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गुरुवार, 02 फ़रवरी, 2006 को 19:08 GMT तक के समाचार

आलोक पुराणिक
आर्थिक मामलों के विशेषज्ञ

रोज़गार योजना नहीं, रोज़गार क़ानून

दो फ़रवरी को प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी अधिनियम की शुरुआत करके उस योजना की शुरुआत की है, जिसे उन्होने अपने संसदीय भाषण में आज़ाद भारत का सबसे महत्वपूर्ण क़ानून बताया था.

शुरु में इसे 200 ज़िलों में लागू किया जाएगा. पांच वर्षों के अंदर इसे पूरे देश में लागू किए जाने की योजना है.

इस योजना के इरादे नेक हैं. इसके तहत रोज़गार को बतौर योजना नहीं, बल्कि एक क़ानूनी हक़ के तौर पर पेश किया गया है.

योजना और क़ानून में फ़र्क यह होता है कि योजना को लागू करना या न करना सरकार के अफ़सरों की मरजी पर निर्भर होता है.

पर यह एक क़ानूनी योजना है इसलिए इसमें अफ़सरों की मरजी नहीं चलती. जैसे भी हो, इसे लागू करना होता है.

इस अर्थ में यह योजना तमाम रोज़गार योजनाओँ के मुक़ाबले ज्यादा समर्थ है. कानून को अदालत के सहारे लागू करवाया जा सकता है, योजना के क्रियान्वयन में अदालत की भूमिका उस तरह की नहीं होती है.

पर पेंच ये है

इस योजना के तहत ग्रामीण क्षेत्रों में ग़रीब परिवारों के किसी वयस्क व्यक्ति को साल में 100 दिनों का रोज़गार पाने का अधिकार होगा.

अगर गरीब परिवारों को रोज़गार मुहैया नहीं होता है, तो फिर बेरोज़गारी भत्ता देना पड़ेगा.

सड़क बनवाने से लेकर, सिंचाई परियोजनाओं में काम करवाने से लेकर, भूमि विकास तक के कामों में मज़दूर को लगाया जा सकता है.

मज़दूरी उसे संबंधित राज्य में लागू होने वाली न्यूनतम मज़दूरी के हिसाब से देय होगी.

अब यहां पेंच यह है कि भारत के तमाम राज्यों में अलग-अलग न्यूनतम मज़दूरी देय है. केरल में यह 134 रुपए है और नागालैंड में यह 25 रुपए है.

पर केंद्र सरकार ने कहा है कि जहां मजदूरी कम है, वहां पर 60 रुपये की दर से भुगतान होगा.

परियोजना में लगने वाले सामान के 75 प्रतिशत की लागत केंद्र सरकार वहन करेगी और 25 प्रतिशत की लागत राज्य सरकार को वहन करनी पड़ेगी.

अकुशल मजदूरों की 100 प्रतिशत लागत केंद्र सरकार वहन करेगी. पर काम मुहैया न होने की सूरत में दिया जाने वाला बेरोज़गारी भत्ता राज्य सरकार को देना होगा.

बेरोज़गारी भत्ता पहले तीस दिनों तो मज़दूरी की दर की 25 फ़ीसदी दर से दिया जाएगा और बाकी की अवधि में आधी दर से दिया जाएगा.

यानी जिस राज्य में मज़दूरों को काम नहीं मिलेगा, वहाँ की राज्य सरकारों को बेरोज़गारी भत्ता देना पड़ेगा.

पर भत्ता भुगतान में दो विकट समस्याएं हैं. एक समस्या यह है कि कागज पर खाना-पूरी कुछ यूं की जा सकती है कि ये दिखा दिया जाए कि सबको रोज़गार दे दिया गया.

महाराष्ट्र का उदाहरण सामने है. यहां इस तरह की योजना को राज्य के स्तर पर लागू किए हुए कई दशक हो गए, पर बेरोज़गारी भत्ता देने की नौबत नहीं आई है. कागजों पर सबको रोज़गार दे दिया गया है.

दूसरी समस्या यह है कि कई कंगाल राज्य यह तर्क दे सकते हैं कि उनके पास पैसा ही नहीं है, दे कहां से.

मध्य प्रदेश और बिहार की सरकारें अपने स्थाई कर्मचारियों को नियमित वेतन भुगतान में रोना रोती हैं.

इस योजना के लिए राज्य सरकारों के पास पैसा कहां से आएगा. यह विकट सवाल है.

एक मोटे अनुमान के मुताबिक इस योजना में करीब 40 हज़ार करोड़ रुपया खर्च हो सकता है, जिसमें से राज्यों के सिर पर करीब चार हज़ार करोड़ रुपए की ज़िम्मेदारी आ सकती है.

उत्तर भारत के अधिकांश राज्य इस ज़िम्मेदारी को निभाने में आनाकानी करेंगे, इस बात के पूरे आसार हैं.

ग्राम सभा का हाल

पूरी योजना में ग्राम सभा की भूमिका सबसे अहम है. ग्राम सभा ही संबंधित व्यक्तियों को पंजीकृत करके जॉब कार्ड जारी करेगी.

ग्राम सभा की हालत बहुत कम राज्यों में ठीक-ठाक है. ग्राम सभा के कामकाज को बेहतर करने की व्यवस्था किए बिना इसको ठीक–ठाक तरीके से लागू करवा पाना संभव नहीं है.

ग्रामीण रोज़गार की योजनाओं के जो हाल पहले हुए हैं, उन्हे देखकर बहुत उम्मीद करना ज्यादती ही होगी.

तमाम ग्रामीण रोज़गार की योजनाओं के क्रियान्वयन पर टिप्पणी करते हुए भारत के नियंत्रक और महालेखा परीक्षक की एक रिपोर्ट में यह दर्ज किया गया था कि ग्रामीण रोज़गार की योजनाओं में रोज करीब 30 करोड़ रुपये खर्च हुए हैं, और इनमें भारी गड़बड़-घोटाला हुआ है.

केंद्र और राज्य सरकार की निगरानी रखने वाली मशीनरी इस मामले में निष्प्रभावी साबित हुई है.

ऐसी रिपोर्ट हम इस योजना के बारे में न पढ़ें, ऐसी फ़िलहाल कामना ही की जा सकती है.