पाकिस्तान के टेली-मुल्ला

 शनिवार, 14 जुलाई, 2012 को 19:00 IST तक के समाचार
आमिर लियाक़त

आमिर लियाक़त का कार्यक्रम पाकिस्तान में बेहद लोकप्रिय है

पाकिस्तान में एक समय में इस्लामी गुट केबल टीवी का विरोध करते थे. उन्हें लगता था कि इससे विदेशों से “अश्लीलता” आएगी. मगर अब वहाँ केबल टीवी पर मज़हब छाया रहता है. देश में मज़हबी टेलीगुरूओं की एक नई जमात उभर गई है और उनका सामना उदारवादियों से हो रहा है.

पाकिस्तान में एक आम दिन, पाकिस्तानी टीवी पर मिले-जुले कार्यक्रम दिखते हैं – धारावाहिक, गर्मागर्म राजनीतिक बहस और...इस्लामी कार्यक्रम, जो बढ़ता जा रहा है.

इस मज़हबी कार्यक्रम का खाका तय है. लोग फ़ोन करते हैं और हर चीज़ के बारे में इस्लाम के नियमों को जानना चाहते हैं, वो चाहे शरीर से बाल हटाने की बात हो या फिर घर के लिए कर्ज़ लेना. एंकर - जो थोड़े सेलिब्रिटी, थोड़े धार्मिक नेता होते हैं – वे उन दर्शकों को टीवी बाइटों की तरह के फतवे परोसते हैं जिनकी टीवी के ज़रिए धर्म को जानने की भूख बढ़ती ही जा रही है.

इनमें से कई कार्यक्रमों को और उनके प्रस्तुतकर्ताओं को लेकर विवाद भी हुए हैं.

फ़रहत हाशमी पर टीवी शो के ज़रिए पैसों का गोलमाल करने और अदालती चक्कर से बचने के लिए कनाडा भाग जाने का आरोप लगा है, हालाँकि वो इससे इनकार करती हैं. और राजनीतिक इंटरव्यू करनेवालीं मेहर बुख़ारी ने तब हंगामा खड़ा कर दिया जब उन्होंने एक राजनेता को ईशनिंदक क़रार कर डाला.

एक और मौलवी एक बॉलीवुड अदाकारा से भिड़ गया और लाइव कार्यक्रम में उसके व्यवहार को लेकर उन्हें ख़ूब भला-बुरा कहा. इसकी वीडियो क्लिप इंटरनेट पर ख़ूब बिकी.

मगर इन टेलीगुरूओं में सबसे अधिक चर्चित नाम हैं डॉ. आमिर लियाक़त. कराची में बेतरतीब दूकानों के ऊपर स्थित एक शानदार स्टूडियो से चलनेवाले उनके कार्यक्रम आलिम और आलम को लाखों लोग देखते हैं. एक घंटे का उनका लाइव कार्यक्रम हफ़्ते में पाँच दिन आता है.

इस कार्यक्रम के ज़रिए डॉ. लियाकत अपने दर्शकों के धार्मिक असमंजस को दूर करते हैं.

अहमदी अल्पसंख्यक

पाकिस्तान में अहमदी मुसलमानों का 1974 से ही दमन हो रहा है, जब संसद ने घोषित किया कि अहमदी संप्रदाय के लोग पाकिस्तानी क़ानून के तहत मुस्लिम नहीं हैं.

पाकिस्तान में अहमदी संप्रदाय के लोग स्वयं को मुसलमान नहीं बता सकते, ना वे अपनी आस्था के बारे में ख़ुलेआम बात कर सकते हैं, ना ही अपने उपासना स्थलों को मस्जिद कह सकते हैं.

अहमदी मानते हैं कि धार्मिक गुरू हज़रत मिर्ज़ा ग़ुलाम अहमद का जन्म ईसा मसीह की वापसी का प्रतीक है.

हालाँकि सभी मुसलमान ईसा के फिर आने की बात को मानते हैं, मगर रूढ़िवादी मुसलमान इस सोच को अस्वीकार करते हैं कि ईसा मिर्ज़ा ग़ुलाम अहमद के रूप में लौटे.

और इस आधार पर कुछ जानकारों ने अहमदी लोगों को ईशनिंदा का अपराधी घोषित किया हुआ है.

भौतिकीशास्त्री अब्दुस सलाम (ऊपर) एकमात्र नोबेल पुरस्कार विजेता पाकिस्तानी हैं मगर पाकिस्तानी इतिहास में उनका कोई उल्लेख नहीं क्योंकि वो अहमदी थे.

सितंबर 2008 में उन्होंने एक पूरा एपिसोड अहमदी लोगों पर रखा जो, ऐसा मुस्लिम गुट जिसे रूढ़िवादी मुसलमानों ने ग़ैर-इस्लामी घोषित कर रखा है. इस कार्यक्रम में दो विद्वानों ने कहा कि एक ग़लत पैगंबर से ताल्लुक रखनेवाले किसी भी व्यक्ति का क़त्ल किया जा सकता है.

एक अहमदी मुसलमान, डॉ. ख़ालिद यूसुफ़ ने ये कार्यक्रम अपने परिवार के साथ देखा और उनका कहना है कि वो स्तब्ध हैं कि कैसे कोई मुख्यधारा का टीवी चैनल इस तरह की सामग्री को प्रसारित कर सकता है.

वो कहते हैं, "उन्होंने हत्या को एक धार्मिक कर्तव्य बताते हुए बात की. ‘अच्छे’ मुसलमानों का कर्तव्य."

इस कार्यक्रम के प्रसारण के 24 घंटे के भीतर अहमदी संप्रदाय के एक बड़े अनुयायी की मीरपुर कास में गोली मारकर हत्या कर दी गई. 24 घंटे बाद एक अन्य अहमदी सामाजिक नेता ख़ालिद यूसुफ़ के पिता को दो नकाबपोश बंदूकधारियों ने मार डाला.

आमिर लियाक़त ख़ुद को इन घटनाओं से अलग बताते हैं. वे कहते हैं, "मुझे कोई अफ़सोस नहीं क्योंकि मेरा इससे कोई लेना-देना नहीं है. जो हुआ मैं उससे आहत हूँ और मैं प्रभावित परिवारों के लिए दुःखी हूँ मगर इसका मुझसे या मेरे कार्यक्रम से कोई संबंध नहीं है."

वैसे पाकिस्तानी अख़बारों में लियाक़त की कुछ आलोचना हुई मगर इससे उनके पेशे पर कोई फ़र्क नहीं पड़ा. उन्हें एक रसोई तेल के विज्ञापन के लिए पैसे मिलते हैं और वो शीघ्र ही अपने धार्मिक गानों का एक एलबम लानेवाले हैं.

वे टीवी पर अपना कार्यक्रम पेश करते हैं और इस महीने वे अपने पुराने टीवी चैनल जियो पर लौट रहे हैं जो पाकिस्तान के सबसे लोकप्रिय चैनलों में से एक है.

पाकिस्तान में निजी टीवी चैनलों का फलना-फूलना जनरल मुशर्रफ़ के राष्ट्रपति काल में संभव हुआ. पाकिस्तान में टीवी बाज़ार को खोले जाने के क़दम को प्रेस के लोकतंत्रीकरण की बात कहकर स्वागत किया गया मगर अब कई लोग कहते हैं कि टीवी उद्योग को नियंत्रित करना बेहद ज़रूरी है और सेलिब्रिटी-मौलवी असहिष्णुता फैला रहे हैं.

कम-से-कम सिद्धांत तौर पर ही, पाकिस्तानी टीवी जगत को कड़ी मर्यादाओं का पालन करना पड़ेगा. पेमरा यानी पाकिस्तान इलेक्ट्रॉनिक मीडिया रेगुलेटरी ऑथोरिटी देश के टीवी चैनलों की निगरानी करनेवाली एक सरकारी संस्था है. उनका एक लक्ष्य ऐसे कार्यक्रमों के प्रसारण को रोकना है जो सांप्रदायिक और सामुदायिक भावनाओं को भड़काते हों और वैमनस्य को बढ़ाते हों.

"बहुत कम लोग ऐसा कह सकते हैं. मैं कह सकती हूँ और मैंने वही किया."

वीना मलिक, अभिनेत्री

मगर आलोचकों की निगाह में लियाक़त के विरूद्ध कुछ कर पाने में नाकाम रहने के बाद ये सिद्ध हो चुका है कि पेमरा एक दंतहीन संस्था है.पेमरा के महाप्रबंधक ने कहा कि वो धार्मिक प्रसारणों के बारे में कुछ नहीं बोलना चाहते क्योंकि ये एक तरह से आग लगाने के जैसा काम होगा.

टीवी गुरूओं के ख़िलाफ़ बिना ख़ौफ़ बोलनेवाली एक शख्सियत हैं वीना मलिक. वे पाकिस्तानी हैं जिन्होंने बॉलीवुड में भी नाम कमाया. भारत के रिएलिटी टीवी शो बिग बॉस में हिस्सा लेने को लेकर उन्हें टीवी-मुल्लों के क्रोध का सामना करना पड़ा.

पाकिस्तान लौटने के बाद, वे एक टीवी कार्यक्रम में हिस्सा लेने गईं जहाँ उनकी एक मौलवी से भिड़ंत हो गई जिन्होंने उनकी हरकतों को शर्मनाक और ग़ैर-इस्लामी बताया. इस कार्यक्रम में वीना मलिक ने जिस तरह से अपना बचाव किया उससे वो कुछ लोगों के लिए वो हीरो बनकर उभरीं और यूट्यूब पर इसका वीडियो काफ़ी लोकप्रिय हुआ है.

वीना मलिक पाकिस्तान में आज़ादख़याल लोगों के लिए हीरो हो गई हैं

वो कहती हैं,"मैं अपने बारे में बात कर रही थी जब मैंने ये कहा कि ये हर औरत का अपना फ़ैसला है कि वो क्या पहने. पाकिस्तान में महिलाओं के अधिकार का संघर्ष धार्मिक अल्पसंख्यकों के अधिकारों से जुड़ा है. बहुत कम लोग ऐसा कह सकते हैं. मैं कह सकती हूँ और मैंने वही किया.”

“वीना बनाम मुल्ला” की इस बहस ने वीना मलिक को पाकिस्तान के स्वतंत्र विचार वाले लोगों का प्रतीक बना दिया. धार्मिक अल्पसंख्यकों का ख़ुलकर समर्थन करनेवाली एक संस्था सिटिज़ेंस फ़ॉर डेमोक्रेसी के कार्यकर्ता मंसूर रज़ा कहते हैं कि वामपंथी विचारधारा में यकीन करनेवाले लोगों के बीच वीना मलिक का ये नया दर्जा इस नए समय का निशान है.

वो कहते हैं, "मैं ऐसी कुछ घरेलू महिलाओं को जानता हूँ जो हिजाब पहनती हैं. वे वीना मलिक को हीरो मानती हैं. उन्होंने वही कहा जो हम कहना चाहते हैं. हमारे राजनेताओं ने हमें निराश किया है इसलिए ये बातें वीना मलिक को कहनी पड़ रही हैं.”

पर पाकिस्तान में हर कोई ऐसा नहीं मानता कि टीवी गुरूओं में में कोई समस्या है. धार्मिक कार्यक्रम प्रसारित करनेवाले चैनलों का कहना है कि वे बस वही दिखा रहे हैं जो दर्शक देखना चाहते हैं और वे जटिल धार्मिक समस्याओं का साधारण जवाब उपलब्ध करवा रहे हैं.

"मेरे पिता को सब प्यार करते थे. हमने उन्हें एक टीवी कार्यक्रम के कारण खो दिया. मुझे उम्मीद है और किसी के साथ ऐसा ना हो"

डॉ. ख़ालिद यूसुफ़, अहमदी अल्पसंख्यक

आमिर लियाक़त कहते हैं कि ये कार्यक्रम लोकप्रिय हैं क्योंकि वे लोगों की जानकारी बढ़ाते हैं. वे कहते हैं, "मैं प्यार का संदेश फैलाना चाहता हूँ. सभी विवादों के बावजूद मैं बना हुआ हूँ क्योंकि लोग मुझे चाहते हैं और वे धर्म को जानना चाहते हैं."

कराची हेराल्ड अख़बार के संपादक बदर आलम कहते हैं कि टीवी से पाकिस्तान में इस्लाम पर असर पड़ सकता है, जैसे अब अधिक महिलाएँ नक़ाब पहन रही हैं.

वे मानते हैं कि अब मध्यवर्गीय घरों की महिलाएँ ऐसी धार्मिक बातों को सीख रही हैं जिनसे पाकिस्तान अभी तक अनजान था.

पाकिस्तान में टीवी पर्दों पर मुख्यधारा वाले पाकिस्तानी इस्लाम और कट्टर इस्लाम की रोज़ाना टक्कर हो रही है.

डॉ. ख़ालिद यूसुफ़ को लगता है कि उनके पिता इसी लड़ाई के शिकार हो गए. वो कहते हैं, "मेरे पिता को सब प्यार करते थे. हमने उन्हें एक टीवी कार्यक्रम के कारण खो दिया. मुझे उम्मीद है और किसी के साथ ऐसा ना हो."

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