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'जलवायु पर समझौता मु्श्किल'

डेनमार्क में दिसंबर में कोपनहेगन जलवायु परिवर्तन सम्मेलन होना है और इससे पहले डेनमार्क के प्रधानमंत्री लार्स ल्यूगे रासमयूसन ने कहा है कि उन्हें नहीं लगता कि समय रहते जलवायु के मुद्दे पर ऐसा अंतरराष्ट्रीय समझौता हो पाएगा जो क़ानूनी तौर पर बाध्य हो.

इस समझौते का मकसद ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को कम करना है.

ब्रसल्स में यूरोपीय संघ के नेताओं की बैठक हो रही है. इसमें चर्चा होगी कि विकासशील देशों को जलवायु परिवर्तन से लड़ने में मदद करने के लिए कौन सा देश कितनी आर्थिक मदद देगा.

अब से करीब पाँच हफ़्तों बाद 200 देशों के नेता कोपनहेगन में मिलेंगे ताकि जलवायु परिवर्तन को लेकर एक विश्वव्यापी नीति तैयार की जा सके.

मुश्किल हालात

मुझे इस बात की संभावना कम लगती है कि कोपनहेगन सम्मेलन से पहले जलवायु के मुद्दे पर ऐसा अंतरराष्ट्रीय समझौता हो पाएगा जो क़ानूनी तौर पर बाध्य हो.

डेनमार्क के प्रधानमंत्री

बीबीसी संवाददाता क्लाइव मॉर्डन का कहना कि डेनमार्क के प्रधानमंत्री के बयान का काम है लोगों की उम्मीदों को कम करना.

वे पहले भी आगाह कर चुके हैं कि जलवायु के मुद्दे पर बातचीत की प्रक्रिया धीमी गति से चल रही है.

यूरोपीय संघ के देशों में आपसी मतभेद बरकरार हैं कि विकासशील देशों की मदद के लिए कौन ज़्यादा पैसा देगा.

इस बात की संभावना भी कम ही है कि समय रहते जलवायु के मसले पर नया अमरीकी क़ानून लागू हो जाए.

हालांकि संयुक्त राष्ट्र महासचिव बान की मून ने पत्रकारों से बातचीत में उम्मीद जताई है कि क़ानूनी रूप से बाध्य समझौते के बगैर भी कोपनहेगन सम्मेलन सफल हो सकता है बशर्ते कि वो सही लक्ष्य तय कर ले और विस्तृत चर्चा बाद में हो सकती है.

बीबीसी को जानिए

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