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बुधवार, 01 दिसंबर, 2004 को 11:43 GMT तक के समाचार
 
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स्वयंसेवी संस्थाएँ और उनकी राजनीति
 

 
 
प्रदर्शन
गैस हादसे के बाद भोपाल में स्यवंसेवी संस्थाओं की बाढ़ सी आ गई
भोपाल में काम करने वाली स्वयंसेवी संस्थाओं की गिनती करें तो सूची काफी लंबी हो जाती है.
पुनर्वास, रोज़गार, क़ानूनी लड़ाई, स्वास्थ्य, पीने का पानी, पेंशन वगैरह-वगैरह. भोपाल गैस पीड़ितों के बीच कोई भी क्षेत्र शायद नहीं बचा है जिसके बीच स्वयंसेवी संस्थाएँ कार्यरत न हों.

कुछ स्वयंसेवी संस्थाओं के लाजवाब काम की चर्चा तो विदेशों तक पहुँच चुकी है.

भोपाल में गैस पीड़ित महिला कर्मचारियों की स्टेशनरी संघ की दो कार्यकर्ताओं, राहिदा बी और चंपा देवी को तो अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार तक मिल चुका है.

इस पुरस्कार से गैस पीड़ितों और स्वयंसेवी संस्थाओं को खुशी होनी चाहिए थी और इन दोनों महिलाओं का पुरस्कार लेकर आने के बाद स्वागत समारोह तक नहीं हुआ.
दूसरी संस्था के पुरुस्कार पर टिप्पणी
 उनके अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बड़े संपर्क हैं. इन लोगों को स्थापित करने के लिए एक तरह से पिछले साल गोल्डन अवार्ड दिला दिया और इस साल भी कई अमरीकन अवार्ड दिलाए हैं उनको. यह सब अंतरराष्ट्रीय 'कनेक्शन' के आधार पर हुआ है
 
अब्दुल जब्बार, स्वाभिमान के संयोजक

रोज़गार और क़ानून के क्षेत्र में काम कर ही संस्था "स्वाभिमान" के संयोजक अब्दुल जब्बार से जब हमने इसका कारण पूछा तो उन्होंने प्रतिद्वंद्वी कहे जाने वाले ट्रस्ट के कर्ताधर्ता सतीनाथ सारंगी की ओर इशारा करते हुए कहा, "उनके अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बड़े संपर्क हैं. इन लोगों को स्थापित करने के लिए एक तरह से पिछले साल गोल्डन अवार्ड दिला दिया और इस साल भी कई अमरीकन अवार्ड दिलाए हैं उनको. यह सब अंतरराष्ट्रीय 'कनेक्शन' के आधार पर हुआ है."

जबकि इस मामले पर वरिष्ठ पत्रकार संजय शर्मा को राय कुछ दूसरी है. उन्होंने कहा,"आप देखेंगे कि कुछ स्वयंसेवी संस्थाएँ न्यूयार्क जाकर प्रदर्शन और धरना आयोजित करती हैं. ये संस्थाएँ पाँच आदमियों को विदेश ले जाएंगीं और अवार्ड ले आएंगीं लेकिन यह भोपाल में कम ही नज़र आती हैं. नवंबर का दूसरा सप्ताह आते आते यह सब प्रकट होंगे. अखबारों में वक्तव्य और इंटरव्यू देंगे और फिर 5-7 दिसम्बर तक गायब हो जाएँगे."

प्रदर्शन
हर संस्था गैस पीड़ितों की बात अपने मंच से और अपने ढंग से उठाती है

संजय शर्मा ने दिल्ली से निकलने वाले साप्ताहिक, "संडे ऑब्ज़र्वर" में अपने एक लेख -"अर्निंग इन द नेम ऑफ़ विक्टिम" में लिखा भी था कि गैस पीड़ितों के नाम पर पैसे उगाहना स्वयंसेवी संस्थाओं का व्यावसाय बन गया है.

उनके अनुसार इन संस्थाओं ने पिछले सालों में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जान-पहचान बना ली है. यह लेख 1994 में गैस पीड़ितों को आर्थिक सहायता के लिए प्रकाशित एक इश्तहार के छपने के बाद लिखा गया था. हालाँकि इस इश्तहार में अपील देने वाले का नाम नहीं था.

वैचारिक मतभेद

स्वयंसेवी संस्था को चलाने के लिए जिस फंड की दरकार होती है उसकी कमी हर जगह काम कर रही स्वयंसेवी संस्थाओं की तरह भोपाल की संस्थाएँ भी महसूस करती हैं.

भोपाल गैस पीड़ितों के लिए हर संगठन अलग मंच से अपनी बात उठाता रहा है

कुछ संस्थान यहाँ अभी भी सदस्यों के चंदे पर चल रही हैं. कुछ को अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की मदद है और वह विदेशों से भी चंदा लेते हैं. शायद यही इन संस्थाओं में ईर्ष्या का विषय बन गया है लेकिन जिस तरह की बातें भोपाल में इस मामले में सुनने को आती है वह सिर्फ इसी मामले तक सीमित नहीं हैं.

इसमें विचारों का फ़र्क भी साफ़ झलकता है और विचारधारा की यह भिन्नता गैस दुर्घटना के दो या तीन साल बाद ही शुरू हो गई थी.

कुछ बड़े नाम जैसे अनिल सदगोपाल, जिन्होंने इस संघर्ष को काफी बल दिया था. इससे अलग हो गए.

 लोगों के बीच मतभेद आए. स्वाभाविक है, जो राजनीतिक या विचारधारा के स्तर पर मतभेद थे, उसे तो बाहर आना ही था
 
साधना कार्तिक

इस बाबत सतीनाथ सारंगी कहते हैं, "यह बड़ी दर्दनाक दास्तान है कि अनिल सदगोपाल जैसे लोग, जो बड़ा बदलाब ला सकते थे, उन्हें जाना पड़ा. जहाँ अनिल सदगोपाल जैसे लोग आंदोलन चलाने के लिए लोकतांत्रिक प्रक्रिया को तरजीह देना चाहते थे, वहीं कुछ लोग केन्द्रीयकरण के पक्षधर थे. कुछ लोग गैस पीड़ितों के आंदोलन को किसी पार्टी विशेष के धड़े के तौर पर इस्तेमाल करना चाहते थे."

वामपंथी विचारधारा वाली साधना कार्तिक, जो शुरु के दौर में इस संघर्ष में सक्रियता से जुड़ी रही हैं, कहती हैं, "लोगों के बीच मतभेद आए. स्वाभाविक है, जो राजनीतिक या विचारधारा के स्तर पर मतभेद थे, उसे तो बाहर आना ही था."

तीन दिसंबर, 1984 की घटना के बाद यहाँ स्थापित "ज़हरीली गैस संघर्ष मोर्चों" में न सिर्फ़ वामपंथी विचारधारा, बल्कि केंद्रीय पार्टियाँ जैसे जनता दल इत्यादि या फिर उन पार्टियों के लोग व्यक्तिगत तौर पर जुड़े थे, जो 20 साल के लम्बे समय तक शायद इसको गति देने के लिए बाद में समय नहीं निकाल पाए.

इस कलह का कारण यह हुआ कि जहाँ राजनीतिक पार्टियों ने इस फूट का फ़ायदा उठाया कमज़ोर विरोध के रूप में.

वहीं स्वयंसेवी संस्थाओं ने अंतरिम मुआवज़े की कम राशि की बात मान ली और ज़हरीली गैस का प्रभाव अलग-अलग अनुपात में झेल रहे पीड़ितों के लिए एक समान मुआवज़े की बात भी.

स्वयंसेवी संस्थाओं की राजनीति से लाभ तो किसी को क्या मिला होगा ज़ाहिर तौर पर नुक़सान हुआ और वह भी उनका जिनके लिए ये संस्थाएँ लड़ने का दावा कर रही थीं.

 
 
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