सिफ़लिस की जाँच, शिशुओं की रक्षा

शिशु

सिफ़लिस की वज़ह से सालाना पाँच लाख शिशुओं की मौत होती है

शोधकर्ताओं का कहना है कि गर्भवती महिलाओं में सिफ़लिस बीमारी की जाँच कर लाखों बच्चों की जान बचाई जा सकती है.

माना जाता है कि हर साल सिफ़लिस की वज़ह से पाँच लाख शिशु मर जाते है. इनमें बड़ी संख्या में गर्भस्थ शिशु होते हैं.

सिफ़लिस से मौत के सबसे ज्यादा अफ्रीकी देशों से सामने आते है.

ब्रिटेन में हुए ताज़ा शोध में विशेषज्ञों ने पाया कि महिलाओं की जाँच और एंटीबायोटिक्स के इस्तेमाल से शिशुओं की मौत की संख्या आधी हो सकती है.

विज्ञान पत्रिका लांसेट में छपी रिपोर्ट के अनुसार शोध में 41,000 महिलाओं को शामिल किया गया था.

सिफ़लिस यौन संपर्क से फैलने वाली बीमारी है जिसके कारण त्वचा पर घाव हो जाते है और इसके बाद ये गंभीर रूप से दिल, दिमाग, आंखों को प्रभावित कर देती है और इससे मौत भी हो सकती है.

गर्भ में पल रहे बच्चे में भी माँ से सिफ़लिस का संक्रमण पहुँच सकता है. इसे जन्मजात सिफ़लिस भी कहा जाता है.

कई देशों में इस बीमारी को लेकर नीतियां बनाई गई है, जिनके तहत गर्भवती महिलाओं की जाँच की जाती है. लेकिन ग़रीब देशों में अब भी इस तरह की जाँच का प्रचलन नहीं है.

ख़तरनाक

सिफ़लिस

एचआईवी की जाँच के समय ही सिफ़लिस की जाँच किए जाने की सलाह

एक अनुमान के अनुसार पूरी दुनिया में आठ में से एक गर्भवती महिला की ही सिफ़लिस को लेकर जांच की जाती है.

हर साल सिफ़लिस से पीड़ित 20 लाख महिलाएँ गर्भवती हो जाती है. इनमें से दो तिहाई मामलों में प्रसव के दौरान या बाद में दिक़्क़तें पेश आती हैं.

कई मामलों में शिशु या तो मृत पैदा होते है, या पैदा होने के बाद उनकी मौत हो जाती है.

यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन के शोधकर्ताओं का कहना है कि गर्भवती महिलाओं की अनिवार्य जाँच से अजन्मे शिशुओं की मौत में 58 प्रतिशत की कमी आ सकती है.

इससे जन्मजात सिफ़लिस के मामलों में भी कमी आ सकती है.

रिपोर्ट की लेखक डॉक्टर सैरा हॉक्स का कहना है कि सिफ़लिस की जाँच एचआईवी जाँच के समय ही की जानी चाहिए.

अगर गर्भवती महिला में सिफ़लिस का पता चल जाता है तो गर्भ के 28वें हफ़्ते से ही एंटीबायोटिक्स दवाइयाँ देकर माँ और बच्चे की रक्षा की जा सकती है.

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