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सूनामी से प्रभावित हुआ नमक उद्योग | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
दक्षिण भारत के इलाक़े वेदारनयम में तीस अप्रैल, 1930 को सी राजगोपालाचारी के नेतृत्व में सत्याग्रहियों ने ब्रितानी सरकार के नमक क़ानून को तोड़कर एक नया इतिहास बनाया था. आज जब सारा देश “डांडी मार्च” के 75 वर्ष होने को याद कर रहा है, वेदारनयम के नमक उद्योग में काम कर रहे अधिकतर पिछड़ी जाति के मज़दूर ग़रीबी में जीवन-यापन कर रहे हैं. दिसंबर 2004 में आए सूनामी ने उनकी हालत और ख़राब कर दी है. वेदारनयम का नमक उद्योग बंगाल की खाड़ी के तट पर स्थित है. पाँच हज़ार एकड़ ज़मीन पर नमक बनाने की फैक्टरियाँ स्थित हैं और ये कुछ बड़े व्यापारियों के क़ब्ज़े में हैं जिन पर ये मज़दूर काम करते हैं. दशकों पहले कुछ लोगों ने ज़मीन साफ़ करके नमक बनाना शुरू किया था. ये लोग सूनामी द्वारा नष्ट हुए तालाबों और नालियों को कड़कती धूप में गहरा कर रहे हैं ताकि समुद्र का पानी तालाबों में भर सके. धूप से पानी भाप बनकर उड़ जाता है जिसके बाद इन तालाबों में सफ़ेद नमक इकट्ठा हो जाता है. दिन में आठ घंटे काम के लिए एक महिला मज़दूर को 35 रुपए प्रति दिन मिलते हैं जबकि पुरुषों को 72 रुपए. दिहाड़ी के मज़दूर ये मज़दूर बिना किसी स्वास्थ्य सुरक्षा और छुट्टी के काम करते हैं.
35 वर्षीय कला कहती है, “एक दिन अगर मैं नहीं आऊँ तो मेरी दिहाड़ी कट जाती है. मुझे स्कूल जाने वाली अपनी लड़की को पालना है. नहीं आऊँ तो खाना कहाँ से लाऊँगी.” कलयराजन, 70 वर्षीय किसान हैं जिनके पास नमक बनाने के लिए एक एकड़ ज़मीन है. उनका कहना है कि सूनामी लहर से जो बर्बादी हुई उससे उनपर क़र्ज़ का बोझ और बढ़ गया है. वो कहते हैं, “बारिश हुई तो खेती कर सकूंगा. इस समय मेरे परिवार और बच्चे भी दिहाड़ी मज़दूर बन गए हैं.” प्रशासन ने नमक मालिकों को मुआवज़ा दिया है. नागपट्टिनम के अतिरिक्त कलेक्टर रणवीर प्रसाद ने कहा कि नमक बना रहे मज़दूरों की सहायता के लिए स्थानीय प्रशासन ने केंद्र सरकार को प्रस्ताव भेजा है. दिलचस्प बात यह है कि अंग्रेज़ सरकार द्वारा बनाया गया “नमक विभाग” आज भी केंद्र सरकार के अधीन है. वेदारनयम के ऐतिहासिक सत्याग्रह की याद में एक स्मारक यहाँ मौजूद है जिसके पास की ज़मीन पर केंद्र सरकार के बोर्ड लगे हैं. किसान परेशान यहाँ के किसान परेशान हैं क्योंकि ज़िले में पाँच हज़ार हेक्टेयर ज़मीन में नमक की मात्रा ज़्यादा हो गई है. किसानों का कहना है कि ज़मीन को उपजाऊ बनाने में तीन से चार वर्ष का समय लगेगा. एक कृषि वैज्ञानी भुवनेश्वरी पूनपुहर शहर के निकट ज़मीन में नमक की मात्रा कम करने पर काम कर रही हैं. वो कहती हैं, “मई में तो किसानों को मुआवज़ा दिया गया है. फसल कटने के 20 दिन पहले सूनामी ने सब कुछ बर्बाद कर दिया. अब मॉनसून की खेती भी नहीं हो सकती.” एक किसान तिलक राज पर निजी और सरकारी क़र्ज़ का बोझ बढ़ रहा है. तिलकराज कहते हैं, “जो कुछ मुआवज़ा मिला उससे मैने अपना ऋण कम कर दिया. अब और क्या करूँ” |
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