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रविवार, 13 अप्रैल, 2008 को 07:16 GMT तक के समाचार

माओवादियों को भारी बढ़त

नेपाल में संविधान सभा के गठन के लिए हुए चुनावों की मतगणना में माओवादियों को जोरदार बढ़त मिली है और नेपाली कांग्रेस और अन्य दलों को झटका लगा है.

अभी तक 84 सीटों के नतीजे घोषित किए गए हैं जिनमें 43 नेपाल की कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के पक्ष में गए हैं.

पार्टी चेयरमैन पुष्पकमल दहल यानी प्रचंड काठमांडू क्षेत्र नंबर 10 से चुनाव जीत गए हैं.

नेपाली कांग्रेस को 10 सीटें मिली हैं, जबकि नेपाल की कम्युनिस्ट पार्टी (यूनाइटेड मार्क्सवादी लेनिनवादी) को 13 सीटें मिली हैं.

मधेशी जनाधिकार फ़ोरम को पाँच सीटों पर कामयाबी मिली है. मधेशी जनाधिकार फ़ोरम के उपेंद्र यादव चुनाव जीत गए हैं.

दो सीटों पर नेपाल मज़दूर किसान पार्टी ने जीत हासिल की है.

जिन सीटों के रुझान मिले हैं उनमें से दो तिहाई सीटों पर माओवादियों ने बढ़त बनाई हुई है.

जिस तरह के रुझान मिल रहे हैं उससे लगता है कि माओवादियों को संविधान सभा में बहुमत हासिल हो जाएगा.

मतगणना की रफ़्तार धीमी है क्योंकि कुछ एक सीटों को छोड़ कर शेष सीटों पर इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों का उपयोग नहीं हुआ है, इसलिए मतपत्रों की गणना में समय लग रहा है.

लेकिन अब तक मिले रुझानों से माओवादी खेमे में जश्न का माहौल है और उनके हज़ारों समर्थक सड़कों पर निकल आए हैं.

इस बीच माओवादी नेता प्रचंड ने कहा है कि उनकी पार्टी शांति समझौते को ही आगे बढ़ाएगी. उन्होंने कहा कि उनकी पार्टी नेपाल के पड़ोसी देशों भारत और चीन से अच्छे रिश्ते कायम रखना चाहेगी.

प्रचंड ने कहा कि नेपाल की जनता गणतंत्र और बदलाव चाहती है. इसीलिए सबसे पहला काम राजशाही को पूरी तरह उखाड़ फेंकना होगा.

प्रचंड ने दोहराया कि बहुमत हासिल होने पर माओवादी संविधान सभा में सभी को साथ लेकर चलेंगे और पहली प्राथमिकता नेपाल का आर्थिक विकास और रोज़गार के साधन पैदा करना होगी.

समीकरण

इस बीच नेपाली कांग्रेस के कार्यकारी अध्यक्ष सुशील कोइराला चुनाव हार गए हैं और उन्होंने अपने पद से इस्तीफ़ा देने की बात कही है.

माओवादियों को काठमांडू क्षेत्र 2 में ज़ोरदार झटका लगा है. सीपीएन (यूएमएल) के नेता माधव नेपाल चुनाव हार गए हैं.

उधर नेपाली कांग्रेस के उम्मीदवार प्रकाशमान सिंह चुनाव जीत गए हैं.

अभी तक के रुझानों को देखा जाए तो सबसे तगड़ा झटका नेपाल की कम्युनिस्ट पार्टी (यूएमएल) को लगा है. उनके एक बड़े नेता प्रदीप नेपाल चुनाव हार चुके हैं.

लोगों का कहना है कि चुनाव प्रचार में माओवादियों ने बड़े ही सीधे शब्दों में जनता के सामने अपना एजेंडा रखा जिसका फ़ायदा उन्हें मिल रहा है.

दूसरी ओर अन्य पार्टियाँ कभी न कभी सत्ता का स्वाद चख चुकी हैं. पर्यवेक्षकों की राय में उन्हें अवसरवादी समझा जा रहा है.

राजधानी काठमांडू में एक माओवादी समर्थक का कहना था, "उन्होंने जनता के लिए काम किया है. दस साल से संघर्ष करते आए हैं, न पानी पिया और न ठीक से खाना खाया. इसका फ़ायदा तो मिलेगा ही."

शासन प्रणाली

इस चुनाव मे 240 सीटों पर प्रत्यक्ष चुनाव और 335 सीटों के लिए समानुपातिक पद्धति से चुनाव हुआ है, जिसमें मतदाता को उम्मीदवार को न चुनकर पार्टी को चुनना था.

पूरे चुनाव परिणाम आने और गणतंत्र घोषित किए जाने के बाद सबसे बड़ा सवाल होगा कि नेपाल किस शासन की किस प्रणाली को अपनाता है.

नेपाल में अमरीका की तरह राष्ट्रपति प्रणाली लागू की जाती है या फिर भारत की तरह सारे कार्यकारी अधिकार प्रधानमंत्री के पास रहते हैं.

हालांकि, माओवादी अपने नेता प्रचंड का नाम नेपाल के भावी राष्ट्रपति के तौर पर पेश कर चुके हैं.

लेकिन खुद प्रचंड का कहना है कि नेपाल क्या प्रणाली अपनाता है वो इसके लिए बहस को तैयार हैं.

वैसे संविधान सभा के बनने के बाद इस नेपाल का संविधान तैयार करने के लिए दो साल का समय होगा और ज़रूरत पड़ने पर इस संविधान सभा का कार्यकाल छह महीने और बढ़ाया जा सकेगा.

क्या होगी तस्वीर ?

चुनाव परिणाम पूरी तरह सामने आने में कई दिन लग सकते हैं क्योंकि नेपाल के कई दुर्गम इलाक़े ऐसे हैं जहाँ मतगणना अभी शुरू ही हुई है.

वहाँ से तस्वीर साफ़ होने मे समय लगेगा, पर तराई और राजधानी काठमांडू में कल तक तस्वीर काफ़ी हद तक साफ़ हो जाएगी और कई परिणाम सामने आ सकते हैं.

अब जिस तरह के रुझान प्रत्यक्ष चुनावों के आ रहे हैं, उनसे ऐसा लग रहा है कि माओवादियों को समानुपातिक चुनाव मे काफ़ी फ़ायदा हो सकता है.

इसका कारण बताया जा रहा है कि जहाँ माओवादियों का परंपरागत आधार नहीं है वहाँ अगर वो अच्छा प्रदर्शन कर रहे हैं तो उनके गढ़ माने जाने वाले क्षेत्रों मे उन्हें एकतरफ़ा बढ़त मिल सकती है.

हालाँकि अब तक माओवादियों के साथ सरकार में शामिल थे पर उनका कहना है कि संविधान सभा में माओवादियों के बहुमत की स्थिति में देश में लोकतंत्र स्थापित करने के संयुक्त प्रयास को झटका लग सकता है क्योंकि माओवादी मिलजुल कर काम करने के आदी नही हैं.

उधर नेपाली कांग्रेस के नेता भी चुनाव परिणामों को हैरान करने वाला बता रहे हैं.

हालाँकि ये नेता अभी हार स्वीकार नही कर रहे हैं, पर दबी ज़ुबान मे मान रहे हैं कि उनके कई धुरधंर नेता भी ख़तरे में हैं.