स्वच्छ गंगा का सूचक होगी डॉल्फ़िन

गंगा में सोंसे

पटना में गंगा नदी में पाए जानेवाले डॉल्फ़िन लुप्त होने की स्थिति में हैं

भारत में गंगा नदी का पानी कितना साफ़ हुआ, ये अब डॉल्फ़िन बताएँगी जिन्हें बिहार और उत्तर-प्रदेश में बोलचाल की भाषा में सोंस कहा जाता है.

इसी उद्देश्य से भारत सरकार ने गंगा नदी में पाई जानेवाली इन सोंसों या डॉल्फ़िनों को राष्ट्रीय जलीय जीव घोषित कर दिया है.

ये निर्णय इसी वर्ष गठित किए गए राष्ट्रीय गंगा नदी घाटी प्राधिकरण की (नेशनल गंगा रिवर बेसिन अथॉरिटी) की पहली बैठक में लिया गया.

डॉल्फ़िन नदी के स्वास्थ्य का दर्पण है, यदि नदी में डॉल्फ़िन की संख्या काफ़ी है तो हम स्पष्ट रूप से कह सकते हैं कि नदी का स्वास्थ्य अच्छा है.

प्रोफ़ेसर रविन्द्र कुमार सिन्हा, डॉल्फ़िन विशेषज्ञ

भारत में गंगा-ब्रह्मपुत्र नदियों में पाई जानेवाली डॉल्फ़िनों की संख्या उत्तरोत्तर कम होती जा रही है जिसका एक बहुत बड़ा कारण नदियों में बढ़ता प्रदूषण समझा जाता है.

भारत में डॉल्फ़िनों की संख्या दो से ढाई हज़ार के बीच समझी जाती है जिनमें आधे बिहार और उत्तर प्रदेश में गंगा में पाई जाती हैं.

अंतरराष्ट्रीय पर्यावरण संरक्षण संस्था – इंटरनेशनल यूनियन फ़ॉर कंज़र्वेशन ऑफ़ नेचर – आईयूसीएन ने गंगा डॉल्फ़िनों को लुप्तप्राय प्राणी घोषित कर रखा है.

गंगा डॉल्फ़िन

डॉल्फ़िन विशेषज्ञ, पटना विश्वविद्यालय में जंतु विज्ञान विभाग में प्राध्यापक प्रोफ़ेसर रवीन्द्र क्रुमार सिन्हा के अनुसार वैसे तो डॉल्फ़िन की 40 प्रजातियाँ हैं लेकिन मोटे तौर पर उन्हे दो वर्गों में रखा जा सकता है – खारे पानी की डॉल्फ़िन और मीठे पानी की डॉल्फ़िन.

उन्होंने बताया कि समुद्र के खारे पानी में तो डॉल्फ़िन दुनिया के लगभग हर हिस्से में पाई जाती हैं लेकिन मीठे पानी की डॉल्फ़िनों की केवल चार ऐसी प्रजातियाँ हैं जो अलग-अलग स्थानों पर पाई जाती हैं.

आर के सिन्हा

प्रोफ़ेसर सिन्हा पिछले दो दशकों से डॉल्फ़िन पर शोध कर रहे हैं

प्रोफ़ेसर सिन्हा के अनुसार नदियों में पाई जानेवाली इन्हीं चार प्रजातियों में से एक प्रजाति गंगा की डॉल्फ़िनों की है जिसे जंतु विज्ञान की भाषा में प्लाटानिस्टा गैंजेटिका कहते हैं.

भारत के अलावा पाकिस्तान की सिंधु नदी, दक्षिण अमरीका की आमेज़न नदी में, अर्जेटीना की ला-प्लाटा नदी में, और चीन की यांग्त्सी नदी में डॉल्फ़िन पाई जाती हैं.

प्रोफ़ेसर सिन्हा बताते हैं कि चीन में पाई जानेवाली डॉल्फ़िन की प्रजाति दिसंबर 2006 में विलुप्त हो गई.

वे कहते हैं,"डॉल्फ़िन वैसे तो पूरे विश्व में मिलती हैं लेकिन मीठे पानी की डॉल्फ़िनों का अस्तित्व केवल हिमालय से निकलनेवाली नदियों और आमेज़न नदी में मिलता है."

प्रोफ़ेसर सिन्हा ने बताया कि इसके अतिरिक्त कुछ डॉल्फ़िन ऐसी भी होती हैं जो मीठे पानी और खारे पानी दोनों में पाई जाती हैं.

दोनों तरह के पानी में रहनेवाली डॉल्फ़िन बर्मा की इरावती नदी में, भारत में चिल्का झील में, थाईलैंड की सोंखला झील में और दक्षिण अमरीका की आमेज़न नदी में पाई जाती हैं.

सफ़ाई की सूचक

डॉल्फ़िन को भारत का राष्ट्रीय जलीय जीव घोषित किए जाने का निर्णय पिछले वर्ष राष्ट्रीय नदी घोषित की गई गंगा की सफ़ाई से जुड़ा है.

डॉल्फ़िन वैसे तो पूरे विश्व में मिलती हैं लेकिन मीठे पानी की डॉल्फ़िनों का अस्तित्व केवल हिमालय से निकलनेवाली नदियों और आमेज़न नदी में मिलता है.

प्रोफ़ेसर रवीन्द्र कुमार सिन्हा, डॉल्फ़िन विशेषज्ञ

भारतीय प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में हुई बैठक में विशेषज्ञ के तौर पर हिस्सा लेने गए प्रोफ़ेसर सिन्हा ने बताया कि उन्होंने बैठक में ये कहा कि 50 के दशक में इंग्लैंड में जब टेम्स नदी में सालमन मछली लौटी थी तो ये ख़बर सुर्खियों में आई थी क्योंकि लंबे समय से टेम्स की सफ़ाई का प्रयास किया जा रहा था.

प्रोफ़ेसर सिन्हा ने कहा कि इसी को ध्यान में रखकर ये सुझाव रखा गया कि यदि गंगा में डॉल्फ़िन लौटती हैं तो इससे लोग से समझ पाएँगे कि गंगा का पानी साफ़ हुआ है.

उन्होंने कहा,"डॉल्फ़िन नदी के स्वास्थ्य का दर्पण है, यदि नदी में डॉल्फ़िन की संख्या काफ़ी है तो हम स्पष्ट रूप से कह सकते हैं कि नदी का स्वास्थ्य अच्छा है."

प्रोफ़ेसर सिन्हा के अनुसार चीन में जिस प्रकार से मीठे पानी की डॉल्फ़िन का लोप हुआ है, उसे देखते हुए डॉल्फ़िन के संरक्षण के लिए गंभीर रहना आवश्यक है.

साथ ही वो डॉल्फ़िन के देसी नाम सोंस के बारे में बताते हैं कि डॉल्फ़िन चूँकि स्तनधारी जीव हैं, इसलिए वे पानी के भीतर अधिक देर नहीं रह सकतीं और थोड़ी-थोड़ी देर में वे सतह से ऊपर आकर साँस लेती हैं जिससे सूँ-सूँ की आवाज़ होती है और इसी से देसी बोली में गंगा डॉल्फ़िनों को सोंस भी कहा जाने लगा.

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