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मंगलवार, 07 अप्रैल, 2009 को 08:57 GMT तक के समाचार
 
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वुसतुल्लाह की डायरी
 
पाकिस्तान में चरमपंथी
पाकिस्तान में जो लोग सत्ता में बैठे हैं वे सच को स्वीकार नहीं करते
पाकिस्तान में बीबीसी के जाने माने रिपोर्टर वुसतुल्लाह खान राजनीति और जीवन के विभिन्न पहलुओं पर अपनी विशेष टिप्पणियों के लिए जाने जाते हैं.

पिछले दिनों में पाकिस्तान और अमरीका के रिश्तों और पाकिस्तान के हुक्मरानों पर पेश है उनकी डायरी का एक पन्ना.

पाकिस्तान की दक्षिणी प्रांत सिंध के तटवर्ती ज़िले ठट्टा की तहसील खारोछान की आधी ज़मीन यानी लगभग चार लाख एकड़ समुद्र पी गया.

यह सब अचानक और एक दिन में नहीं हुआ, 20 वर्ष में हुआ, इसलिए अख़बारों की सुर्खियों में यह नहीं आया.

यदि मैं ये कहूँ कि जिस तरह ठट्ठा की ज़मीन समुद्र पी गया उसी तरह पाकिस्तान के लगभग 50 प्रतिशत इलाक़े पर से राष्ट्रीय अधिकार बंदूकधारी गुटों और स्थानीय माफ़िया संगठनों के हाथों ग़ायब हो चुका है, तो क्या आप यकीन करेंगे.

शायद न करें क्योंकि यह काम 24 घंटे में नहीं हुआ बल्कि पिछले 30 वर्षों से हो रहा है और पिछले आठ वर्षों में इसमें बहुत तेज़ी आई है.

हो सकता है कि आज जो सत्ता में हैं उन्हें ये पता हो लेकिन सत्ता में होने वाले ऐसी किसी बात को मानने वाले आख़िरी जीव होते हैं.

अब्बासी ख़लीफ़ा मुस्तासिम बिल्ला ने उस समय तक तातारियों के आक्रमण को नहीं माना जब तक हलाकू ख़ान बगदाद में दाख़िल नहीं हो गया.

मुग़ल बादशाह मोहम्मद शाह उस समय तक 'अभी दिल्ली दूर है' का राग अलापते रहे जब तक नादिर शाह दुर्रानी के सिपाही मिट्टी लगे जूतों सहित उसके महल में नहीं घुस गए.

बहादुर शाह ज़फ़र तब तक ख़ुद को शहंशाह-ए-हिंद समझते रहे जब तक निकलसन ने उनके बेटों के कटे हुए सिर उनके सामने पेश नहीं किए. अयूब ख़ान और फिर याहिया ख़ान को आख़िर तक गुमान रहा कि ये सात करोड़ बंगाली नहीं बल्कि मुट्ठी भर चरमपंथी हैं.

बुरानुद्दीन रब्बानी तब तक काबुल के राजमहल से मज़ारे शरीफ़ नहीं गए जब तक तालेबान के लड़ाके क्लाशनिकोव लहराते महल में नहीं पहुँच गए.

मुल्ला उमर आख़िरी वक़्त तक इस यकीन से लिपटा रहा कि जैसे ही अमरीकी फ़ौज़े ज़मीन पर उतरेंगी उनका अफ़ग़ानी टिक्का बना दिया जाएगा.

'शुतुरमुर्ग की तरह'

अब उस बात पर भी शोध होना चाहिए कि गद्दी पर बैठे लोगों में उस शुतुरमुर्ग के जिंस कब दाख़िल होते हैं जो रेत में सिर घुसा कर समझते हैं कि ख़तरा टल गया.

यह बात समझनी क्यों मुश्किल हो जाती है कि ख़्याल को सिर्फ़ बंदूक में नहीं और बंदूक की ज़बान समझने वालों को सिर्फ़ भाषण से ख़त्म नहीं किया जा सकता.

युद्ध के मामलों में चीनी दार्शनिक सुन त्सू का कहना है कि अगर दुश्मन की कमजोरियों से ज़्यादा आपको अपनी कमजोरी मालूम हों तो आधी जंग आप बिना लड़े ही जीत सकते हैं और नाकामी की सीढ़ी का पहला पायदान यह सोच हुआ करती है कि हम कभी ग़लत हो ही नहीं सकते.

जब तक आप इस सोच की चहारदीवारी से बाहर नहीं निकलते हैं तो आप उसी के नीचे दब जाते हैं. जब आप यह मानेंगे हीं नहीं कि आपकी सेना और पुलिस आतंकवाद से निपटने के लिए पूरे ढंग से माहिर नहीं है तो आप उसे कैसे, क्या और कब सिखाएँगे.

जब आप हवा में हाथ-पाँव और अँधेरे में तीर चलाने और साए के पीछे भागने को सरकारी नीति के रुप में पेश करेंगें तो कितने लोग आँख मूंद कर दंडवत करेंगे.

जब आप अपने सामने खड़े ख़्याल की शक्ति और उसके फलने-फूलने की वजह ही नहीं समझ पाएँगे तो उस ख़्याल से लड़ने के लिए आम लोगों को कैसे इकट्ठा करेंगे.

क्या यह कहने से आत्मघाती हमले रुक जाएँगे कि यह किसी मुसलमान का काम नहीं हो सकता. क्या गले काटने वाले आपका यह भाषण सुनकर गिरेबान में मुँह छिपा लेंगे कि यह उज्जड़पन और मनुष्य पर जुल्म है.

यदि स्वात में एक लड़की को कोड़े मारने वाला वीडियो ग़लत साबित हो जाता है तो उससे महिलाओं की इज्ज़त-आबरु और जीवन सुरक्षित हो जाएँगे.

क्या बंदूकधारी आत्मघाती यह धमकी सुनकर उड़न-छू हो जाएँगे कि सरकार उनसे बंदूक के हाथों से निपटेगी.

आप कब तक राष्ट्र के बागी एक गुट के साथ उसकी शर्तों पर हस्तक्षेप करेंगे और दूसरे बागी गुट की बात सुने बगैर मारते रहेंगे.

आप कब तक 16 करोड़ लोगों को ये समझाते रहेंगे कि ये जो अमरुद दिख रहा है असल में यह केला है.

 
 
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