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उपन्यासकार क़ुर्रतुल ऐन हैदर का निधन | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
विख्यात उपन्यासकार और लेखिका क़ुर्तुल ऐन हैदर का मंगलवार की सुबह तीन बजे दिल्ली के पास नोएडा के कैलाश अस्पताल में निधन हो गया. वे 80 वर्ष की थीं. उर्दू के जाने-माने आलोचक और कुर्रतुल ऐन हैदर को नज़दीक से समझने वाले लेखक प्रोफ़ेसर शमीम हनफ़ी ने बताया कि रात में 12 के आसपास उनकी तबीयत अचानक बिगड़ गई और तीन बजे के क़रीब अस्पताल के आईसीयू में उनका निधन हो गया. वे पिछले कई दिनों से उस अस्पताल के आईसीयू में भर्ती थीं, इससे पहले भी वह बीमार पड़ीं लेकिन यह उनकी आख़िरी बीमारी थी. शोक ऐनी आपा के नाम से जानी जाने वाली कुर्रतुल ऐन हैदर के निधन से न केवल उर्दू जगत में शोक का माहौल है बल्कि भारतीय साहित्य भी उससे अलग नहीं है क्योंकि वह आज़ादी के बाद भारतीय फ़िक्शन का एक स्तंभ मानी जाती थीं.
उनका जन्म 1927 में उत्तर प्रदेश के शहर अलीगढ़ में उर्दू के जाने-माने लेखक सज्जाद हैदर यलदरम के यहाँ हुआ था. उनकी मां बिन्ते-बाक़र भी उर्दू की लेखक रही हैं. उन्होंने बहुत कम आयु में लिखना शुरू किया. 1945 में जब वह 17-18 वर्ष की थीं तो उनकी कहानी का संकलन ‘शीशे का घर’ सामने आया. उनका पहला उपन्यास ‘मेरे भी सनमख़ाने’ है. विभाजन में वह अपने परिवार के साथ पाकिस्तान चली गईं लेकिन जल्द ही उन्होंने भारत वापस आने का फ़ैसला कर लिया और तब से वह यहीं रहीं. उन्होंने अपना कैरियर एक पत्रकार की हैसियत से शुरू किया लेकिन इसी दौरान वे लिखती भी रहीं और उनकी कहानियां, उपन्यास, अनुवाद, रिपोर्ताज़ वग़ैरह सामने आते रहे. सम्मान 1967 में उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया और उनके उपन्यास ‘आख़िरी शब के हमसफ़र’ के लिए उन्हें ज्ञानपीठ पुरस्कार दिया गया. उनके साहित्यिक योगदान के लिए उन्हें पदमश्री से भी सम्मानित किया गया. क़ुर्रतुलऐन हैदर का प्रसिद्ध उपन्यास ‘आग का दरिया’ आज़ादी के बाद लिखा जाने वाला सबसे बड़ा उपन्यास है. ‘आग का दरिया’ समेत उनके बहुत से उपन्यास का अनुवाद अंग्रेज़ी और हिंदी भाषा में हो चुका है. कृतियां उनके उपन्यासों में ‘आग का दरिया’, ‘सफ़ीन-ए-ग़मे दिल’, ‘आख़िरे-शब के हमसफ़र’, ‘गर्दिशे-रंगे-चमन’, ‘मेरे भी सनम-ख़ाने’ और ‘चांदनी बेगम’ शामिल हैं. उनकी कहानियों के संकलन में ‘सितारों से आगे’, ‘शीशे के घर’, ‘पतझड़ की आवाज़’ और ‘रोशनी की रफ़्तार’ शामिल हैं.
उनके जीवनी-उपन्यासों में ‘कारे जहां दराज़ है’ (दो भाग), ‘चार नावेलेट’, ‘सीता हरन’, ‘दिलरुबा’, ‘चाय के बाग़’ और ‘अगले जन्म मोहे बिटिया न कीजो’ शामिल हैं. रिपोर्ताज़ में ‘छुटे असी तो बदला हुआ ज़माना था’, ‘कोहे-दमावंद’, ‘गुलगश्ते जहां’, ‘ख़िज़्र सोचता है’, ‘सितंबर का चाँद’, ‘दकन सा नहीं ठार संसार में’, ‘क़ैदख़ाने में तलातुम है कि हिंद आती है’ वग़ैरह शामिल हैं. अनुवाद के मैदान में भी उन्होंने काफ़ी काम किया है. हेनरी जेम्स के उपन्यास ‘पोर्ट्रेट ऑफ़ ए लेडी’ का अनुवाद ‘हमीं चराग़, हमी परवाने’ के नाम से किया. उन्होंने अंग्रेज़ी के प्रसिद्ध लेखक के नाटक ‘मर्डर इन द कैथेड्रल’ का अनुवाद ‘कलीसा में क़त्ल’ के नाम से किया. इसके अलावा ‘आदमी का मुक़द्दर’, ‘आल्पस के गीत’, और ‘तलाश’ वग़ैरह उनके अनुवाद में शामिल हैं. अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी, जामिया मिलिया इस्लामिया, ज्वाहरलाल नेहरू और दिल्ली विश्वविद्यालयों के उर्दू विभाग में शोक का माहौल है. ऐनी आपा ने शादी नहीं की थी. | इससे जुड़ी ख़बरें मनोहर श्याम जोशी का निधन30 मार्च, 2006 | भारत और पड़ोस 'यह हिंदी जगत के लिए एक हादसा है'30 मार्च, 2006 | भारत और पड़ोस इंदिरा गांधी और लोकतंत्र30 अक्तूबर, 2004 | भारत और पड़ोस सार्क देशों के लेखकों का सम्मेलन07 अक्तूबर, 2004 | भारत और पड़ोस साहित्य अकादमी पुरस्कारों की घोषणा24 दिसंबर, 2003 | भारत और पड़ोस हिंदीभाषी क्षेत्रों में वामपंथ की स्थिति30 मार्च, 2005 | भारत और पड़ोस | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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