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अब यह मुद्दा अप्रासंगिक है | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
इमरजेंसी के बारें में अब विस्तार से जाने की आवश्यकता नहीं है. इस बारे में काफ़ी कुछ कहा जा चुका है और देश में इस पर विस्तार से चर्चा हो चुकी है. दरअसल विपक्ष के पास कोई मुद्दे नहीं हैं.ये दल मुद्दे विहीन हैं इसलिए वे बीते दिनों की बातें कर रहे हैं. मैं पहले भी स्पष्ट कर चुका हूँ कि ज्यादतियाँ के सवाल बीते दिनों की बात है. ये ऐसे दल उठा रहे हैं जिनके पास रचनात्मक बातें नहीं हैं. ये मुद्दाविहीन दल, कभी जिन्ना का मुद्दा उठा रहे हैं तो कभी कुछ और. ये भारत की जनता की भावनाओं का ध्यान नहीं दे रहे हैं. मैं नहीं समझता कि तीस साल पुरानी बातों के बारे में विशेष कुछ कहने की ज़रूरत है. राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के प्रमुख सुदर्शन ने घोषणा की है कि इंदिरा गाँधी दबंग नेता थीं जिन्होंने अनेक अच्छे क़दम उठाए. एक तरफ़ तो ये लोग उनके कार्यों की प्रशंसा करते नहीं थक रहे हैं तो दूसरी ओर पुरानी बातें उठाते हैं. इन दलों ने एक नकाब अपने चेहरे पर लगाया हुआ है और उन्होंने हमेशा इसे बदला है. देश की जनता ने इनका चेहरा पहचाना है और इसी का परिणाम है कि 2004 के चुनावों में इन्हें शिकस्त मिली है. मुझे लगता है कि उस वक्त की बातों की चर्चा करने का अब कोई औचित्य नहीं है क्योंकि अब इसकी कोई प्रासंगिकता नहीं रही है. (आशुतोष चतुर्वेदी से बातचीत पर आधारित) |
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