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बुधवार, 17 सितंबर, 2008 को 01:27 GMT तक के समाचार
 
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महाप्रयोग में जम्मू-कश्मीर का योगदान
 

 
 
सर्न का महाप्रयोग
सर्न के महाप्रयोग में बहुत से भारतीय वैज्ञानिक तरह-तरह से योगदान दे रहे हैं
जम्मू में मुठभेड़, दो सुरक्षाकर्मियों की मौत.. कश्मीर में चरमपंथी हमला, चार लोगों की जान गईं.... जम्मू-कश्मीर में जिस तरह के हालात रहे हैं उसमें सब लोग इन्हीं सुर्ख़ियों के आदी हो गए हैं.

पिछले करीब बीस वर्षों से जम्मू-कश्मीर के हालात ऐसे रहे हैं कि अंतरराष्ट्रीय जगत ने भी आमतौर पर जम्मू कश्मीर को नकारात्मक ख़बरों के चश्मे से ही देखा है.

लेकिन तनाव के इसी माहौल और बिजली जैसी आधारभूत सुविधाओं की कमी के बीच जम्मू के वैज्ञानिकों ने सर्न में चल रहे महत्वपूर्ण महाप्रयोग में बेहद अहम भूमिका निभाकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मौजूदगी दर्ज करवाई है.

पिछले 11 सालों से विश्वविद्यालय के करीब 20 लोग इस प्रयोग पर काम कर रहे हैं.

महाप्रयोग में इस्तेमाल हुए 'फोटॉन मल्टीपलिस्टी डिटेक्टर' के कंट्रोल सिस्टम का काम डॉक्टर अनिक गुप्ता ने ही किया है.

वे बताते हैं कि इसका ऑपरेशन जम्मू विश्वविद्यालय से भी नियंत्रित किया जा रहा है.

प्रोजेक्ट इंजीनियर डॉक्टर अनिक गुप्ता बताते हैं, "कई प्रयोग हो रहे हैं, उनमें से एक है एलिस प्रयोग. इसमें 18 डिटेक्टर लगाए गए हैं. उनमें से एक है फोटोन मल्टीपलिस्टी डिटेक्टर. इसके शोध से लेकर, बनाने तक, परीक्षण और सर्न तक पहुँचाने का पूरा काम भारत ने किया है, जम्मू ने इसका एक चौथाई हिस्सा बनाया है."

विश्वविद्यालय की डॉक्टर अंजू भसीन तो इन दिनों सर्न में ही हैं. वे बताती हैं कि एलिस प्रयोग का काम 1990 में शुरु हुआ था और जम्मू यूनिवर्सिटी के लोग 1997 से ही इसका हिस्सा रहे हैं.

मुश्किलों के बावजूद....

 हमारे पास प्रयोगशाला तक नहीं थी. बड़ी जद्दोजहद करके पहले तो केवल तीन-चार महीनों में प्रयोगशाला बनाईं. पर अफ़सोस है कि हम उस ग्रिड का हिस्सा पूरी तरह नहीं बन पाएँगे जिसके ज़रिए डाटा का आकलन होगा. क्योंकि विश्वविद्यालय को ये गारंटी देनी पड़ती कि पूरा सिस्टम 99 फ़ीसदी समय ठीक रहना चाहिए. प्रदेश में बिजली आपूर्ति की स्थिति इतनी ख़राब है कि ये गारंटी देना मुमकिन नहीं है. लेकिन अपने काम से हम बेहद ख़ुश हैं.
 
डॉक्टर अनिक गुप्ता, जम्मू विश्वविद्यालय

इस सब काम में आधारभूत ढाँचे की कमी के कारण वैज्ञानिकों को कई दिक्कतों का सामना करना पड़ा.

डॉक्टर गुप्ता बताते हैं, "जम्मू में बिजली और इंटरनेट स्पीड की भी समस्या है. हमारे पास प्रयोगशाला तक नहीं थी. बड़ी जद्दोजहद करके पहले तो केवल तीन-चार महीनों में प्रयोगशाला बनाई गई और फिर डिटेक्टर बनाए गए. यह बड़ा ही महीन काम है और ध्यान रखना होता है कि आस-पास धूल का एक कण भी न हो."

बिजली के बदहाल स्थिति के बीच ही जम्मू के वैज्ञानिकों को अपना काम तय समयसीमा में पूरा करना पड़ा.

इस महाप्रयोग से वैज्ञानिकों को बहुत सारा डाटा मिलेगा जिसे विभिन्न कंप्यूटर ग्रिड केंद्रों में रखा जाएगा.

जम्मू विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों को अफ़सोस इस बात का है कि प्रयोग में अहम भूमिका निभाने के बावजूद मूलभूत सुविधाओं के अभाव में वे इस ग्रिड का पूरी तरह हिस्सा नहीं बन सकेंगे.

ग्रिड का हिस्सा बनने के लिए विश्वविद्यालय को ये गारंटी देनी पड़ती कि पूरा सिस्टम 90 से 99 फ़ीसदी समय ठीक रहना चाहिए. लेकिन विश्वविद्यालय के लोग कहते हैं कि प्रदेश में बिजली आपूर्ति की स्थिति इतनी ख़राब है कि ये गारंटी देना मुमकिन नहीं था.

डॉक्टर अंजू भसीन ने कहा, " बिजली समस्या के कारण नुक़सान ये है कि हमारे पास डाटा तक पहुँच तो होगी लेकिन फिर भी उसका पूरी तरह इस्तेमाल नहीं कर पाएँगे, हमारे हाथ बँध जाते हैं."

पर इसके बावजूद वैज्ञानिकों को फ़क्र है कि जम्मू कश्मीर में प्रतिकूल माहौल और नकारात्मक ख़बरों के बीच भी उन्होंने कुछ ऐसा कर दिखाया है जिस कारण जम्मू को किसी सकारात्मक काम के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नाम मिला है.

 
 
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