शुक्रवार, 09 मई, 2008 को 16:01 GMT तक के समाचार
सुप्रीम कोर्ट ने एम्स संशोधन क़ानून को खुल्लम-खुल्ला भेदभाव और एक व्यक्ति के क़ानून की संज्ञा दी है. इसी संशोधन अधिनियम के तहत पी वेणुगोपाल को एम्स के निदेशक पद से हटा दिया गया था.
पी वेणुगोपाल की याचिका पर गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें दोबारा बहाल करने का आदेश दिया था. इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को 58 पन्ने का फ़ैसला जारी किया.
अपने फ़ैसले में जस्टिस तरुण चैटर्जी और जस्टिस एचएस बेदी ने कहा कि वेणुगोपाल को हटाए जाने और फिर बहाल किए जाने के बीच की अवधि का वेतन और अन्य भत्ते दिए जाएँगे.
66 वर्षीय पी वेणुगोपाल दो जुलाई को रिटायर हो जाएँगे. पिछले साल नवंबर में केंद्र सरकार ने एम्स क़ानून में संशोधन कर वेणुगोपाल को निदेशक पद से हटा दिया था.
संशोधन अधिनियम के तहत निदेशक के रिटायर होने की उम्र 65 वर्ष निर्धारित कर दी गई थी.
फ़ैसला
लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने अपने फ़ैसले में इस संशोधन अधिनियम को असंवैधानिक करार दिया और पी वेणुगोपाल को बहाल करने को कहा.
वेणुगोपाल और स्वास्थ्य मंत्री अंबुमणि रामदॉस के रिश्ते काफ़ी ख़राब थे और दोनों के मतभेद खुल कर सामने आ गए थे.
सुप्रीम कोर्ट ने वेणुगोपाल की उस दलील को भी स्वीकार किया कि एम्स एक्ट में संशोधन करने का एकमात्र मक़सद उन्हें निदेशक पद से हटाना था क्योंकि उनके स्वास्थ्य मंत्री से मतभेद थे.
सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के बाद वेणुगोपाल ने एम्स के निदेशक पद का ज़िम्मा फिर से संभाल लिया है.
अदालत ने वेणुगोपाल के उस तर्क को भी मान लिया कि सरकारी नौकरी में आने वाले लोगों को मौलिक अधिकारों से वंचित नहीं किया जा सकता.
संविधान के अनुच्छेद 13 (2) का हवाला देते हुए सुप्रीम कोर्ट की खंडपीठ ने कहा कि सरकार कोई भी ऐसा क़ानून नहीं बना सकती जिससे नागरिकों के मौलिक अधिकारों का हनन होता हो.
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि एम्स में नौकरी की शर्तों में ये बात शामिल है कि निदेशक का पद कार्यकाल वाला होगा और इसे समय से पहले ख़त्म नहीं किया जा सकता.