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सोमवार, 06 अप्रैल, 2009 को 11:05 GMT तक के समाचार

पाणिनी आनंद
बीबीसी संवाददाता, दिल्ली

चेहरे दिखा रहे हैं, बातें छिपा छिपाकर...

हिंदी सिनेमा का एक गाना है, 'सलाम कीजिए..आली जनाब आए हैं. ये पाँच सालों का देने हिसाब आए हैं..'

ये गाना ध्यान आते ही आपको तुरंत चुनाव से पहले उपलब्धियाँ, मुद्दे और नीतियाँ गिनाते राजनीतिक दलों का ख़्याल आएगा. आजकल चुनाव के मौसम में भारत में यह तस्वीर आम है.

पर शायद कम लोग जानते हैं कि हिसाब देने आए और वोट लेने आए इन दलों में से अधिकतर अपने चंदों और खर्चों को लेकर पूरी तरह बंद बक्से जैसे हैं.

1,055 में से 18 दलों ने सौंपा ब्यौरा

संसद में सत्तापक्ष के साथ और विपक्ष में बैठने वाले दलों की तादाद 1,055 है.

पर अगर 18 राजनीतिक दलों को छोड़ दें तो बाकी के दल अपनी पारदर्शिता और जवाबदेही तय कराने के नियमों की अनदेखी कर रहे हैं. कम से कम, चुनाव आयोग से मिली जानकारी तो यही कहती है.

रिप्रेज़ेंटेशन ऑफ़ पीपुल्स एक्ट (1951) में वर्ष 2003 में एक संशोधन के तहत यह नियम बनाया गया था कि सभी राजनीतिक दलों को धारा 29 (सी) की उपधारा-(1) के तहत फ़ार्म 24(ए) के माध्यम से चुनाव आयोग को यह जानकारी देनी होगी कि उन्हें हर वित्तीय वर्ष के दौरान किन-किन व्यक्तियों और संस्थानों से कुल कितना चंदा मिला.

हालांकि राजनीतिक दलों को इस नियम के तहत 20 हज़ार से ऊपर के चंदों की ही जानकारी देनी होती है.

दिल्ली के एक युवा कार्यकर्ता अफ़रोज़ आलम ने सूचना का अधिकार क़ानून के तहत चुनाव आयोग से पार्टियों को मिलने वाले चंदे से जानकारी मांगी तो चौंकाने वाले तथ्य सामने आए.

आयोग से जानकारी मिलने पर जहाँ एक ओर पारदर्शिता से बच रही पार्टियाँ बेनकाब हुईं वहीं यह भी पता चला कि जिन्हें चंदा मिल रहा है, वो किससे और कितना पैसा ले रहे हैं.

वर्ष 2008-09 के लिए तो ब्यौरा अभी चुनाव आयोग को मिलना बाकी है पर वर्ष 2004 से 2008 तक के चार वित्तीय वर्षों को देखें तो केवल 21 राजनीतिक दलों ने ही यह ब्यौरा चुनाव आयोग को सौंपा है.

इनमें वर्ष 2004 से 2007 तक यानी तीन वित्तीय वर्षों में 16-16 पार्टियों ने आयोग को चंदे का ब्यौरा दिया है. 2007-08 में ऐसे राजनीतिक दलों की तादाद महज 18 है.

लालू, पासवान, माया ने नहीं दी जानकारी

यूपीए सरकार की अहम उपलब्धियों में सूचना का अधिकार क़ानून शामिल है पर यूपीए के साथी नेता मसलन, रेलमंत्री लालू प्रसाद यादव, रामविलास पासवान, करुणानिधि, शिबू सोरेन जैसे बड़े नेता भी उस सूची में हैं जिनकी चुनाव आयोग को जानकारी देने में कोई रुचि नहीं है.

अपनो चंदों को लेकर आए दिन चर्चा में रहनेवाली बहुजन समाज पार्टी के चंदों के बारे में चुनाव आयोग को धेले भर की जानकारी नहीं है. वजह, पार्टी ने कभी इसकी ज़रूरत नहीं समझी.

तृणमूल कांग्रेस, पीडीपी, फ़ॉरवर्ड ब्लाक, राष्ट्रीय लोकदल, आरएसपी, नेशनल कांफ्रेंस जैसी 1000 से ज़्यादा पार्टियां चुनाव आयोग को उन्हें मिल रहे चंदे से संबंधित जानकारी नहीं दे रही हैं.

पार्टियों को मिले चंदे पर नज़र डालें तो कुछ पार्टी तो करोड़ों रूपए लेकर काम करती नज़र आती हैं लेकिन कुछ दल ऐसे हैं जिनको मिले चंदे की ओर नज़र डालें और फिर उनके खर्चों पर तो लगता है कि मामला आमदनी अठन्नी, खर्चा रूपइया जैसा है.

मसलन, समाजवादी पार्टी को वर्ष 2007-08 के दौरान केवल 11 लाख रूपए मिले, इन्हें चंदा देने वाले केवल तीन लोग हैं जिनमें से दो संस्थाएं हैं. एआईएडीएमके को इस वित्तीय वर्ष में केवल 1.08 लाख रूपए चंदा मिला है.

कांग्रेस, सीपीएम, भाजपा, सपा जैसे बड़े बड़े दलों को उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्यों से नाममात्र चंदा मिला है जबकि कांग्रेस और भाजपा को गोवा जैसे छोटे से राज्य से पर्याप्त पैसा मिला है.

और तो और, गोवा के अधिकतर दानदाता ऐसे हैं जो दोनों ही दलों को मोटा चंदा देते रहे हैं. ये दानदाता बिल्डिंग, कंस्ट्रक्शन और खनन से जुड़ी हुई संस्थाएं हैं.

शिवसेना को भी चंदा देने वाले अधिकतर लोग बिल्डर या बड़े व्यावसायिक उपक्रम चलाने वाले लोग हैं.

इससे पहले के वित्तीय वर्षों में मिले चंदे पर हमारी पिछली विशेष रिपोर्ट से यह सामने आया था कि कैसे गोवा के तमाम बड़े व्यावसायिक उपक्रम देश की दो बड़ी पार्टियों को चंदे दे रहे हैं.

असहाय आयोग

जब बीबीसी ने इस मामले में पिछले दिनों चुनाव आयोग से बातचीत की तो पता चला कि नियम के मुताबिक आयोग के पास पंजीकृत सभी दलों को चंदे से संबंधित जानकारी उपलब्ध करानी चाहिए पर ऐसा कोई प्रावधान नहीं है जिसके तहत राजनीतिक दल यह जानकारी देने के लिए बाध्य हों.

विंडबना यह है कि नियम के मुताबिक राजनीतिक दलों को चंदे का ब्यौरा आयोग में जमा करना है पर ऐसा प्रावधान नहीं बनाया गया जिसके तहत आयोग इस जानकारी का जमा किया जाना सुनिश्चित कर सके.

सवाल और भी हैं. मसलन, राजनीतिक दल अपनी ऑडिट निजी स्तर पर करवाकर आयकर विभाग या आयोग को जानकारी दे देते हैं.

इस बारे में आयोग ने केंद्र सरकार से सिफ़ारिश की थी कि ऑडिट के लिए एक संयुक्त जाँचदल बनाया जाए जो राजनीतिक दलों के पैसे की ऑडिट करे.

अगर ऐसा होता तो राजनीतिक दलों के खर्च पर नज़र रख पाना और उसकी जाँच कर पाना संभव हो पाता.

इससे पार्टियों की पारदर्शिता तो तय होती ही, साथ ही राजनीतिक दलों के खर्च और उसके तरीके पर भी नियंत्रण क़ायम होता. पर केंद्र सरकार ने इस सिफारिश को फिलहाल ठंडे बस्ते में ही रखा है.

अबतक ब्यौरा सौंपने वाले दल