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काबुल में छाया एफ़एम रेडियो
अफ़ग़ानिस्तान की राजधानी काबुल. दोपहर का समय. मसूद संजर अपने मेहमान के साथ बातचीत के कार्यक्रम की तैयारी कर रहे हैं. संजर रेडियो अफ़ग़ानिस्तान के पहले निजी एफ़एम रेडियो स्टेशन 'अरमान' के प्रोड्यूसर हैं. उनका यहाँ तक का सफ़र काफ़ी दिलचस्प है क्योंकि इसके पहले वो तालेबान द्वारा संचालित रेडियो शरिया में अंग्रेज़ी की ख़बरें पढ़ा करते थे. लेकिन अब माहौल एकदम अलग है और वो अपने मेहमान के साथ रेडियो पर मज़ाक भी कर सकते हैं. इसके पहले कोई भी ग़लती उन्हें तालेबान से सज़ा दिलवा सकती थी. संजर कहते हैं,"तालेबान के दौर में यदि आप कोई गलती करते थे तो आपको तीन दिनों के लिए कंटेनर में बंद कर दिया जा सकता था." काबुल के एक महँगे इलाक़े से रेडियो अरमान सातों दिन और 24 घंटे प्रसारण करता है. परंपरा से अलग इस रेडियो स्टेशन ने पारंपरिक रेडियो प्रसारण की परंपरा को तोड़ा है. इसमें भारतीय, पश्चिमी और अरबी खाने के बारे में प्रसारण किया जाता है. इस पर चैट शो, ट्रैफिक के बारे में सलाह और सप्ताह के अंत में कहाँ जाना सुरक्षित है जैसी जानकारियाँ उपलब्ध कराई जाती हैं. काबुल शहर की गलियों, टैक्सियों और व्यस्त बाज़ारों में रेडियो अरमान के कार्यक्रम आपको बहुत ऊंची आवाज़ में सुनाई दे जाएँगे. कुछ लोगों के लिए ये एक मधुर बदलाव है क्योंकि तालेबान शासन में संगीत पर प्रतिबंध था.
अरमान के निदेशक साद मोहसेनी कहते हैं," दो दशकों के संघर्ष के दौरान लोग गंभीर ख़बरें सुनते-सुनते थक गए थे." उनका कहना था," हमारे लिए ये ज़रूरी है कि अफ़ग़ान लोगों को वो उपलब्ध कराया जाए जो वो चाहते हैं." अरमान रेडियो के पीछे साद मोहसेनी और उनके भाई ज़ैद और जाहेद हैं. ये लोग पहले ऑस्ट्रेलिया में रहते थे और तालेबान की सत्ता के पतन के तुरंत बाद वे अफ़ग़ानिस्तान लौटे. अप्रैल 2002 में साद मोहसेनी 25 वर्षों बाद काबुल लौटे और उन्होंने जब पता चला कि सरकार रेडियो और टीवी के लाइसेंस दे रही है तो वे आगे आ गए. रेडियो अरमान युवाओं में बेहद लोकप्रिय है. लोग इसके संगीत और चैट शो को तो पसंद करते ही हैं. इसकी एक वजह और भी है कि इसकी आधी से अधिक प्रस्तुतकर्ता महिलाएँ हैं. वे बॉलीवुड के साथ-साथ स्थानीय प्रतिभाओं के बारे में बातें करतीं हैं. साथ ही काबुल में कचरे की समस्या पर चर्चा करती हैं. जाहिर हैं इसने फरज़ाना शमीमी और नीलोफर जैसी प्रस्तुतकर्ताओं को ख़ासा लोकप्रिय बना दिया है. काला कोट और जींस पहने फरज़ाना शमीमी कहती हैं,"मैं इस बात पर ज़्यादा ध्यान नहीं देती कि लोग क्या कहते हैं." आलोचना लेकिन हर कोई इस बदलाव का प्रशंसक नहीं है. रेडियो अरमान की ख़राब प्रसारण से लेकर बहुत अधिक पश्चिमी होने के लिए आलोचना की जाती है.
आलोचकों में जमशेद भी एक हैं. उनका कहना है,"वे क्यों भारतीय और पश्चिमी संगीत पेश करते हैं क्या हमारे यहाँ अपने गायक नहीं हैं?" वे कहते हैं,"ये हमारी संस्कृति को नष्ट कर रहा है." शायद ऐसी ही आलोचनाओं को शांत करने के लिए रेडियो अरमान ने एक पुरस्कार समारोह आयोजित किया. इसमें नामांकित सभी लोग अफ़ग़ानिस्तान के थे और आख़िर में चार विजेता घोषित किए गए. साद मोहसेनी कहते हैं," हम चाहते हैं कि इन लोगों को सुपर स्टार बनाएँ, उनके सीडी रिकॉर्ड करें और उन्हें प्रसारित करें." |
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