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धान की जीन संशोधित क़िस्म पर चेतावनी | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
ग़ैरसरकारी संगठन ग्रीनपीस ने धान की जीन संशोधित क़िस्म का प्रयोग भारत में किए जाने के ख़तरों के प्रति गंभीर चेतावनी दी है. पर्यावरण संरक्षण के लिए काम करने वाले अंतरराष्ट्रीय ग़ैर सरकारी संगठन ग्रीनपीस की भारत शाखा ने आगाह किया है कि अगर लोगों ने जैनेटिकली इंजीनियर्ड यानी जीन में संशोधन करके बनाए गए धान की क़िस्म को अपने खेतों में आज़माया तो उन्हें भी अमरीका के चावल उद्योग की ही तरह अरबों रुपए के नुक़सान का सामना करना पड़ सकता है. ग्रीनपीस का कहना है कि अमरीका में साल 2006 में इसी तरह के धान की क़िस्म आज़माई गई थी जिसने चावल उद्योग को एक अरब 20 करोड़ डॉलर का नुक़सान उठाना पड़ा था. ऐसे आरोप थे कि बेयर्स कंपनी के खेतों में आज़माई गई यह क़िस्म दूषित हो गई थी. ग्रीनपीस ने 'रिस्की बिज़नेस-1' यानी 'जोखिमभरा कारोबार-1' नामक रिपोर्ट मंगलवार को लखनऊ में जारी की है जिसमें आगाह किया गया है कि उस क़िस्म को लखनऊ से क़रीब 25 किलोमीटर दूर महूरा कलाँ गाँव में बोया गया है जिसके ख़तरनाक परिणाम हो सकते हैं. ग्रीनपीस के कार्यकर्ताओं और भारतीय किसान यूनियन के किसानों ने उस गाँव में लगभग 7500 वर्गफुट धान खेत को एक वैनर से ढक दिया जिस पर लिखा था, "धान बचाओ". उस बैनर पर बीच में जीई लिखा हुआ है जिसे लाल घेरे से काटा गया है जिसका मतलब लगाया जाता है कि उसका इस्तेमाल न करें. ग्रीनपीस ने आहवान किया है कि भारत में जीई की चावल क़िस्म को बिल्कुल नहीं आज़माया जाना चाहिए. ग्रीनपीस ने चावल की खेती को इस तरह की जीई क़िस्म से होने वाले ख़तरे के प्रति ख़बरदार करने के लिए यह रिपोर्ट तैयार की है और जागरूकता अभियान चलाया है. एलएल601 वर्ष 2006 में अमरीका में बेयर्स की जीई चावल क़िस्म - एलएल601 के कुछ निशान चावलों में पाए गए थे और वह क़िस्म दूषित थी. दरअसल इस क़िस्म को प्रयोग के तौर पर 2001 में कुछ खेतों में बोया गया था और वहीं से यह दूषण फैल गया था.
इस दूषण की वजह से अमरीका के चावल उद्योग के इतिहास में सबसे बड़ा संकट आ गया था और उस दूषित क़िस्म की वजह से कम से कम तीस देशों पर इसका असर पड़ा था. बहुत से देशों ने अमरीकी चावल के लिए अपने दरवाज़े बंद कर दिए थे जिनमें यूरोपीय संघ, जापान और फ़िलीपींस जैसे बड़े आयातक भी शामिल थे. ग्रीनपीस के एक वरिष्ठ पदाधिकारी राजेश कृष्णन - जीई मुक्त भारत - नामक अभियान की देखरेख कर रहे हैं. उनका कहना है, "यह भारत सरकार के लिए आँख खोलने वाली एक चेतावनी है जिसने जीई क़िस्मों को अपने यहाँ आने देने के लिए सारे दरवाज़े खुले छोड़ दिए हैं." राजेश कृष्णन का कहना है, "चावल की उस जीई क़िस्म के एक छोटे से प्रयोग की वजह से अमरीका के चावल उद्योग में इतना बड़ा भूचाल आ गया था और उसकी वजह से बहुत से अमरीकी किसान फिर से संभल नहीं सके. भारत में इस तरह के संकट से बचने का बस यही एक रास्ता है कि इस तरह के फ़सल प्रयोग या उनकी पैदावार नहीं होने दी जाए." जोखिम ग्रीनपीस की इस रिपोर्ट में अमरीका के उस चावल उद्योग संकट का ज़िक्र किया गया है जिसमें अमरीका भर में चावल की आपूर्ति प्रभावित हुई थी और धान उगाने वाले किसानों, मिलों, कारोबारियों और दुकानों पर चावल बेचने वाले सभी कारोबारियों को बड़ा नुक़सान हुआ था.
इस संकट से अमरीका का लगभग 63 प्रतिशत चावल निर्यात प्रभावित हुआ था और चावल उद्योग को लगभग एक अरब बीस करोड़ डॉलर का नुक़सान होने का अनुमान लगाया गया था. भारतीय किसान यूनियन के प्रवक्ता राकेश टिकैत का कहना था, "भारत में बासमती चावल के उत्पादक जीई तकनीक से मुक्त रहना चाहते हैं लेकिन जीई क़िस्मों का प्रयोग तो उन्हीं खेतों में होगा जिनके पास वाले खेतों में बासमती क़िस्म उगाई जाती है जिससे बासमती की क़िस्में दूषित होने का ख़तरा है और अगर ऐसा होता है तो देश का लगभग 7035 करोड़ रुपए का निर्यात बाज़ार प्रभावित हो सकते हैं और अंततः नुक़सान हमारे किसानों को भुगतना पड़ेगा." भारत सरकार ने साल 2007 में देश में 12 स्थानों पर धान की जीई क़िस्मों का प्रयोग करने की इजाज़त दी है जिनमें से एक ऑउत्तर प्रदेश के लखनऊ के पास का एक गाँव भी है. उस इलाक़े को हालाँकि बासमती के लिए मशहूर माना जाता है. सुप्रीम कोर्ट के एक अंतरिम आदेश की वजह से उस क़िस्म की रोपाई करने में ज़रा देरी हुई है लेकिन वह अगले महीने तक भी हो सकती है. | इससे जुड़ी ख़बरें बाढ़ से जूझनेवाले धान का वरदान21 सितंबर, 2007 | विज्ञान अब होगी वाटरप्रूफ़ धान की खेती18 अगस्त, 2006 | विज्ञान नारज़ किसानों ने धान की फसल फेंकी05 अक्तूबर, 2005 | भारत और पड़ोस छत्तीसगढ़ में हैं औषधीय चावल की कई प्रजातियाँ10 अक्तूबर, 2004 | भारत और पड़ोस | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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