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गुरुवार, 27 सितंबर, 2007 को 12:24 GMT तक के समाचार
 
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व्यवस्था नौजवानों को उनकी विरासत नहीं देना चाहती
 

 
 
भगत सिंह
भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को 23 मार्च 1931 को लाहौर में फाँसी दी गई
व्यवस्था कभी नहीं चाहती कि नौजवानों को उनकी विरासत दी जाए और यही कारण है कि भगत सिंह का रचनात्मक पहलू, उनके लेख, पत्र आदि इतने दशकों बाद लोगों के सामने आए.

आज भारत का युवा वर्ग असमंजस में है और मेरा मानना है कि वह चाह रहा है कि भगत सिंह के ज़रिए नई दिशा की खोज की जाए.

भगत सिंह के किरदार के रचनात्मक पहलू को नौजवानों तक पहुँचाने की ख़ास कोशिश नहीं हुई है.

'विचार पहुँचाने की चिंता नहीं'

भगत सिंह ने तो वर्ष 1925 में ही आहवान किया था कि लोगों में एकता हो - वे धर्म और जाति से ऊपर उठें, समाज में इंसानी दर्जे के लिए संघर्ष कर रहे दलितों की स्थिति बेहतर हो और नौजवानों को साथ लेकर चला जाए.

अब भी जो सरकारी आयोजन भगत सिंह की जन्म शताब्दी मनाने के लिए किए जा रहे हैं, उनमें कुछ करोड़ रुपया ख़र्च होगा लेकिन नौजवानों को उनकी सोच से अवगत कराने, भगत सिंह के पत्र, लेख और विचार उन तक पहुँचाने की किसी को चिंता नहीं है. ऐसा इसलिए कि उनके रचनात्मक मिशन की चिंता किसी को नहीं है.

पंजाब में अमृतसर में हो रहे राष्ट्रीय स्तर के आयोजनों के बारे में मैनें पंजाब के मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल को एक बैठक के दौरान अपना नोट दिया जिसमें मेरा असंतोष और मेरे सुझाव थे.

 ''आदमी में दुष्मन न ढूँढ़े. दुष्मन तो नीतियाँ होती हैं -- फिर उन्हें चाहे कोई भी चला रहा हो
 
भगत सिंह

भगत सिंह का ख़ुद का भी मानना था कि कुछ ऐसा हो जिससे नौजवानों को उत्साह मिले और समाज की संरचना में वे हिस्सेदार बनें.

अनेक तरह के लोग भगत सिंह की जन्म शताब्दी पर आयोजन कर रहे हैं. कुछ ऐसे भी जिनका उनके विचारों से सरोकार ही नहीं रहा. वे केवल शंका पैदा करना चाहते हैं, क्योंकि शंका ही व्यक्ति तो असफल बनाती है.

भगत सिंह को ये पंक्तियाँ बहुत पसंद थीं -

क़माले बुज़दिली है अपनी ही नज़रों में पस्त होना
गर थोड़ी सी जुर्रत हो तो क्या कुछ हो नहीं सकता
उभरने ही नहीं देतीं ये बेमाइगियाँ दिल की
नहीं तो कौन सा क़तरा है जो दरिया हो नहीं सकता

ऐसे संगठनों और लोगों की कोशिश होती है कि लोगों की बेमाइगियाँ इतनी बढ़ाई जाएँ कि उनका हौसला पस्त हो जाए.

जो इतिहास हमें पढ़ाया जाता है वो हमें निराशा की तरफ़ ही धकेलता है. और निराशा इतनी है कि लोग भूख से भी मर रहे हैं और आत्महत्या करके भी मर रहे हैं.

'रचनात्मक भगत सिंह की तस्वीर'

 मैं उस स्वराज के लिए लड़ रहा हूँ जिसमें कम से कम 95 फ़ीसद लोगों की भागीदारी हो और वे ख़ुद ही स्वराज लाएँ
 
भगत सिंह

भगत सिंह ने कहा था कि जब वे क्रांतिकारी लहर में सक्रिय थे तो -
उन्होंने कई पुस्तकें पढ़ीं ताकि वे 'अपनी दलील रख सकें और प्रतिद्वंद्वियों की दलील का जवाब दे सकें.'

उनका कहना था - ''आदमी में दुष्मन न ढूँढ़े. दुष्मन तो नीतियाँ होती हैं -- फिर उन्हें चाहे कोई भी चला रहा हो."

उनके लेख और पत्र इतने दशकों के बाद सामने आए. अब जैसे 1857 की असल विरासत हम आज तक ढूँढ रहे हैं. वो 1857 की घटनाओं से संबंधित 40-50 हज़ार दस्तावेज़ जो हमारे आर्काईव (पुरालेख) में पड़े रहे क्योंकि वे ऊर्दू-फ़ारसी में थे. किसी पश्चिमी स्कॉलर ने ये नहीं पढ़े तो हमने भी नहीं पढ़े. आज वो पढ़े जा रहे हैं.

इसी तरह से भगत सिंह के रचनात्मक पहलू की भी अनदेखी हुई. शायद हम इसे नौजवानों के सामने लाना ही नहीं चाहते थे.

जब भगत सिंह, सुखदेव और राजगूरु का 50वां शहीदी दिवस था तब हमारे घर में मेरी माता जी, भगत सिंह के अन्य साथी, जतिन दास के छोटे भाई मैजूद थे.

तब ये फ़ैसला हुआ कि क्यों न सरकार को सुझाव दिया जाए कि डेढ़-दो लाख रुपए भगत सिंह के बुत पर ख़र्च करने की जगह यही ख़र्च नौजवानों तक उनके विचार पहुँचाने के लिए किया जाए.

सरकार का यही कहना था - "इस पर विचार करे रहे हैं."

कई साल गुज़र गए और फिर उसके बाद मुझे ज़िम्मेदारी दी गई. जब वे विचार सामने आए तो नई तस्वीर उभरी. हमने पाया कि जहाँ पहले विनाशकारी भगत सिंह का प्रचार किया जा रहा था, उसकी जगह रचनात्मक भगत सिंह की तस्वीर उभरी.

 भगत सिंह के किरदार को तोड़-मरोड़ कर पेश किया गया, केवल उनके क्रांतिकारी रूप को दिखाया पर उनके सोच और विचार फ़िल्म से बाहर ही रखे
 
प्रोफ़ेसर जगमोहन सिंह

भगत सिंह ने कहा था - "मैं उस स्वराज के लिए लड़ रहा हूँ जिसमें कम से कम 95 फ़ीसद लोगों की भागीदारी हो और वे ख़ुद ही स्वराज लाएँ. आज कल एक बड़ी जनसंख्या भरपेट रोटी खाने को तरस रही है."

इतनी बड़ी जनसंख्या को भारत पर गर्व करने के लिए प्रेरित करना बड़ी चुनौती है.

फ़िल्में तो एक शरारत थीं

हाल-फ़िलहाल में भगत सिंह पर जो हिंदी फ़िल्में बनीं, वो सब एक शरारत थी. भगत सिंह के किरदार को तोड़-मरोड़ कर पेश किया गया, केवल उनके क्रांतिकारी रूप को दिखाया पर उनके सोच और विचार फ़िल्म से बाहर ही रखे.

मेरा मानना है कि किसी की ईमानदारी भगत सिंह की तरफ़ नहीं थी. लेकिन जितना पैसा फ़िल्म निर्माता बाज़ार से निकालना चाहते थे वे नहीं निकाल पाए.

लेकिन ये दो-धारी तलवार होती है. इन्होंने नौजवानों में भगत सिंह का परिचय करवा दिया. अब वे भगत सिंह को क्या पाते हैं, ये देखना है... इसलिए युवाओं के मन में असमंजस है. वो उस भगत सिंह को खोजना चाहते हैं जो उन्हें रास्ता दिखा सके.

(यह लेख भगत सिंह की जन्म शताब्दी पर उनके भांजे प्रोफ़ेसर जगमोहन सिंह से बीबीसी संवाददाता अतुल संगर की बातचीत पर आधारित है.)

 
 
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