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शुक्रवार, 22 मई, 2009 को 18:15 GMT तक के समाचार

रामदत्त त्रिपाठी
बीबीसी संवाददाता, लखनऊ

नए मंत्रिमंडल में उत्तर प्रदेश की अनदेखी?

मनमोहन सिंह मंत्रिमंडल की 'पहली खेप' में उत्तर प्रदेश से किसी भी सांसद को मंत्री न बनाया जाने से राजनीतिक हलकों में काफ़ी आश्चर्य हुआ है.

आश्चर्य तब और बढ़ जाता है जब उत्तर प्रदेश के मतदाताओं ने यहाँ कांग्रेस पार्टी की उम्मीद से कहीं ज़्यादा उनके 21 सांसद जिताकर भेजे हैं.

पिछली सरकार में कैबिनेट मंत्री महाबीर प्रसाद चुनाव ज़रूर हार गए हैं लेकिन राज्यमंत्री रहे श्रीप्रकाश जयसवाल और जतिन प्रसाद फिर से संसद में पहुंचे हैं.

उनके अलावा कई और अनुभवी नेता भी लोकसभा का चुनाव जीते हैं. इनमें पूर्व विदेश राज्य मंत्री सलमान ख़ुर्शीद, पूर्व संचार मंत्री बेनी प्रसाद वर्मा और डॉक्टर संजय सिंह, वरिष्ठ नेता जगदम्बिका पाल, निर्मल खत्री, और ज़फ़र अली नक़वी शामिल हैं.

दलित नेताओं में पीएल पुनिया का नाम है, जो मुख्य मंत्री मायावती के प्रमुख सचिव रह चुके हैं और जिन्हें मायावती किसी क़ीमत पर जीतने नहीं देना चाहती थीं.

महिलाओं में पूर्व विदेश मंत्री स्वर्गीय दिनेश सिंह की बेटी रत्ना सिंह भी तीसरी बार सांसद चुनी गई हैं.

सभी मंत्री बनना चाहते हैं

इन सारे नामों पर ग़ौर करें तो सिर्फ़ एक कारण समझ में आता है कि इनमें से सभी का क़द लगभग एक जैसा है और कोई भी इतना बड़ा नहीं है कि उसे ज़्यादा महत्व दिया जाए.

दूसरे ये कि उत्तर प्रदेश से जितने भी कांग्रेस के उम्मीदवार जीते हैं, क़रीब क़रीब सभी मंत्री पद पाना चाहते हैं और सोनिया-राहुल को उन सबसे बात करके ही कोई फ़ैसला लेना होगा.

कांग्रेस नेताओं का कहना है कि मंत्रिमंडल के पहले विस्तार में उत्तर प्रदेश को ज़रूर प्रतिनिधित्व मिलेगा.

कहने को तो ये कहा जा सकता है कि सत्तारूढ़ गठबंधन की अध्यक्ष सोनिया गांधी और पर्दे के पीछे से सब कुछ तय करने वाले राहुल गांधी दोनों यहीं से हैं.

लेकिन हक़ीक़त ये है कि आम लोग तो इन लोगों से मिल नहीं सकते. अनेक राजनीतिक पर्यवेक्षक उत्तर प्रदेश की इस तरह अनदेखी को उत्तर प्रदेश के अपमान के रूप में भी देख रहे हैं.

राजनीतिक हलकों में कहा जा रहा है कि लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में पार्टी को जो अप्रत्याशित सफलता मिली है उसे स्थायित्व देने के लिए कांग्रेस पार्टी को उत्तर प्रदेश पर ध्यान देना होगा और यहाँ के नेताओं को आगे लाना होगा.

कई राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि नरसिंह राव के ज़माने में उत्तर प्रदेश के नेताओं को पीछे रखने की एक सोची समझी चाल चली गई थी, क्योंकि उन्हें उत्तर प्रदेश के नेताओं से ख़तरा हो सकता था. लेकिन अब सोनिया और राहुल के ज़माने में भी वैसा ही होगा, लोग ऐसा नही मानते.