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शुक्रवार, 05 सितंबर, 2008 को 16:09 GMT तक के समाचार

सुशील झा
बीबीसी संवाददाता, अररिया

राहत वितरण में समन्वय का अभाव

बिहार के बाढ़ प्रभावित इलाक़ों में अब राहत सामग्री पहुँचने लगी है लेकिन राहत सामग्री के वितरण में असमानता और समन्वय का अभाव दिख रहा है.

सभी बाढ़ प्रभावित इलाक़ों में स्वयंसेवी संगठन और सरकार राहत सामग्री पहुँचा रही है लेकिन कहीं-कहीं बहुत राहत मिल रही है जबकि कहीं बिल्कुल भी मदद नहीं मिली है.

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अररिया शहर में जहाँ राहत शिविरों में मुश्किलें कम हैं क्योंकि सारा प्रबंधन निजी संगठनों के हाथ में रहा. सरकारी अधिकारियों के ज़िम्मेदारी अपने हाथ में लेने के बाद भी निजी संगठन इससे जुड़े हैं.

स्वयंसेवी संस्था से जुड़ी कामायनी बताती हैं कि अररिया शहर में स्थानीय लोगों ने सराहनीय काम किया है और अगर ये लोग न होते तो कई बाढ़ पीड़ित भूखों मर सकते थे.

उनका कहना था कि शहर में बाढ़ पीड़ितों का ख़्याल भी रखा जा रहा है और सरकार पर राहत के लिए स्थानीय लोग दबाव भी बना रहे हैं.

कमी

शहर से 15-20 किलोमीटर दूर के राहत शिविर सरकारी थे जहाँ हालत अत्यंत ख़राब थी. ख़राब खाना, व्यवस्था की कमी, साफ पानी और शौच की कोई व्यवस्था इन स्थानों पर नहीं देखी गई.

रानीगंज के सरवाहा के पास एक स्थान पर तो लोग आकर रहने लगे और वहाँ एक शिविर बन गया. इस शिविर में लोगों के खाने के लिए कुछ भी उपलब्ध नहीं था जबकि यूनिसेफ़ ने यहाँ शिविर लगा रखा था.

इस शिविर के एक व्यक्ति का कहना था, "यहाँ देखिए... मचान बना लिए हैं. प्लास्टिक नहीं है. बारिश में भींग जाते हैं. दवाई दिया जा रहा है लेकिन खाना नहीं है. भूखे पेट क्या दवाई खाएगा आदमी."

इस बारे में प्रशासन का कहना था कि ये शिविर अस्थायी है और इसके लिए वो कोई मदद नहीं दे सकते. यहाँ न तो सरकार मदद कर रही थी और न ही स्वयंसेवी संगठन पहुँचे थे.

यही हाल खगड़िया- सहरसा मार्ग पर भी देखने को मिला. बेलदौरा के पास राहत शिविर में लोगों के लिए खाने पीने और रहने की अच्छी व्यवस्था थी. यहाँ डाक्टर भी थे और बचाव के लिए सेना भी लेकिन इसी स्थान से क़रीब 10 किलोमीटर दूर लगमा पुल पर स्थिति भयावह थी.

लगमा पुल के पास ही कई लोग झुग्गियाँ बना कर रहने को मजबूर थे. इन लोगों को 10 दिन से खाने के लिए कुछ भी नहीं मिल सका था. जब हम यहाँ पहुँचे तो पाया कि कोई सरकारी व्यवस्था तो नहीं थी बल्कि इंडियन रेड क्रॉस के लोग कपड़े बाँट रहे थे.

लोग यहाँ कई दिनों से भूखे थे और 10 दिन में पहली बार उन्हें कपडे़ मिल रहे थे भोजन नहीं. यहाँ पर यूनिसेफ़ की टीम भी थी लेकिन उनका भी कहना था कि लोगों को भोजन नहीं मिल रहा है और ऐसे में दवा देने का कोई मतलब नहीं.