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तीन दिसंबर की सुबह का वो मंज़र
 
डॉ वरदराजन के साथ अनीस चिश्ती
हादसे के बाद जायज़ा लेने पहुँचे सीएसआईआर के तत्कालीन प्रमुख डॉ वरदराजन (दाएँ) के साथ यूनियन कार्बाइड में अनीस चिश्ती
भोपाल की उस रात के बारे में अब तक बहुत कुछ लिखा जा चुका. अनगिनत रिपोर्ताज और दर्जनों किताबें. सुपरिचित फ़्रांसिसी लेखक डोमिनिक लॉपियरे ने भी एक किताब लिखी. लेकिन न अभी कलम थमी है और न लोगों में यह जानने की उत्सुकता ख़त्म हुई है कि आख़िर उस काली रात सब कुछ कैसे हुआ और क्या-क्या हुआ.

वरिष्ठ पत्रकार अनीस चिश्ती उस रात भोपाल के उसी इलाक़े में थे जहाँ गैस रिस रही थी. उनके साथ तीन पत्रकार और थे. एक फ़्रीप्रेस जर्नल के सुरेश मेहरोत्रा और दूसरे नवभारत टाइम्स के विजय तिवारी और हिंदुस्तान समाचार के संवाददाता पुष्पराज पुरोहित. इन तीनों पत्रकारों ने उसी रात गैस रिसने के दो घंटे बाद यूनियन कार्बाइड की उस फ़ैक्टरी तक जाने का जोखिम भी उठाया.

न्यूज़टाइम और इनाडू के लिए लिखी गई अनीस चिश्ती की उस रिपोर्ट को हम ज्यों का त्यों प्रस्तुत कर रहे हैं.

इसे हमने उनकी किताब 'डेटलाइन भोपाल' से लेकर अनुवाद किया है.

भोपाल 3 दिसंबर
यह किसी डरावनी कहानी की तरह है. गहरी नींद में सोया भोपाल का पुराना शहर मध्य रात्रि के दो घंटे बाद जैसे 8-10 किमी दूर तक सिमटे किसी गैस चैम्बर में तब्दील हो गया. यह मंज़र 1984 की विदाई से 29 दिन पहले का है.

लोग बदहवासी में बिस्तर छोड़कर भागने लगे. एसा लगा जैसे किसी ने हर तरफ गैस स्प्रे कर दिया हो और लोग इससे बचने की कोशिश कर रहे हों. बूढ़े लाठियों के सहारे और महिलाएँ बुरके और साड़ियों को संभालते बदहवासी में भाग रही थीं. बच्चे अपनी माओं से लिपटे हुए, मानों शहर की पुरानी झील के नजदीक ही चारों ओर एक जनसमुद्र आगे बढ़ रहा हो.

भागते लोगों में से तकरीबन एक लाख लोग सुरक्षित जगहों पर पहुंच गए लेकिन ज्यादातर खांस रहे हैं, उन्हें सांस लेने में दिक्कत हो रही है. कुछ ने खून की उल्टियां भी की हैं. इस ज़हरीली गैस के प्रभाव में कुछ लोगों की मौत हो गई है. अस्पतालों में भीड़ बढ़ती जा रही है.

लोगों का यह हाल शहर के उत्तर की तरफ स्थित कीटनाशक बनाने वाली बहुराष्ट्रीय कंपनी यूनियन कार्बाइड की फैक्टरी से रिसी जहरीली गैस मिथाइल आइसोसाइनेट के कारण हुआ है.

इस फैक्टरी से सिर्फ आठ किमी की दूरी पर टीटी नगर में नई राजधानी का परिसर स्थित है.

यूनियन कार्बाइड के वर्क्स मैनेजर और पेस्टीसाइड्स फैक्टरी के प्रमुख मुकुंद ने बेरासिया रोड स्थित फैक्टरी के परिसर में तड़के चार बजे इस संवाददाता और दो अन्य पत्रकारों को बताया कि गैस 1.30 बजे के करीब रिसने शुरू हुई और 2.00 बजे इस पर काबू पा लिया गया.

यूनियन कार्बाइड
रात तीन पत्रकार उस फ़ैक्ट्री तक पहुँचे थे

भारी जनसैलाब के साथ करीब तीन किमी तक भागने के दौरान इस संवाददाता ने भी सांस में तकलीफ महसूस की. गला पूरी तरह से बंद हो गया और आंखों से पानी बह रहा था.यह एक तरह से दम घुटने की शुरुआत थी.

सुबह होने से पहले ही सैकड़ों लोगों को हमीदिया अस्पताल पहुंचाया जा चुका था. मरीजों की संख्या बढ़ती जा रही थी. इस संवाददाता ने अस्पताल के इमरजेंसी वार्ड के भीतर पांच पुरुषों और बच्चों के शव देखे. एक बच्चे ने तो इस संवाददाता के सामने ही उस समय दम तोड़ दिया जब डाक्टर मुस्ताक़ अहमद ने उसे एक इंजेक्शन लगाया.

दोपहर 12.00 बजे इस रिपोर्ट को लिखे जाने तक अधिकृत तौर पर मृतकों की संख्या पता नहीं चल सकी, क्योंकि इस समय तक भी शहर के विभिन्न हिस्सों से मौत की खबरें आ रही हैं. गैस से बुरी तरह से प्रभावित छोला इलाके के अस्पतालों और फैक्टरी से लगी झुग्गी बस्ती जयप्रकाश नगर के मुआयने के बाद लगता है कि जहरीली गैस से मरने वालों की संख्या तीन अंकों का आंकड़ा पार कर चुकी है.

छोला में हमने देखा कि शवों के नज़दीक ही जानवारों की लाशें भी पड़ी हुई है. सुबह 9.00 बजे भी कुछ लाशें सड़कों पर पड़ी हुई थीं. हमने देखा कि माएँ, बहनें और तमाम महिलाएँ अपने बच्चों और रिश्तेदारों की मौत का मातम मना रही हैं, और चीख रही हैं. ज़्यादातर पुरुष या तो जान बचाने के लिए सुरक्षित जगहों की ओर भाग चुके हैं या फिर अस्पताल में हैं.

यूनियन कार्बाइड के वर्क्स मैनेजर मुकुंद का दावा है कि गैस रिसने के आधा घंटे के बाद ही इस पर काबू पा लिया गया था. लेकिन फैक्टरी के भीतर मौजूद सूत्रों के मुताबिक सारी गैस रिस गई और इसे बचाया नहीं जा सका.

 यूनियन कार्बाइड में गैस रिसने की यह पहली घटना नहीं है. मुकुंद के मुताबिक 1981 को क्रिसमस के मौक़े पर इससे भी ज़हरीली फास्जिन गैस रिस चुकी है. इसमें वहां काम कर रहे एक व्यक्ति की मौत हो गई थी. स्थानीय पत्रकार बताते हैं कि 1983 में भी मिथाइल आइसोसाइनेट रिसने की घटना हो चुकी है. तब किसी की मौत तो नहीं हुई थी, लेकिन फैक्टरी के आसपास के इलाक़े इससे प्रभावित हुए थे
 

मुकुंद ने इस संवाददाता को बताया कि भ्रम की वजह से किसी वैकल्पिक उपकरण से भी इस प्रलयंकारी घटना को रोका नहीं जा सका. उन्होंने यह भी कहा कि उन्हें गैस रिसने के बारे में अतिरिक्त जिला दंडाधिकारी (एडीएम) से पता चला न कि फैक्टरी के किसी व्यक्ति ने इसकी जानकारी दी. मुकुंद के मुताबिक उन्हें करीब 2.00 बजे तड़के पता चला.

यूनियन कार्बाइड में गैस रिसने की यह पहली घटना नहीं है. मुकुंद के मुताबिक 1981 को क्रिसमस के मौक़े पर इससे भी ज़हरीली फास्जिन गैस रिस चुकी है. इसमें वहां काम कर रहे एक व्यक्ति की मौत हो गई थी. स्थानीय पत्रकार बताते हैं कि 1983 में भी मिथाइल आइसोसाइनेट रिसने की घटना हो चुकी है. तब किसी की मौत तो नहीं हुई थी, लेकिन फैक्टरी के आसपास के इलाक़े इससे प्रभावित हुए थे.

मौजूदा त्रासदी से सबसे ज्यादा छोला, जयप्रकाश नगर, टीला जमालपुरा, पी एंड टी कालोनी, सिंधी कालोनी, इब्राहिमपुरा, शांतिनगर, पीर गेट, करोध गांव और पाश कालोनी ग्रीन पार्क इलाके प्रभावित हुए.

आज सुबह 10.00 बजे न तो सरकारी राहत शिविर दिख रहे थे और न ही अस्पतालों में भीड़. यहां तक कि कहीं भी पुलिस भी नहीं दिख रही है. अलबत्ता सेना के जवानों ने मोर्चा संभाल लिया है. हमीदिया और दूसरे अस्पतालों में रात की पाली के डाक्टरों और कुछ नर्सों ने अपनी ओर से कोई कसर नहीं छोड़ी.

संपादक जी.गैसे के दोबारा रिसने की अफवाह से शहर के दूर दराज के इलाके में अफ़रातफ़री मच गई. मैं यह डिस्पैच यहीं रोक रहा हूं.

अनीस चिश्ती
सोमवार, दोपहर 12.00 बजे
3 दिसंबर 1984

 
 
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