बुधवार, 07 मई, 2008 को 14:50 GMT तक के समाचार
अल्ताफ़ हुसैन
बीबीसी संवाददाता, श्रीनगर
नौ कश्मीरी पंडितों के परिवारों की घर वापसी का अनुभव अच्छा नहीं रहा है. उनका कहना है कि कश्मीर के अधिकारी उन्हें वहाँ फिर से बसने में हतोत्साहित करते हैं.
वे अपने गाँवों में फिर से घर बनाना चाहते हैं, लेकिन सरकार बस स्टैंड बनाने के लिए उनसे ज़मीन छीन रही है.
1990 के दशक में कश्मीर में चरमपंथ के उभार के बाद ज़्यादातर पंडितों ने या तो अपने घर बेच दिए थे, या उनके घरों को जला दिया गया था.
पिछले महीने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कश्मीर की यात्रा को दौरान एक विशेष पैकेज की घोषणा की थी.
उन्होंने कश्मीर से बाहर रह रहे हर परिवार को कश्मीर में घरों की मरम्मत के लिए साढ़े सात लाख रुपए की सहायता राशि देने की घोषणा की थी.
साथ ही, जिन परिवारों के पास कश्मीर में किसी भी तरह की ज़मीन जायदाद नहीं है उन्हें सरकार ज़मीन देने के साथ मकान बनाने के लिए सहायता राशि देने की भी घोषणा की थी.
एक कश्मीरी पंडित कमलता कौल कहती हैं, "एक तरफ़ सरकार हमें वापस बुला रही है और दूसरी ओर जब हम वापस आएँ हैं तो हमें फिर से भेजना चाहती है. क्यों सरकार हमारी ज़मीन लेना चाहती है, क्या उसे अन्य जगह पर ज़मीन नहीं मिल रही है."
ज़मीन अधिग्रहण
उन्होंने कहा सरकार के पैकेज से कश्मीरी पंडितों के वापस आने का कोई लेना-देना नहीं है. ज़मीन अधिग्रहण के फ़ैसले को सुन कर वे वापस आए हैं.
अनंतनाग ज़िले के उप कमिश्नर जयपाल सिंह ने बीबसी को बताया, "पिछले वर्ष ही पंडितों के घर के पते (जम्मू) पर उनके ज़मीन के अधिग्रहण की नोटिस भेज दी गई थी. लेकिन उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया."
वे कहते हैं कि अब सरकार ने ज़मीन के अधिग्रहण का फ़ैसला किया है.
हालांकि क़रीब 18 वर्षों के निर्वासन के बाद वेरीनाग इलाक़े में वापस लौटे कश्मीरी पंडितों का उनके मुस्लिम पड़ोसियों ने गर्मजोशी से स्वागत किया है.
एक बूढ़े पड़ोसी ग़ुलाम अहमद नाइक ने बताया, "मैं अपने पड़ोसियों से मिलने को तरस गया था. मुझे इतने बर्षों बाद इनसे मिलकर बेहद खुशी हो रही है."