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शुक्रवार, 17 दिसंबर, 2004 को 02:48 GMT तक के समाचार
 
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अधूरी चाह लिए वेंकटेश चल बसा
 
वेंकटेश
वेंकटेश चाहता था कि उसके अंग ख़राब ना हों इसके लिए पहले ही जीवनरक्षक उपकरण हटा लिए जाएँ
जानलेवा बीमारी से जूझने के बावजूद अपने अंग दान करने की इच्छा रखनेवाले युवक वेंकटेश की मृत्यु हो गई है.

वेंकटेश ने गुरूवार तड़के हैदराबाद के एक अस्पताल में अंतिम साँसें लीं.

एक दिन पहले ही आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय ने वेंकटेश की स्थिति पर विचार करने के लिए डॉक्टरों की एक नई टीम गठित की थी.

इस सप्ताह बुधवार को डॉक्टरों के एक अन्य दल की रिपोर्ट के आधार पर अदालत ने वेंकटेश की अपील को मानने से इनकार कर दिया था.

अदालत ने कहा कि वेंकटेश की अपील नहीं मानी जा सकती क्योंकि भारतीय क़ानून के तहत ऐसे लोगों के लिए अंग दान करने की कोई व्यवस्था नहीं है जिनकी दिमाग़ी तौर पर मौत न हो चुकी हो.

अंगदान

के वेंकटेश को छोटी उम्र से ही मस्कुलर डिस्ट्रॉफ़ी नाम की बीमारी थी जो मष्तिष्क में जीन की संरचना में गड़बड़ी के कारण होती है.

वेंकटेश ने अपनी अंतिम इच्छा के रूप में अपना दिल, जिगर, गुर्दे और आँखें दान करने की इच्छा जताई थी.

मगर बाद में जब उनकी हालत ख़राब होने लगी तो उन्होंने जीवनरक्षक मशीनों को हटा लेने की बात की और कहा कि मृत्यु के फ़ौरन बाद उनके अंग निकाल लिए जाएँ.

लेकिन डॉक्टरों ने ऐसा करने से मना कर दिया क्योंकि भारतीय क़ानून यूथेनेज़िया या ईच्छा मृत्यु की अनुमति नहीं देता.

इसके बाद वकील अदालत गए जिसने बुधवार को वेंकटेश की अपील ठुकरा दी.

मगर वेंकटेश के वकील टी राजेंद्र प्रसाद ने कहा था कि वे डॉक्टरों की रिपोर्ट को चुनौती देंगे क्योंकि रिपोर्ट देनेवाली डॉक्टरों की टीम में ना तो हृदय रोग और ना ही मष्तिष्क रोग विशेषज्ञ शामिल किए गए थे जबकि वेंकटेश की बीमारी मष्तिष्क से संबंधित है.

 
 
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