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बढ़ती गर्मी से गंगोत्री ग्लेशियर ख़तरे में
 

 
 
हिमालय से निकलती गंगा
पहाड़ों के बीच से गंगा पतली धार के रुप में निकलती है
दुनिया भर के बढ़ते हुए तापमान का भारतीय ग्लेशियरों पर व्यापक प्रभाव पड़ने वाला है और गंगोत्री जैसे बड़े ग्लेशियर अगले बीस तीस वर्षों में समाप्त हो सकते हैं.

ये आशंकाएं एकबारगी तो फ़िल्मी कहानी जैसी लगती है लेकिन गंगोत्री ग्लेशियर के बारे में स्थानीय लोगों से बात करने पर लगता है कि ऐसा होने में देर हो सकती है लेकिन यह असंभव नहीं है.

गंगोत्री से गोमुख यानी ग्लेशियर के पास तक पर्यटकों को ले जाने वाले गाइड गणेश कहते हैं कि उन्होंने पिछले पांच वर्षों में ही ग्लेशियर को एक किलोमीटर खिसकते देखा है.

उनकी राय बाकी लोगों से अलग बिल्कुल नहीं है. कुली का काम करने वाले जोशी भी कहते हैं कि ग्लेशियर पिघल रहा है. वो कहते हैं ' आबादी बढ़ रही है. लोग बढ़ रहे हैं. गर्मी बढ़ रही है. ग्लेशियर तो पिघलेगा ही. पहले से तो बहुत पीछे चला गया है.'

मिथकों के अनुसार पहले गोमुख वहां हुआ करता था जहां अब गंगोत्री शहर है यानी मिथकों की मानें तो पिछले सौ डेढ सौ साल में ग्लेशियर 18 से 19 किलोमीटर पीछे चला गया है.

पहाड़ों में विस्फोट
गंगोत्री से केवल पचास किलोमीटर दूर कई विस्फ़ोट हो रहे हैं

स्थानीय निवासी मंगल सिंह रावत कहते हैं कि उत्तरकाशी से लेकर गंगोत्री के बीच बड़ी परियोजनाओं ने भी ग्लेशियर को नुकसान पहुंचाया है.

वो कहते हैं ' भैरों घाटी में मनेरी बांध बना है. इसके अलावा लोहारीनाग पाला पनबिजली परियोजना चल रही है जिसके तहत पहाड़ों को काटा जा रहा है. प्रकृति के साथ खिलवाड़ तो सही नहीं है. '

स्थानीय लोगों की बात का समर्थन पिछले कई वर्षों से गंगोत्री के पहाड़ों में ही रहने वाले ब्रह्मचारी अनिल स्वरुप भी करते हैं. अनिल पिछले कुछ वर्षों में गंगोत्री बचाओ अभियान मे लगे हुए हैं.

गंगा प्रदूषण या गंगा बचाओ

वो कहते हैं ' लोग गंगा के प्रदूषण की बात करते हैं लेकिन मैं कहता हूं कि गंगा को बचाना अधिक महत्वपूर्ण है. टिहरी बांध के बाद गंगा नाले जैसी बहती है. कहां है गंगा. गंगोत्री पीछे जा चुका है. इतनी गंदगी है.ग्लेशियर को बचाने का कोई उपाय नहीं किया जा रहा है.'

 जब भूकंप होता है या ऐसी कोई बड़ा कंपन होता है तो ग्लेशियर पर प्रभाव पड़ता है. जलवायु परिवर्तन का प्रभाव तो है ही
 
डॉ डोभाल, ग्लेशियर विशेषज्ञ

स्वरुप भी परियोजनाओं से नाराज़ है. वो कहते हैं ' मुझे लगता है कि इन परियोजनाओं के लिए जिस तरह से पहाड़ो में विस्फोट किए जा रहे हैं वो ग्लेशियरों को नुकसान पहुंचा रहा है. '

गंगोत्री से उत्तरकाशी के रास्ते में जगह जगह पर हमने भी यह देखा कि पहाड़ों में विस्फोट किए जा रहे हैं जिससे पूरी हिमालय शृंखला हिलती होगी इससे कोई इंकार नहीं कर सकता.

कई और कारण

देहरादून में वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी के डॉ डोभाल भी मानते हैं कि विस्फोटों से ग्लेशियर को नुकसान होता होगा.

बर्फ से ढंके पहाड़
अगर वार्मिंग नहीं रुकी तो ये बर्फ दिखाई नहीं पड़ेगी

वो कहते हैं ' देखिए जो हिमालय के ग्लेशियर हैं वो बहुत पुराने नहीं हैं. जब भूकंप होता है या ऐसी कोई बड़ा कंपन होता है तो ग्लेशियर पर प्रभाव पड़ता है. जलवायु परिवर्तन का प्रभाव तो है ही. गर्मी बढ़ी है. पहाड़ों में तापमान बढ़ गया है. लेकिन अगर ऐसे विस्फोट होते हैं तो स्थिति ख़राब होती ही है.'

डोभाल कहते हैं कि पिछले दस वर्षो में ग्लेशियर के आस पास के इलाक़े के मौसम में भी बदलाव हुए हैं.

वो कहते हैं ' हो ये रहा है कि गर्मी का समय बढ़ गया. नवंबर तक बर्फ गलती है. बर्फ जमा कम हो रही है. हमारे अनुमान से हर साल गंगोत्री 20 मीटर पीछे जा रहा है. '

वो कहते हैं कि गंगोत्री ग्लेशियर के पास लाखों लोग जाते हैं और वहां गंदगी फ़ैलाते हैं प्लास्टिक फेंकते हैं जो कि ग्लोबल वार्मिंग के प्रभाव को और बढ़ा देता है.

स्थानीय लोगों और वैज्ञानिकों की बात एक जैसी लगती हो लेकिन भारत में कई लोग यह मानने को तैयार नहीं कि ग्लेशियर ख़त्म होगा और गंगा जैसी नदियां समाप्त हो जाएंगी.

जो नहीं मानते उनका कुछ नहीं हो सकता है, लेकिन कम से कम हमें अपने स्तर पर गंगोत्री जैसे ग्लेशियरों को बचाने के लिए कुछ न कुछ करना चाहिए.

 
 
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