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विकास अच्छे स्वास्थ्य की गारंटी नहीं
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नए शोध के मुताबिक उच्च विकास दर हासिल करने के बावजूद भारत में बाल मृत्यु दर चिंताजनक है, जबकि उसके पड़ोसी ग़रीब देशों में
स्थिति कहीं बेहतर है.
संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (यूएनडीपी) के नए शोध 'वेल्थ एंड सरवाइवल' के मुताबिक नेपाल, मलावी, तंजानिया और बांग्लादेश जैसे अविकसित देश बाल मृत्यु दर कम करने में सफलता हासिल करने वाले शीर्ष दस देशों में शामिल हो गए हैं. वहीं दूसरी ओर दक्षिण एशिया में सबसे तेज़ गति से आर्थिक विकास कर रहे भारत की स्थिति बदतर है. रिपोर्ट के मुताबिक उड़ीसा, राजस्थान और बिहार वैसे इलाक़े हैं जो बाल मृत्यु दर और प्रसव के दौरान होने वाली मौतों के मामले में निचले पायदान पर हैं. उड़ीसा की स्थिति उड़ीसा के बारे में कहा गया है कि वहाँ चिकित्सा सुविधा हासिल करने में गाँव वालों को कई दिन लग जाते हैं, कुछ दूरवर्ती इलाक़ों से अस्पताल पहुँचने के लिए लोग नाव का सहारा लेते हैं.
उड़ीसा के डॉक्टर बहरुदत्त मिश्रा कहते हैं कि सरकार डॉक्टरों को सुदूरवर्ती इलाक़ों में भेजने के लिए प्रोत्साहित करती है लेकिन ये बहुतों को आकर्षित नहीं करता है, ख़ास कर आईटी में मिल रहे पैसे को देखते हुए. वो कहते हैं, "अगर किसी डॉक्टर के घर में पानी की आपूर्ति और बिजली नहीं है और प्रभावित गाँव तक पहुँचने के लिए कोई वाहन नहीं हो तो स्वाभाविक है कि कई तरह की मुश्किलें खड़ी होंगी."
बच्चों के लिए काम करने वाली संस्था 'सेव द चिल्ड्रेन' के मुताबिक हर साल पूरी दुनिया में एक करोड़ बच्चे पाँचवा जन्मदिन नहीं मना पाते और इनमें 99 फ़ीसदी विकासशील देशों में रहते हैं. सेव द चिल्ड्रेन के लिए भारत में काम कर रहीं शिरीन मिलर कहती हैं, "भारत में बाल मृत्यु दर के आँकड़े हैरान करने वाले हैं. वे इस मामले में उप सहारा के देशों के निकट हैं और कोई ये सवाल कर सकता है कि अगर हम इस तरह तेज़ आर्थिक विकास कर सकते हैं तो वही हम सामाजिक क्षेत्र में क्यों नहीं दोहरा सकते." मिलर सवालिया लहज़े में कहती हैं, "वास्तव में क्या हम विकसित देश हैं अगर हज़ारों बच्चे मर रहे हैं या भूख से तड़प रहे हैं." कौन है दोषी? सेव द चिल्ड्रेन के डेविड मेफम कहते हैं, "कोई बच्चा अपना पाँचवा जन्मदिन मना पाएगा या नहीं, ये उस देश या समाज पर भी निर्भर करता है जहाँ उसका जन्म हुआ है." जहाँ तक उड़ीसा का सवाल है तो वहाँ के सरकारी अधिकारी उच्च बाल मृत्यु दर के लिए गाँवों में सदियों से चली आ रही परंपराओं को ज़िम्मेदार ठहराते हैं, जैसे जन्म के समय बच्चे को भूखा रखना और उन्हें ठंडे पानी से नहाना. अधिकारियों का कहना है कि जहाँ भी उन्होंने प्रसव कराने वाली दाइयों को प्रशिक्षित किया है वहाँ जच्चे-बच्चे की सलामती की संभावना बढ़ी है. |
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