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1857: मिटते हुए कुछ निशान | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ भारतीयों की 1857 की लड़ाई से जुड़े अमूल्य दस्तावेज़ रोज़ाना ख़ाक में बदल रहे हैं. उस दौर की ऐतिहासिक इमारतें ईंट-ईंट करके दरक रही हैं और भारतीयों की आने वाली पीढ़ियों को शायद याद भी नहीं रहेगा कि कभी उनके पुरखे यहाँ लड़े थे. 1857 के निशान खोजने के लिए बैरकपुर से दिल्ली तक की यात्रा करते समय मैने तेज़ी से धूमिल होते इस इतिहास के कुछ पुराने पन्नों को देखा है. जगदीशपुर दरकती दीवारों और ऊँची मेहराबों वाले उस पुराने महल के एक भीतरी हिस्से से होकर गुज़रता हूँ. ये इतिहास के एक टुकड़े से होकर गुज़रने जैसा है क्योंकि ये महल है पटना के पास जगदीशपुर के वीर कुँअर सिंह का जिन्होंने 1857 में अँग्रेज़ों के ख़िलाफ़ लंबा युद्ध चलाया था और अंत में मारे गए. कुँअर सिंह की बहादुरी की कहानियाँ भोजपुर इलाक़े के लोकगीतों में अब भी गाई जाती हैं. अँग्रेज़ों ने उनके महल के सामने तोपें खड़ी करके उसे गोलों से उड़ा दिया. लेकिन महल का पिछला हिस्सा अभी बचा हुआ है जिसके अँधेरे, धूल भरे ऊँचे-ऊँचे कमरों में कुँवर सिंह के वंशज या परिवार से जुड़े लोग रहते हैं.
दीवारों पर शिकार में मारे गए बारहसिंगों और अरना भैंसों के सिर टँगे हुए हैं, जो बताते हैं कि अच्छे दिनों में यहाँ रहने वाले लोग शिकार के शौकीन रहे होंगे. लेकिन अब मकड़ियों ने उन पर जाले बुन लिए हैं और बरसों से उन पुराने जालों पर धूल बैठी हुई है. लोहे के ज़ंग खाए दो एक संदूक़ एक कोने में यूँ ही लावारिस पड़े हैं. बचपन का कौतूहल बरबस उन्हें खोलने पर मजबूर कर देता है. धूल का एक बग़ूला बाहर निकल आता है, कुछ चिलचट्टे और मकड़ियाँ घबराकर इधर-उधर छिपने के लिए भागती हैं. बक्से में ऊपर तक पुराने काग़ज़ात भरे हुए हैं जिन्हें शायद कई दशकों से किसी ने देखा नहीं होगा. सबसे ऊपर एक चिट्ठी नज़र आती है, जिसे उठाकर पढ़ता हूँ—भोजपुरी में किन्हीं रानी साहिबा के हवाले से किन्हीं ठाकुर साहब को कुछ रक़म देने की बात कही गई है. ये चिट्ठी 1939 में कभी लिखी गई थी. "छोड़िए ये सब पुराना है, काफ़ी काग़ज़ तो दीमक खा गई है. कुछ हमने जला दिए. सब सौ दो सौ साल पुराने काग़ज़ थे. उनका क्या उपयोग था," कुँअर सिंह के प्रपौत्र अजित सिंह कहते हैं. अस्सी पार कर चुके उनके भाई दिग्विजय सिंह से मिलने के लिए मुझे एक बड़े बैठकख़ाने में ले जाया जाता है. अंदर बेशक़ीमती लकड़ी का नक़्काशीदार फ़र्नीचर रखा हुआ है, बल्कि यूँ ही पड़ा हुआ है. दीवारों पर ब्रिटिश राज के ज़माने की फ़्रेम में जड़ी तस्वीरें हैं लेकिन सब सीलन से गल चुकी हैं. इन फ़्रेम जड़ी तस्वीरों में ब्रिटेन के बादशाह के राज के 25 साल पूरे होने पर 22 मई 1933 को लंदन में हुए समारोह का दावतनामा भी है.
एक दीवार पर “सौ डेढ़ सौ साल पुरानी” चीन की पेंटिंग्स लगी हुई हैं. दिग्विजय सिंह कहते हैं, "अब ये सब हमारे लिए बोझ बन चुका है. कैसे संभालें इसे, कहाँ तक संभालें. कई पुराने दस्तावेज़ दीमकें खा गईं हैं. कुछ यूँ ही इधर उधर हो गए." लखनऊ लखनऊ में पुराने नवाबी ठाठ के संकेत दे रहे अपने बैठकख़ाने में नवाब जाफ़र मीर अब्दुल्ला ये क़िस्सा बयान करते हैं: “बादशाह बहादुर शाह ज़फ़र ने ख़ुद हमारे बुज़ुर्गों को ख़ान बहादुर का ख़िताब अता फ़रमाया था.” "गो हमारे बुज़ुर्ग बादशाह के बहुत क़रीब थे, मगर उन्हें ख़ान बहादुर का ख़िताब नहीं दिया गया था. किसी के तंज़ करने पर उन्होंने बहादुर शाह ज़फ़र को लिखा – मन ख़िताब-ए-ख़ान बहादुर ख़्वाहम. यानी मैं ख़ान बहादुर का ख़िताब चाहता हूँ." नवाब अब्दुल्ला क़िस्सा आगे बढ़ाते हैं – "ख़िताब मिल गया और अब यूँ ही रखा था हमारे पास. कुछ साल पहले लंदन के ब्रिटिश म्यूज़ियम से एक साहब तशरीफ़ लाए और उन्होंने वो ख़िताब असल हमसे माँगा." "हमारे अब्बू ने हमसे पूछा कि क्यों मियाँ क्या कहते हो? यहाँ पड़ा पड़ा बरबाद हो रहा है. दे दें? हमने कहा- दे दीजिए." इस तरह बहादुर शाह ज़फर की ओर से मिला ख़िताब लंदन पहुँच गया. नवाब साहब के पास और भी कई बेशक़ीमती चीज़ें और पुराने दस्तावेज़ थे. लेकिन सब बरबाद हो गए क्योंकि “एक बार गोमती की बाढ़ का पानी अंदर घुस आया था. सब काग़ज़ात उसी में भीग गए.”
अब उनके बैठक ख़ाने में लखनऊ के नवाबी दिनों की कहानी कहने के लिए कुछ पुराने सरोते, कुछ नक़्काशीदार पानदान, कुछ हुक़्क़े और चंद तस्वीरें बची हैं. कानपुर कानपुर में ऊची छतों वाले ब्रिटिश काल के अपने घर के बरामदे में बैठे वयोवृद्ध वेंकटेश राव सूबेदार हरे मोमजामे में लपेटे गए कुछ पुराने काग़ज़ों को आहिस्ता से निकालते हैं और मेज़ पर फैला देते हैं. ऊँचे कमरों, भारी गोल स्तंभों और बड़े-बड़े बरामदों वाली इस बड़ी सी इमारत में किसी ज़माने में ईस्ट इंडिया कंपनी का बिज़नेस दफ़्तर हुआ करता था. बाद में ये इमारत सूबेदार परिवार को मिल गई. वेंकटेश सूबेदार के सामने मेज़ पर फैले ये दस्तावेज़ 1857 के संग्राम में नानाराव पेशवा और तात्या टोपे की हार के बाद जारी किए गए हैं. सूबेदार परिवार हालाँकि पूना से बाजीराव पेशवा के निर्वासन पर उनके साथ ही बिठूर आया था लेकिन इतिहास में दर्ज है कि उनके परिवार ने 1857 में अँग्रेज़ों का साथ दिया. वेंकटेश सूबेदार कहते हैं, "बस अब यही कुछ बचा है. बरसों पुराने कई बोरे काग़ज़ात हमारे पास थे जो हमने ख़ुद अपने हाथों से जला दिए. कहाँ रखते उन्हें? अब हमें इतना मालूम भी नहीं था कि उनका कोई महत्व भी हो सकता है." बिठूर बिठूर के जिस घर में तात्याँ टोपे रहते थे, उसी जगह पर अब उनके परिवार से जुड़े लोग रहते हैं.
जीत के बाद अँग्रेज़ों ने बिठूर में नानाराव पेशवा के महल को तो मटियामेट कर ही दिया था, जब ताँत्या टोपे के रिश्तेदारों को 1860 में ग्वालियर जेल से रिहा किया गया तो उन्होंने बिठूर लौटकर पाया कि उनका घर भी जला दिया गया है. इसी परिवार के विनायक टोपे आज बिठूर में परचून की दुकान चलाते हैं. उनकी पत्नी सरस्वती टोपे एक पुरानी तस्वीर दिखाती हैं जिसमें कुछ खंजर, एक गुप्ती, एक छोटी तोप और ऐसे ही कुछ हथियार नज़र आते हैं. सरस्वती टोपे कहती हैं, "कुछ पुरानी किताबें और छोटी मोटी चीज़ें थीं हमारे पास, लेकिन लोग माँग कर ले जाते हैं फिर वापिस नहीं करते." |
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