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सोमवार, 05 मई, 2008 को 15:04 GMT तक के समाचार

वंदना
बीबीसी संवाददाता

कश्मीर सिंह की डायरी

पाकिस्तान की जेल से 35 साल बाद रिहा होकर आए भारत के नागरिक कश्मीर सिंह ने लंबी बातचीत में बीबीसी हिंदी से अपने अनुभव बाँटे हैं. उनके ये अनुभव 'अजीब दास्तां है ये' नाम से डायरी की शक्ल में पेश किए गए हैं. पेश हैं इस डायरी के छह अंक.

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अजीब दास्तां है ये-1

बरसों बाद भारत लौटकर अपनी बीवी से मिले कश्मीर सिंह कहते हैं कि वो आजकल उनसे कुछ कहने से भी डरते हैं-कहीं रूठे ना. वे दुखी हैं कि सालों तक किसी ने परिवार को नहीं पूछा.

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अजीब दास्तां है ये-2

पाकिस्तान में कश्मीर सिंह का नाम-पहचान सब बदल गया और जब घर लौटे तो पाया कि पीछे से गाँव तक का नाम बदल चुका था-सब कुछ अजनबी सा.

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अजीब दास्तां है ये-3

पाकिस्तान में पूर्व भारतीय क़ैदी कश्मीर सिंह बताते हैं कि 1978 में उन्हें वहाँ फाँसी का सज़ा सुनाई गई, फाँसी लगने में दो घंटे का वक़्त बचा था लेकिन..

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अजीब दास्तां है ये-4

कश्मीर सिंह बताते हैं कि पाकिस्तानी जेल में उन्होंने कई भारत-पाक क्रिकेट मैचों का मज़ा उठाया. जेल के मुलाज़िमों से हुई दोस्ती को भी वो याद करते हैं.

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अजीब दास्तां है ये-5

पैंतीस बरसों बाद काल-कोठरी के अंधेरे से निकलकर बाहर क़दम रखने वाले कश्मीर सिंह बताते हैं बाहर आकर उन्हें लगा था मानो वे अभी-अभी पैदा हुए हों.

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अजीब दास्तां है ये-6

पाकिस्तानी जेल से रिहा हो अपने परिवार के साथ वक़्त बिता रहे कश्मीर सिंह की गुहार कि उनके जैसे भारत-पाक के बाक़ी क़ैदियों को भी मिले रिहाई.

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