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इंदिरा गांधी और लोकतंत्र | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
इंदिरा गाँधी एक बहुत बड़ा व्यक्तित्व हैं. मात्र राष्ट्रीय नहीं बल्कि अंतरराष्ट्रीय भी. उनके बारे में हज़ारों लोगों को कहने-बताने और बोलने का अधिकार है. मेरे पास ऐसा कोई अधिकार नहीं है. मैं उनके निकटतमों और अंतरंगों का हिस्सा नहीं हूँ लेकिन वे सत्ता से वीतराग अपने आदर्शों, सपनों और मूल्यों को पहचानने वालों को पहचानती थीं. शायद यही कारण था जयप्रकाश जी के आपातकाल-विरोधी, सम्पूर्ण-क्रांति आंदोलन को सहमति देने वाले व्यक्ति को उन्होंने अछूत या विरोधी नहीं माना था बल्कि उस दौर के पूरे तूफ़ान को झेलने के बाद जब वो दोबारा 1980 में सत्ता में आई थीं, तो उन्होंने मुझे बुलाकर भारतीय दूरदर्शन का दायित्व सौंपा था. यह एक नितांत आश्चर्यजनक स्थिति थी क्योंकि मैं ही उस 'आंधी' फ़िल्म का लेखक था, जिसे आपातकाल में 'इंदिरा विरोधी' घोषित करके मुझे बहुत परेशान किया गया था. तब मुंबई में मेरी गिरफ़्तारी का वारंट भी जारी हो गया था, जिससे मैं भूमिगत होकर बचा था. बहरहाल तो, जब मैंने भारतीय दूरदर्शन के एडीशनल डायरेक्टर जनरल (प्रोग्राम) के रूप में काम संभाला तो इंदिरा गाँधी ने विशेष तौर पर मुझे दस मिनट मिलने का समय दिया था. मैं उनसे प्रधानमंत्री कार्यालय में उपस्थित होकर मिला था. लोकतंत्र का सम्मान
तब दूरदर्शन भारत का एक मात्र टीवी चैनल था. मैं उनसे निर्देश लेकर कार्यभार संभालना बेहतर समझता था. इस पर उन्होंने कहा था- "आप देखिए और तय कीजिए कि अपने देश में लोकतंत्र जीवित रहे. मेरे ऊपर आपातकाल लगाकर लोकतंत्र को बाधित करने का बड़ा इल्ज़ाम है, लेकिन वह मेरी मजबूरी थी क्योंकि जयप्रकाश जी के साथ हिंदू सांप्रदायिक ताकतें शामिल हो गई थीं. संजय की वजह से कुछ गलतियाँ-ज़्यादतियाँ हुईं, वह पार्टीशन के बाद की नाज़ुक सच्चाइयों को नहीं समझता था." यह उन्होंने कहा तो नहीं, पर उनकी बात का संकेत साफ़ था कि यदि वे संजय की सोच से सहमत होतीं तो दमनकारी इमरजेंसी को जारी रख सकती थीं, पर इससे लोकतांत्रिक प्रक्रिया को खतरा था, इसीलिए संजय से असहमत होकर, उससे बगैर पूछे या बात किए उन्होंने आपातकाल ख़त्म करके आम चुनावों की घोषणा की थी. मेरे लिए प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी का इतना दिशा-निर्देश काफ़ी था. उन्होंने इतना ही कहा, "लोकतंत्र जीवित रहेगा तो भारत की सही विविधतावादी संस्कृति भी जीवित रहेगी. आप इसी की रक्षा कीजिए". तब चलते-चलते मैंने उन्हें बताया, "मैडम, मैं वही कमलेश्वर हूँ जिसने 'आंधी' फ़िल्म लिखी थी, इसलिए आपको मेरे बारे में कोई ग़लतफहमी नहीं होनी चाहिए. इससे पहले की कोई आपको मेरे बारे में बतलाए, मैंने यह बता देना अपना कर्त्तव्य समझा." उन्होंने जो कहा वह आज भी मेरे दिलो-दिमाग पर अंकित है. उन्होंने कहा, "डेमोक्रेसी में ज़िम्मेदाराना मतभेद भी होता है, उसको सुनना ज़रूरी है, अब आपके दूरदर्शन के मतभेद को भी मैं सुनूंगी. आप जाइए, ज्वाइन कीजिए और अपने को बात कहने के लिए आज़ाद समझिए." तो मेरे अनुभवों की सच्चाइयों के बीच ऐसी थीं इंदिरा गाँधी. |
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