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रविवार, 10 जुलाई, 2005 को 11:48 GMT तक के समाचार

पुणे से वी राधिका

बोली लगाकर चुने गए पंचायत सदस्य

चुनाव के दौरान नेता वादे करते हैं और जीतने के बाद अक्सर उन्हें भुला देते हैं.

लेकिन महाराष्ट्र के पुणे ज़िले के शिखर तालुका स्थित जांबुत गाँव निवासियों ने अपने भावी पंचायत नेताओं से चुनाव के पहले ही उनके जीत की क़ीमत वसूल कर ली.

गाँव के पुराने विट्ठल मंदिर के पुनर्निमाण को सबसे अहम मुद्दा ठहराते हुए यहाँ की ग्राम सभा ने निर्णय लिया कि जो व्यक्ति इस कार्य के लिए सबसे ज्यादा अनुदान देगा उसी को वे सरपंच और उप सरपंच बनाएंगे.

गाँव वालों ने यह भी निर्णय लिया कि पंचायत के अन्य सदस्यों का चयन भी इसी आधार पर होगा.

बोली लगी

जून के पहले सप्ताह में जब राज्यभर में पंचायत चुनाव प्रचार जोर पकड़ रहा था जांबुत के निवासी मंदिर के सामने स्थित मंडप में इकट्ठे हुए.

तकरीबन 1500 लोगों की इस बैठक में सरपंच की बोली लगाई गई.

शुरूआत एक लाख से हुई और जब तीन लाख तक बोली की रकम पहुँच तो मैदान में केवल दो ही खिलाड़ी रह गए.

किशन भीमाजी मसके और बालासाहेब हरिभाऊ पटारे.

मसके ने सरपंच का ताज तीन लाख 60 हज़ार रूपए देने का वादा करके हासिल कर लिया.
 मैं पिछले 10 साल से पंचायत में काम कर रहा हूँ और लोग ऐसे व्यक्ति की तलाश में थे जो पैसा भी देगा और काम भी करेगा
 
नए सरपंच मसके

इसके बाद उपसर्पंच की बारी आई और रामदास गणपत जगताप ने ये पद एक लाख दस हज़ार रुपए के वादे पर हासिल किया.

सभी ने तय किया कि पंचायत के अन्य सात सदस्य 11000 की राशि देंगे.

समस्या केवल एक थी, इस मीटिंग के पहले 71 लोगों ने नामांकन भर दिया था. लेकिन यह निर्णय होने के बाद अन्य लोगों ने अपना नामांकन पत्र वापस ले लिया.

नानाबाला साहब जगताप जो खेती के साथ सामाजिक कार्य भी करते हैं, बताते हैं,“19 जून को जब महाराष्ट्र के सभी गाँवों में पंचायत चुनाव हो रहे थे, पाँच हज़ार की जनसंख्या वाले जांबुत की मतदान पेटियाँ खाली थीं क्योंकि सभी 9 सदस्य निर्विरोध चुन लिए गए केवल दो सीटें, जो पड़ोसी गाँव शरदवाड़ी के हिस्से में थी, वहाँ चुनाव हुआ."

ऐतराज़

हालाँकि ये पद बोली लगाकर ही हासिल की गई, नए पंचायत सदस्य और गाँव वाले भी, इस प्रकरण को नीलामी कहने से कतराते हैं.

उनका कहना है कि पैसों के साथ प्रत्याशी की योग्यता को भी ध्यान में रखा गया था.

अब सरपंच बन चुके मसके कहते हैं,“मैं पिछले 10 साल से पंचायत में काम कर रहा हूँ और लोग ऐसे व्यक्ति की तलाश में थे जो पैसा भी देगा और काम भी करेगा."

यह पूछने पर कि मंदिर का कार्य ही गाँव के लिए क्यों महत्वपूर्ण था, गाँव के बुजुर्ग एवं कृषि उत्पादन समिति के अध्यक्ष दशरत यशवंत जगताप पाटिल ने कहा,"मंदिर की हालत बहुत ख़राब हो चुकी थी और गाँव वालों से जमा की गई ढाई लाख की अनुदान राशि कम पड़ रही थी चूंकि गाँव वाले मानते हैं कि मंदिर का कार्य रोकना अशुभ है, इसलिए उन्होंने यह उपाय निकाला."

जगताप कहते हैं,"मंदिर हमारे लिए केवल एक धार्मिक स्थल नहीं है. इसके प्रांगण में सभी सामाजिक सांस्कृतिक एवं धार्मिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं."

प्रजातंत्र

लोगों का कहना है कि इस प्रक्रिया का सबसे बड़ा फायदा यह है कि चुनाव में होने वाली फिजूलखर्ची पर अंकुश लगाया गया.

हाईस्कूल अध्यापक संजय जोहरी का कहना है,"चुनाव के दौरान गाँव में बहुत गुटबाज़ी होती है और जो व्यक्ति चुनकर आते वो अपने पुराने झगड़े पंचायत के कामकाज में भी ले आते है. इस प्रक्रिया से इस समस्या का समाधान भी हो जाएगा."

वैसे पंचायत चुनाव में पहले सदस्य चुने जाते हैं और फिर सरपंच.

पर यहाँ उल्टा हुआ फिर गाँव वाले मानते हैं कि इस चुनाव में प्रजातंत्र के सभी नियमों का पालन हुआ है.

प्राइमरी स्कूल अध्यापक शिंदे मास्टर का कहना है,"यह पूरी प्रक्रिया सर्वसम्मति से हुई और पंचायत में सभी जातियों एवं वर्ग के लोगों को लिया गया है."

नई पंचायत जुलाई महीने के अंत तक कार्यभार संभालेगी.

मसके को औपचारिक रूप से सरपंच, जुलाई 20 से 25 के दरमयान बनाया जाएगा.

जांबुत निवासियों को विश्वास है कि अब मंदिर का काम ज़ोर पकड़ेगा और उसके साथ-साथ यहाँ के देवता भी खुश हो जाएंगे.