकर ये कोशिश कर रहे हैं कि ये ठीक तरह से काम आ सके.

अस्पताल ने अभी तक इस प्रणाली को नहीं खरीदा है लेकिन वेन मेनर को उम्मीद है कि इसे खरीदा जाएगा.

डेमिएन सिंह की मां मगडेलना का कहना है कि इस प्रणाली से अपने बच्चे को गहन चिकित्सा इकाई में रखने से छुटकारा पाने में मदद मिलेगी.

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