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शनिवार, 14 फ़रवरी, 2004 को 08:53 GMT तक के समाचार
 
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प्रेमचंद की मूर्ति
प्रेमचंद की स्मृति में इस मूर्ति के सिवा कुछ और नहीं दिखाई देता
आपकी बात बीबीसी के साथ कारवाँ जब वाराणसी पहुँचा तो एक दिन वाराणसी में भी बीता.

सबने कहा कि बनारस आकर घाट तो देखने ही चाहिए, दशाश्वमेध घाट, अस्सी घाट और फिर विश्वनाथ मंदिर देखे बग़ैर आप कैसे जा सकते हैं.

लेकिन मेरी इच्छा एक और 'मंदिर' देखने की थी- लमही. बनारस से आधे घंटे की दूरी पर बसा एक गाँव, गाँव बड़ा है, घर पक्के हैं, गाँव से शहर को जोड़ने वाली सड़क भी है.

सड़क तो पक्की है लेकिन मरम्मत का इंतज़ार कर रही है, इसी गाँव में एक घर भी है जो मरम्मत का इंतज़ार करते-करते बूढ़ा हो गया है.

इस घर को देखकर मुझे फैज़ याद आए-- कौन आया है यहाँ, कोई न आया होगा/मेरा दरवाज़ा हवाओं ने हिलाया होगा.

ये घर कभी प्रेमचंद का बैठका था, उन्होंने ख़ुद इसे बनवाया था, टूटा-फूटा उजाड़, किसी वृद्ध की तरह उपेक्षित और विस्मृत.

घर के बाहर एक कुआँ है, कभी उसमें भी पानी रहा होगा, इसी घर के ठीक पीछे वो घर है जिसमें प्रेमचंद का जन्म हुआ था.

आज वो प्रेमचंद स्मारक के नाम से जाना जाता है, कुछ साल पहले वहाँ स्वास्थ्य केंद्र खोला गया, आज उसमें भी ताला पड़ा है.

उपेक्षा

गाँव के एक 83 वर्षीय वृद्ध जिन्होंने प्रेमचंद को अपने बचपन में देखा था लाठी टेकते हुए आए और अपने काँपते हाथों से प्रेमचंद स्मारक के गेट का ताला खोला.

सामने पेड़ों की छाँव में प्रेमचंद का बुत नज़र आया, आँगन में पेड़ों से गिरे पत्ते बिखरे थे, यहीं कहीं गोदान, कर्मभूमि, रंगभूमि, निर्मला, ग़बन जैसे उपन्यासों के सृजन का बीज पड़ा होगा.

लमही में बातचीत
गाँव के कुछ बुज़ुर्गों ने प्रेमचंद को बचपन में देखा

पूस की रात, कफ़न, नमक का दारोगा जैसी कहानियों के पात्र प्रेमचंद को दिखाई दिए होंगे, जिन्होंने ग्रामीण भारत की विवशताओं को उजागर किया पर किसे याद है कि लमही ने आधुनिक हिंदी साहित्य को प्रेमचंद जैसा क़लम का सिपाही दिया.

शायद किताबों को. और हाँ, कभी भूले-भटके हम जैसा कोई जिसके लिए लमही 'तीर्थ' से कम नहीं, यहाँ आकर गाँववालों के स्मृतिपटल पर दस्तक देता है तो उन्हें भी प्रेमचंद याद आ जाते हैं.

मुझे यूरोप के कुछ ऐसे ही 'तीर्थ' याद आए वर्ड्सवर्थ, कीट्स और शेक्सपियर के घर आज राष्ट्रीय धरोहर हैं, वहाँ हम जैसे 'तीर्थयात्री' भी जाते हैं और आम सैलानी भी.

मन में उत्सुकता लेकर कि कैसी होगी वो क़लम और वो दावात जिससे रोमियो-जूलियट लिखा गया होगा. वो कुर्सी और वो मेज़ जिस पर ये अमर साहित्यकार बैठे होंगे.

काश प्रेमचंद के घर और स्मारक में भी हम उनकी चौकी, उनकी क़लम और दावात के दर्शन कर पाते पर यहाँ तो उनकी बैठक की मरम्मत भी नहीं हुई, छत का एक हिस्सा टूटकर गिर चुका है.

अगर आप सावधानी न बरतें तो पाँव फिसलें और आप सीधे बैठक में.

और स्मारक, लगता है कि उनके चेहरे की प्रतिमा लगाकर औपचारिकता पूरी कर दी गई हो.गाँववालों ने बताया कि साल में एक बार 31 जुलाई को वहाँ एक छोटा-मोटा जलसा होता है.

कुछ साहित्यकार आ जाते हैं और कभी-कभार नेता भी, और शायद बीबीसी का माइक्रोफ़ोन देखकर एक ग्रामवासी ने उत्साह से कहा कि "उधर जो एक एकड़ ज़मीन है, गाँववाले उसे प्रेमचंद की स्मृति में एक पुस्तकालय बनाने के लिए दान देने को तैयार हैं, लेकिन कोई ये बीड़ा उठाए तो सही."

पता चला कि गाँव में दो स्कूल भी हैं, एक प्राथमिक शिक्षा के लिए और एक कन्या पाठशाला, आगे की पढ़ाई के लिए बच्चे शहर भी जाते हैं.

मैंने पूछा कि क्या इन बच्चों को प्रेमचंद के बारे में मालूम भी है, जवाब मिला, "अब तो अँगरेज़ी माध्यम से पढ़ाई होने लगी है, और फिर सुना है कि प्रेमचंद को पाठ्यक्रम से भी हटाया जा रहा है."

मैंने आसपास बने पक्के मकानों को देखकर कहा कि पहले ज़माने में लमही जैसा था, वैसा अब तो नहीं है, काफ़ी विकास हुआ लगता है.

जवाब आया, "हाँ, विकास तो हुआ है पर आज भी गाँव में गोदान के होरी और धनिया आपको मिल जाएँगे."

 
 
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