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मंगलवार, 21 अगस्त, 2007 को 12:32 GMT तक के समाचार

मिर्ज़ा एबी बेग
दिल्ली से

'ऐनी आपा' ने उर्दू-हिंदी रिश्ते को मज़बूती दी

‘इक चराग़ और बुझा और बढ़ी तारीकी’.

विख्यात लेखिका क़ुर्रतुल ऐन हैदर यानी ऐनी आपा के निधन से न केवल उर्दू जगत में शोक का माहौल है, बल्कि भारतीय साहित्य भी उससे अलग नहीं है.

ऐनी आपा आज़ादी के बाद भारतीय फ़िक्शन का एक स्तंभ मानी जाती हैं.

ऐनी आपा यानी क़ुर्रतुल ऐन हैदर के साथ परवेज़ आलम की बातचीत

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्रोफ़ेसर और उर्दू के जाने-माने आलोचक सदीक़ुर्रहमान क़िदवई ने क़ुर्रतुलऐन हैदर के निधन पर गहरा शोक प्रकट किया है.

वे कहते हैं, "वे युगांतरकारी उपन्यासकार थीं. अब उनके रुतबे का कोई फ़िक्शन लिखने वाला न ही भारत में है और न ही पाकिस्तान में."

क़िदवई कहते हैं, "उनके उपन्यासों में एक अनूठापन था जो कहीं और नज़र नहीं आता, उनका अध्ययन बहुत व्यापक था और फ़िक्शन की कला पर उनकी मज़बूत पकड़ थी. उन्होंने अपने युग की समस्याओं को उठाया और उसका चित्रण किया."

वे आगे कहते हैं, "हक़ीक़त को फ़िक्शन और फ़िक्शन को हक़ीक़त बनाने का फ़न उनको आता था. उनका उपन्यास ‘आग का दरिया’ युगांतर था और इसने साहित्यिक जगत में हलचल पैदा कर दी थी."

बड़ी क्षति

हिंदी साहित्य के जाने माने आलोचक और जामिया मिलिया इस्लामिया विश्वविद्यालय में हिंदी के प्रोफ़ेसर असग़र वजाहत ने ऐनी आपा के निधन को भारतीय साहित्य के लिए बड़ी क्षति बताया.

उन्होंने कहा, "यह सच है कि वह मूल रूप से उर्दू भाषा की ही लेखिका थीं, लेकिन हिंदी पाठक भी उन से उतना ही जुड़ाव महसूस करता है जितना कि उर्दूभाषी.”

वजाहत कहते हैं, "भारतीय फ़िक्शन के संदर्भ में मेरा यह मानना है कि वह न केवल उर्दू के उपन्यास को ऊपर ले गईं बल्कि उन्होंने अपने लेखन से पूरे फ़िक्शन जगत को प्रभावित किया."

असगर वजाहत का मानना है कि ऐनी आपा ने हिंदी-उर्दू के रिश्तों को मज़बूत किया है.

वो कहते हैं, "उनका पूरा जीवन लेखन को समर्पित था. उनके लेखन की गंभीरता, कर्मठता हिंदी वालों को उतना ही आकर्षिक करती हैं, जितना किसी और भाषा वालों को. उनके उपन्यास हमारे लिए प्रेरणास्रोत हैं."

अध्याय समाप्त

उर्दू के जाने माने आलोचक और ऐनी आपा के काफ़ी नज़दीकी समझे जाने वाले लेखक प्रो. शमीम हनफ़ी ने कहा कि उनकी मृत्यु से उर्दू फ़िक्शन का एक अध्याय बंद हो गया है.

प्रोफेसर हनफ़ी कहते हैं, "वह भारतीय फ़िक्शन में आज़ादी के बाद सबसे बड़ी शख़्सियत थीं. अगर विश्व साहित्य के लिए भारत से बड़े साहित्यकारों का नाम लिया जाए तो वह ऐनी आपा का नाम है."

वो कहते हैं, "उनका अध्ययन बहुत गहरा था. वह विश्व साहित्य से भलीभांति परिचित थीं, ख़ास तौर से पश्चिम के साहित्य पर उनकी गहरी नज़र थी."

प्रोफ़ेसर हनफ़ी ने कहा कि ऐनी आपा ने लेखन के उच्च स्तर को क़ायम रखा. उनके इंतक़ाल के बाद लेखन के इस स्तर को क़ायम रखना ही मुश्किल है.

साहित्य अकादमी के अध्यक्ष और लेखक प्रोफ़ेसर गोपीचंद नारंग ने कहा, "ऐनी आपा सारी ज़िंदगी अपनी रचनाओं में ऐतिहासिक तथ्य, इंसानी फ़ितरत, सामाजिक मेल-जोल और इंसानी रिश्तों की क़द्रो-क़ीमत पर ज़ोर देती रहीं."

योगदान

प्रोफ़ेसर नारंग कहते हैं, "उन्होंने सदियों के ऐतिहासिक क्रम और तहज़ीब के व्यवहारिक रूप को अपनी कहानियों और उपन्यासों में उभारा. यह उनकी व्यक्तिगत विशिष्टता है."

उन्होंने कहा कि ‘आग का दरिया’, ‘मेरे भी सनमख़ाने’, ‘सीता हरन’ और ‘आख़िरे-शब के हमसफ़र’ आदि दर्जनों ऐसे उपन्यास हैं जो उन्हें हमेशा ज़िंदा रखेंगे.

गोपीचंद नारंग ने क़ुर्रतुलऐन हैदर के बारे में लिखते हुए एक जगह लिखा था कि उर्दू फ़िक्शन के समकालीन दौर को एक तरह से क़ुर्रतुल ऐन हैदर का युग कहा जा सकता है.

नारंग ने कहा, "उन्होंने न सिर्फ़ उपन्यास के कैनवस को ज़मानों और युगों पर फैलाकर इतिहास की नई रचनात्मक दिशाओं को रोशन किया है, बल्कि फ़िक्शन के साहित्य को एक ऐसी सोच, ऐसा ज़ेहन और बौद्धिक ज़ायक़ा दिया है, जिससे उर्दू भाषा की आबरू में वृद्धि हुई है.