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शुक्रवार, 24 जून, 2005 को 13:57 GMT तक के समाचार
 
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25 जून, 1975 का घटनाक्रम
 

 
 
इंदिरा गाँधी
पच्चीस जून को आपातकाल की घोषणा देश की दिशा बदल दी
इमरजेंसी की घोषणा ने देश की राजनीति में दूरगामी बदलाव की शुरूआत की और लोकतंत्र के मूल्यों की अहमियत भी दिखाई दी. 25 जून,1975 को रातों रात बहुत कुछ बदल गया.

जैसे ही यह ख़बर लगी एक समाचार एजेंसी के पत्रकार ने जयप्रकाश नारायण, चंद्रशेखर, मोरारजी देसाई जैसे लोगों को बताया कि देश में आपातकाल लगने वाला है.

इस घोषणा के तुरंत बाद रातों रात कई नेता हिरासत में ले लिए गए.

25 जून की घटनाओं की जड़ 12 जून 1975 थी.

उस दिन सुबह- सुबह ये ख़बर आई कि अदालती फ़ैसले ने फ़ैसला सुनाया है कि इंदिरा गाँधी ने 1971 में रायबरेली चुनाव जीतने के लिए सरकारी मशीनरी का इस्तेमाल किया था.

और इस कारण इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने उनका चुनाव रद्द कर दिया और उन्हें छह साल के लिए चुनाव लड़ने के लिए अयोग्य घोषित कर दिया.

मज़दूर नेता और बड़ौदा डायनामाइट मामले के सूत्रधार जार्ज फर्नांडिस उन दिनों की याद करते हुए बताते हैं,'' गिरफ्तारी के बाद उन्हें जेल में पहुँचा दिया गया. वैसे तो मैं बहुत बार जेल गया था. लेकिन पहली बार हाथों में बेड़िया और शरीर को जंजीर से जकड़ा गया.''

दूसरी ओर इंदिरा गांधी का कहना था कि आपातकाल उन्हें 20 सूत्री कार्यक्रम चलाने में मदद करेगा.

वहीं आज भी लोगों को याद है कि इस दौरान जबरन नसबंदी की गईं, राजनीतिक गिरफ्तारियाँ हुईं और बड़े पैमाने पर झुग्गी झोपड़ियों का सफ़ाया किया गया.

इंदिरा गाँधी के मंत्रिमंडल में उस समय वाणिज्य उप मंत्री रहे और बाद में स्वयं प्रधानमंत्री बने विश्वनाथ प्रताप सिंह कहते हैं,'' ग़लत सलाह इंदिरा जी को मिली, ज़रूरत नहीं थी. इमरजेंसी के छह महीने के भीतर हम यह समझने लगे थे कि ग़लत हुआ है.''

उस समय के किसी भी प्रकाशन को पढ़े या आपातकाल का मूल्यांकन करें तो पाएंगे कि सभी की यादें बहुत कड़वी है चाहे आंतरिक सुरक्षा का मामला हो या कोई अन्य.

संजय गाँधी, बंसीलाल, विद्याचरण शुक्ला और ओम मेहता की चौकड़ी के कारनामे आज भी याद किए जाते हैं.

वरिष्ठ पत्रकार राम बहादुर राय का कहना है कि आपातकाल का दूरगामी परिणाम था, प्रधानमंत्री निवास की बढ़ती अहमियत और जनता का विश्वास कि सत्ता परिवर्तन की कुंजी उनके हाथ में है.

वही आज तीस साल बाद जहाँ कुछ पुराने ज़ख्म भुलाए गए हैं वहीं इंदिरा गाँधी को भी नए आईने से देखा जा रहा है.

उस समय कांग्रेस कार्यकारिणी के सदस्य और इंदिरा गाँधी द्वारा गिरफ्तार किए गए चंद्रशेखर के राजनीतिक जीवन पर आई नई क़िताब “रहबरी के सवाल” में उन्होंने कहा है, “आज के नेताओं को जब देखता हूँ तो लगता है कि इंदिरा गाँधी उनसे बहुत बेहतर थीं.”

अब संघ प्रमुख केसी सुदर्शन ने इंदिरा गाँधी के दृढ़ निश्चय की तारीफ़ की है और इस बयान को कांग्रेसजनों ने उद्धृत करना भी शुरू कर दिया है.

कांग्रेस कोषाध्यक्ष मोती लाल वोरा कहते हैं, ''उस वक़्त जितनी घटनाएं हुई हैं उसके बारे में कहा जा चुका है और विशेष रूप से कहने की कोई आवश्यकता नहीं है. हाल ही में आरएसएस के सरसंघचालक केसी सुदर्शन भी इंदिरा गाँधी के बारे में कह रहे हैं कि वे ही एक दबंग नेत्री थीं जिन्होंने अनेक अच्छे क़दम उठाए.''

मूल्यांकन

तो क्या इंदिरा गाँधी का मूल्यांकन में बदलाव आ रहा है.

विश्वनाथ प्रताप सिंह कहते हैं,'' वे देश के हितों की रक्षा और अपने साहस के लिए जानी जाती हैं. सिक्किम की धरती जोड़ कर गईं. बांग्लादेश बनवाकर उन्होंने दक्षिण एशिया का भूगोल बदल दिया और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश के सम्मान के साथ कभी समझौता नहीं किया.''

वहीं जार्ज फर्नांडिस आज भी कहते हैं कि स्वयं और अपने परिवार को सत्ता में बनाए रखने की इच्छा ही इंदिरा गाँधी के सभी निर्णयों को प्रभावित करती थी. वे सभी को इस बात को याद रखने को भी कहते हैं.

इंदिरा गाँधी को आपातकाल के आईने से हट कर देखने के पीछे एक कारण शायद ये भी है कि उनके बाद जो नेता आए वे उनके मुक़ाबले फीके नज़र आते हैं.

राजनीतिज्ञ और बुद्धिजीवी आपातकाल को बहुत कड़ुवाहट के साथ याद करते हैं.

लेकिन ऐसे लोगों की कमी नहीं जो उन दिनों को “अच्छे दिनों” की तरह याद करते हैं.

 
 
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