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शुक्रवार, 05 अक्तूबर, 2007 को 15:44 GMT तक के समाचार

महबूब ख़ान
बीबीसी संवाददाता, लंदन

भारतीय मुसलमान:60 साल का अरसा

दक्षिण एशिया उप महाद्वीप में अल्पसंख्यकों का मुद्दा हमेशा ही चर्चा में रहा है. भारत में मुसलमानों को आज़ादी के साठ साल में क्या मिला है, क्या हैं उनके मुद्दे और चिंताएँ. क्या अपेक्षाएँ हैं मुसलमानों को सिस्टम और हिंदुओं से. क्या ख़ुद मुसलमान सिस्टम और बहुसंख्यक समाज की अपेक्षाओं को पूरा कर पाए हैं.

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जब भारत की आज़ादी के ऐलान के साथ ही जन्म लिया था एक नया जहाँ बनाने की उम्मीदों ने. आज़ादी मिली तो, मगर भारी क़ीमत चुकाने के साथ. लाखों लोगों की जान और भारी माल का नुक़सान. विभाजन की तलख़ियाँ भारत में आज भी पूरी तरह दूर नहीं हुई हैं.

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पत्रकार कुलदीप नैयर को बँटवारे का वो दर्द अब भी याद है, "बँटवारे के बाद कुछ ऐसी चीज़ें और बातें जो हमने सोची थीं कि नहीं होंगी, वो हुईं. मिसाल के तौर पर हम चाहते थे कि हम अपने पैत्रिक स्थान स्यालकोट (अब पाकिस्तान में) में रहें यानी पाकिस्तान में हिंदू और भारत में मुसलमान रहें लेकिन ये हुआ कि वहाँ से हम पर दबाव पड़ा कि आप निकलिए और इसी तरह से भारत में मुसलमानों को पंजाब और दिल्ली से निकाला गया. विभाजन में, कहते हैं कि कम से कम दस लाख लोग मर गए. तो दोनों मुल्कों का जन्म ख़ून के ज़रिए हुआ."

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1947 के बाद कुछ समय तक भारतीय भारतीय मुसलमानों में को इन सवालों का सामना करना पड़ा कि बँटवारे के लिए वही ज़िम्मेदार थे मगर सामाजिक चिंतक असग़र अली इंजीनियर कहते हैं कि बँटवारे के लिए मुसलमानों का सिर्फ़ क्रीमी तबक़ा ज़िम्मेदार था, "ये बात बहुत बड़ा झूठ है कि विभाजन के लिए सारे मुसलमान ज़िम्मेदार थे, विभाजन के लिए चार-पाँच प्रतिशत से ज़्यादा मुसलमान ज़िम्मेदार नहीं थे. विभाजन के आंदोलन में उन्हीं मुसलमानों ने बढ़चढ़कर हिस्सा लिया जिन्हें भारत में अपने हितों के लिए ख़तरा नज़र आया था, मसलन ज़मींदार तबके को भारत में अपनी ज़मींदारी के लिए ख़तरा नज़र आया था."

असग़र अली इंजीनियर कहते हैं कि आम मुसलमानों ने विभाजन के विचार का भारी विरोध किया था इसलिए आम मुसलमान विभाजन के लिए क़तई ज़िम्मेदार नहीं था.

दूसरी तरफ़ समाज शास्त्री प्रोफ़ेसर इम्तियाज़ अहमद कहते हैं कि भारतीय मुसलमान काफ़ी समय तक द्वंद्व का शिकार रहे, "आज़ादी के बाद पंद्रह साल के समय तक भारतीय मुसलमान इस विश्वास को हासिल नहीं कर सके कि उनके हालात इस देश में किस तरह के होंगे- अच्छे या बुरे. उन पंद्रह वर्षों में मुसलमान इस अनिश्चितता का शिकार रहे कि वे भारत में रहेंगे या नहीं."

प्रोफ़ेसर इम्तियाज़ के अनुसार मुसलमानों ने इसी अनिश्चितता की वजह से देश की प्रगति में भागीदारी के लिए कोई ख़ास गतिविधियाँ और कोई प्रगतिशीलता भी नहीं दिखाई, कोशिश ही नहीं की, ख़ुद को सरकार से भी अलग रखा और ये फ़ैसला नहीं कर सका कि उन्हें आगे बढ़ने के लिए क्या करना चाहिए.

लेकिन 1960 का दशक पूरा होते-होते भारत और पाकिस्तान ने वह विकल्प बंद कर दिया जिसमें भारत से पाकिस्तान या पाकिस्तान से भारत आकर बसने की सुविधा समाप्त कर दी गई थी जिसके बाद बहुत से भारतीय मुसलमानों के सामने देश में ही रहने के सिवाय कोई चारा नहीं बचा.

प्रोफ़ेसर इम्तियाज़ अहमद की नज़र में मुसलमानों ने 1970 तक आते-आते आत्मविश्वास बटोरा और सिस्टम में भागीदारी शुरू की. साथ ही कारोबारी गतिविधियों में भाग लेना शुरू किया.

उधर जामिया मिलिया इस्लामिया के वाइस चांसलर प्रोफ़ेसर मुशीरुल हसन उन हालात को कुछ अलग नज़र से देखते हैं, "आज़ादी और विभाजन के बाद भारत में मुसलमानों को एक नई व्यवस्था में रहना था जो धर्मनिर्पेक्ष और लोकतांत्रिक थी जिसके आधार पर उन्हें अपनी ज़िंदगी को बनाना और संवारना था और यह कोई आसान काम नहीं था और उन्होंने कोशिश की और धर्मनिर्पेक्षता को उन्होंने अपनाया और राष्ट्रनिर्माण के कार्य में भी हिस्सेदारी की."

अनेक सवाल

मगर मुसलमानों के लिए हालात कोई बहुत सीधे और सपाट नहीं थे. इस्लामी विद्वान मौलाना वहीदुद्दीन ख़ान कहते हैं कि मुसलमानों को भारत में जो कुछ मिला है वह हिंदू समुदाय की मेहरबानी है और उन्हें इस देश में जो कुछ भी मिला है, उसका उन्हें अधिकार ही नहीं था इसलिए उन्हें ज़्यादा उम्मीद नहीं करनी चाहिए.

इस्लामी विद्वान मौलाना वहीदुद्दीन ख़ान कहते हैं, "स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान मुसलमानों ने जो बलिदान दिए उनके बदले उन्हें पाकिस्तान के रूप में एक अलग देश मिल गया और इस तरह उन्होंने अपनी क़ुर्बानियों को भुना लिया. विभाजन की दलील ही ये थी कि भारत हिंदू का और पाकिस्तान मुसलमान का, तो फिर अब भारत में उनका अधिकार कैसा. इसके उल्टे हिंदु समुदाय ने बड़ी बात की है कि आज़ाद भारत में भी मुसलमानों को बराबरी का दर्जा दे दिया."

इसी तरह की दलीलों में से मुसलमानों को अक्सर ऐसे सवालों का भी सामना करना पड़ा है कि वे पहले हिंदुस्तानी हैं या मुसलमान.

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मुखपत्र पांचजन्य के संपादक तरूण विजय का तो यह कहना है कि हिंदू बहुल देश भारत में हिंदुओं को ही उनके अधिकारों से वंचित रखा गया है, "1947 में मातृभूमि के विभाजन के बाद जो बचा-खुचा हिंदुस्तान हिंदुओं को मिला उस बचे-खुचे हिंदुस्तान में भी वे आज़ादी के साथ अपनी सभ्यता और संस्कृति की बात नहीं कर सकते. इस देश में ग़ैर-हिंदू होना फ़ायदे की और हिंदू होना घाटे की बात हो गई है."

तरूण विजय कहते हैं, "मुसलमानों को चाहिए था कि वे हिंदू समाज के साथ वैसे ही घुलमिलकर रहते जैसा कि दूध में शक्कर होती है लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया और अपनी अलग पहचान के लिए ज़्यादा चिंतित नज़र आते हैं."

तरूण विजय सवाल उठाते हैं कि मुसलमान हिंदुस्तान में तो इसीलिए रहे हैं कि वे हिंदुस्तान को मानते हैं, तो फिर हिंदुस्तानियत की बात क्यों नहीं करते.

मुद्दे

तो फिर क्या मुसलमान हिंदुस्तानी बनकर नहीं रहे हैं. कहा जाता है कि वे पाकिस्तान से हमदर्दी रखते हैं, मुख्य धारा में शामिल नहीं होना चाहते, आधुनिक शिक्षा से बचते हैं, जेहादी और दंगाई होते हैं, रूढ़िवादी हैं, औरत को पाँव की जूती समझते हैं, एक झटके में तलाक दे देते हैं, चार-चार शादियाँ करते हैं, वग़ैरा वग़ैरा...

तो मुसलमानों के मुद्दे आख़िर हैं क्या? जायज़ा लेने लिए हमने कई स्थानों का दौरा किया और पाया कि एक ही मुद्दे पर कितनी अलग-अलग राय हो सकती है. हमने विभिन्न लोगों के सामने सबसे पहले यही सवाल रखा कि क्या मुसलमानों को साठ साल के दौरान उनका हक़ मिला है?

दिल्ली की जामा मस्जिद इलाक़े में रहने वाले मोहम्मद जफ़र नामक एक मुसलमान का कहना था, "अभी तो कोई हक़ नहीं मिला है. हम दिल्ली में पैदा हुए हैं और देख रहे हैं कि जब राजधानी में हमें हक़ नहीं मिला है तो देश के बाक़ी हिस्सों में मुसलमानों को क्या हक़ मिला होगा."

हालाँकि मोहम्मद ज़फ़र यह स्वीकार करते हैं कि एक समय ऐसा था जब मुसलमानों के ज़्यादा बच्चे होते थे और शिक्षा की तरफ़ ध्यान नहीं दिया जाता था लेकिन अब ऐसा नहीं है और उनके अनुसार अब मुसलमान शिक्षा के प्रति बहुत ध्यान दे रहे हैं और अब बच्चे भी कम हो रहे हैं मगर अच्छा जीवन जीने के लिए समुचित सुविधाएँ नहीं मिल रही हैं.

पाकिस्तान की तरफ़ झुकाव रखने से संबंधित सवाल के जवाब में मोहम्मद जफ़र का कहना था, "यह पाकिस्तान के लिए झुकाव नहीं है. हमारा तो मज़हब भी यही कहता है कि जिस देश में रहते हैं उसी के बारे में सोचें और ज़रूरत पड़े तो क़ुर्बानी भी दें. असल बात ये है कि वहाँ रहने वाले रिश्तेदारों के लिए हमदर्दी रहती है जिसे पाकिस्तान के लिए झुकाव समझ लिया जाता है."

नई दिल्ली के हरे-भरे इलाक़े में स्थित जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय को ज्वलंत मुद्दों पर गर्मागरम बहस का स्थान माना जाता है. एक शाम हम भी वहाँ पहुँचे और शाम की चाय की चुस्कियाँ ले रहे छात्रों के सामने सवाल उछाल दिया कि क्या मुसलमानों को साठ साल के दौरान उनका हक़ मिला है, बस गर्मागरम बहस छिड़ गई.

एक छात्र का कहना था, "सच्चर कमेटी की रिपोर्ट ने यह बिल्कुल स्पष्ट कर दिया है कि आज़ादी के बाद से ही मुसलमानों से बहुत से वादे किए गए लेकिन असल में किया कुछ नहीं गया है और इसके लिए सभी सरकारें ज़िम्मेदार रही है. सबसे पहले तो यह समझना होगा कि मुसलमानों का पिछड़ापन एक समस्या है और जब इस समस्या को मान लिया जाए तो इसके हल के लिए कोशिश करनी होगी."

हमने यह सवाल भी उछाला कि इसमें कितनी सच्चाई है कि मुसलमान अपने बच्चों को शिक्षा नहीं दिलाना चाहते. इस पर जेएनयू की एक छात्रा का कहना था कि बहुत से मुसलमानों के सामने अपनी हर रोज़ की रोज़ी-रोटी चलाने की समस्या होती है, ऐसे में वे अपने बच्चों को स्कूल भेजने के बजाय उन्हें ऐसे कामों में लगाना चाहते हैं जिससे थोड़ी बहुत आमदनी हो सके.

इस छात्रा का कहना था कि सरकार की यह ज़िम्मेदारी बनती है कि वह इस तरह के ग़रीब मुसलमानों को इतनी वित्तीय सहायता तो दे कि वे अपना पेट भर सकें और अपने बच्चों को स्कूल भेज सकें, संविधान में मुसलमानों को हालाँकि बराबरी का दर्जा हासिल है मगर असलियत में बराबरी मिली नहीं है, कोई बात कहीं पर लिख देना और उसे ज़मीनी स्तर पर लागू करना बिल्कुल अलग-अलग बातें हैं.

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